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पर्यावरण के लिए गांधीगीरी का रास्ता

Last Updated- December 07, 2022 | 9:44 AM IST

डॉ. जी. डी. अग्रवाल आजकल सुर्खियों में हैं। वजह यह है कि उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी नगर उत्तरकाशी में अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया। उनका विरोध प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण को लेकर है।


कुछ लोग गलती से उन्हें पर्यावरण सचेतक सुंदर लाल बहुगुणा भी समझ लेते हैं। जब उनके अनशन की खबरें स्थानीय अखबारों और टेलीविजन चैनलों में आनी शुरू हुई तो लोगों को यह अंदाज हुआ कि वह बहुत ही अलग तरह के व्यक्ति हैं। अग्रवाल मध्य प्रदेश के चित्रकूट से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने बहुगुणा की तरह ही इस विरोध की कमान संभाल ली है।

अग्रवाल के करीबी लोगों का कहना है कि उन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में बहुत बेहतर काम किया है। अग्रवाल ने कैलीफोर्निया यूनीवर्सिटी से पीएचडी की है और वह आईआईटी कानपुर में सिविल ऐंड इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख थे। इसके अलावा वह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सचिव थे और उन्होंने वहीं से सुधार का बीड़ा उठा लिया था।

अग्रवाल ने गांधीवादी विचारों को अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया। उन्होंने शादी भी नहीं की। वह अपनी जिंदगी को बेहद साधारण तरीके से जीते हैं और अपने कपड़े भी खुद ही साफ करते हैं। यही नहीं वह अपना खाना भी खुद ही बनाते हैं। इसके अलावा वह चित्रकूट की कुटिया को भी गांधी जी की तरह ही खुद से साफ भी करते हैं। गांधीवादी विचारों के पैरोकार 76 साल की उम्र होने के बावजूद भी साइकिल की सवारी करते हैं। जब उन्हें कहीं दूर जाना होता है तो वह साधारण बस या फिर ट्रेन की सवारी करते हैं।

मशहूर पर्यावरणविद् और मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह और सीएसई के संस्थापक अनिल अग्रवाल ने इकोलॉजी के क्षेत्र में अपना एक मुकाम बनाया है जो अग्रवाल के ही शिष्य रहे हैं। इस तरह के शिष्यों की सूची अंतहीन है। दूसरे मैगसेसे विजेता एम. सी. मेहता और पीएसआई के सेक्रटरी रवि चोपड़ा, अग्रवाल को बेहद सम्मान का दर्जा देते हैं। चोपड़ा बताते हैं कि अग्रवाल ने भागीरथी नदी के किनारे उत्तरकाशी में अनशन के दौरान भी अपने समय का किस तरह सही इस्तेमाल किया। अग्रवाल ने गंगोत्री के संरक्षण के लिए जहां से भागीरथी निकलती है, पेन और कागज का इस्तेमाल करके योजना बना डाली।

अग्रवाल का मानना है कि अगर इसके संरक्षण के कुछ कड़े उपाय नहीं किए गए तो यह पवित्र नदी भविष्य में बिल्कुल सूख जाएगी। उनका कहना है कि उत्तरकाशी के निचले स्तर की नदियां सूखी पड़ी हैं। वह चेतावनी देते हुए कहते है कि अगर इन नदियों पर इस तरह की निर्माण परियोजनाएं चलती रहीं तो ये नदियां सूख जाएंगी और पारिस्थितकी तंत्र पर इसका असर जरूर पड़ेगा खासतौर पर जलीय जीव जंतुओं पर। अग्रवाल ने 17 दिन का अपना उपवास सोमवार की शाम को तोड़ा जब उन्हें केंद्र की ओर से यह आश्वासन मिला कि एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाएगी जो भागीरथी नदी की वर्तमान स्थिति का जायजा लेगी। यह समिति तीन महीनों में अपनी रिपोर्ट देगी।

हालांकि अग्रवाल के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि वह अपना उपवास तोड़ने के बाद से खुश नहीं हैं। उन्होंने अनाज लेने से मना कर दिया है और उनका कहना है कि वे केवल फल, सब्जियां और पानी पर ही जिंदा रहेंगे जब तक वह अपने लक्ष्य को नहीं पा लेते। अग्रवाल का कहना है कि भागीरथी नदी के  ऊपरी हिस्से में कोई ऐसा काम नहीं होना चाहिए जिससे प्राकृतिक संतुलन, पारिस्थितिकी और पर्यावरण शुद्धता पर कोई असर पड़े। अग्रवाल के दबाव की वजह से ही उत्तराखंड सरकार ने अपनी दो बड़ी परियोजनाओं 480 मेगावॉट की पाला मनेरी और 400 मेगावॉट की भैरोंघाटी परियोजना पर काम करवाना रोक दिया है।

First Published - July 8, 2008 | 3:10 AM IST

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