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गणितीय बाजीगरी में फंसी वैश्विक अर्थव्यवस्था

Last Updated- December 07, 2022 | 5:43 PM IST

बैंकरों के लिए एक ई-मेल अभिशाप बन गया। पिछले सप्ताह सिटी, मेरिल लिंच और यूबीएस इस बात पर सहमत हुए कि वे सभी अमेरिकी अधिकारियों को 9 अंकों का जुर्माना अदा करेंगे और वे संदिग्ध परिस्थितियों में व्यक्तिगत निवेशकों को बेचे गए 40 अरब डॉलर के ‘ऑक्शन रेट सिक्योरिटीज’ को वापस लेंगे।


(‘ऑक्शन रेट सिक्योरिटीज’ लंबी अवधि के लिक्विड बॉन्ड्स होते हैं जिनकी ब्याज दरें बोली के प्रत्येक 7, 14 और 35 दिनों में पुनर्निधारित की जाती हैं।) ई-मेल के ये साक्ष्य पिछले 1990 के दौरान डॉटकॉम बूम में इक्विटी की कीमतों के मामले में भी सहायक हो सकती हैं।

द फाइनैंशियल टाइम्स (2 अगस्त) ने उस ई-मेल का हवाला दिया है जो मेरिल के एक अधिकारी ने पिछले साल नवंबर में भेजा था। ‘ऑक्शन रेट सिक्योरिटीज’ का बाजार ध्वस्त हो रहा है।  इस साल के फरवरी महीने में भी मेरिल इस तरह की सिक्योरिटी को बेच रहा था। इसे यह कहकर बेचा जा रहा था कि यह व्यक्तिगत निवेशकों के लिए बेहतरीन, परंपरागत और तर्कसंगत निवेश है।

जब बाजार गिर गया तो अल्पकालिक निवेश करने वाले लोगों ने बैंकों से प्रतिभूतियों का सौदा करने से इनकार कर दिया। इसी वजह से तीनों बैंकों को बाईबैक करना पड़ा। इस मामले में केवल बैंकर ही दोषी नहीं है, रेटिंग कंपनियां भी इससे दूर नहीं हैं। ई-मेल में रेटिंग कंपनी के एक विश्लेषक ने कहा है, हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हम सभी समृध्द हैं और हमें बाद में मुनाफा होगा।

यह मेल दिसंबर 2006 का है। इसके कुछ समय बाद ही एएए रेटिंग वाले निवेश में सब प्राइम मॉर्गेज संकट आ गया। अमेरिकी सिक्योरिटीज ऐंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) ने अपनी रिपोर्ट में इसके लिए रेटिंग कंपनियों को दोषी बताया और कहा कि रेटिंग के मामले में गलत तथ्य पेश किए गए और ब्याज मानकों के मामले में विरोधाभास पैदा किया गया।

एसईसी रिपोर्ट में अप्रैल 2007 में एक और विश्लेषक का संदर्भ लिया गया, जिसमें कहा गया है कि, ‘हो सकता है कि यह अनुमान नौसिखियों ने लगाया हो, हम इसकी रेटिंग करेंगे’। उसने आधे खतरे का आकलन किया, जब रेटिंग करने के लिए उस पर दबाव डाला गया! शुल्क भी बहुत आकर्षक था?

इस बात को भी इंगित किया जा सकता है कि इस बाईबैक में संस्थागत निवेशक शामिल नहीं थे, जैसा कि लेख के शुरुआत में कहा गया। और अगर इसमें कुछ छोटे संस्थागत निवेशक शामिल भी हुए तो उन्होंने बहुत ही सुरक्षात्मक ढंग से निवेश किया। स्थानीय अथॉरिटीज, फ्लोरिडा और आस्ट्रेलिया के स्कूल बोर्ड्स और कई अन्य ने खरीद के कुछ महीने बाद ही गड़बड़ियों का अंदेशा होते ही प्रतिभूतियां बेच दीं। 

अमेरिका जैसे देश के जागरूक समाज में जैसी कि उम्मीद थी, वहां के वकीलों ने बैंकों के खिलाफ विभिन्न मामलों के मुकदमों की झड़ी लगा दी। इसमें कई अरब डॉलर के कारोबार में बैंकों पर गलत तथ्य देने और भ्रमित करने वाले आंकड़े देकर निवेशकों को गुमराह करने के आरोप लगाए गए। बहुत सारे मामलों में जब सारी बातचीत खत्म हुई तो आम निवेशकों को कोई फायदा नहीं हुआ।

एक और दिलचस्प मामला इन कथित परिपक्व वित्तीय बाजारों और परिष्कृत एकाउंटिंग सिस्टम में सामने आया। एकाउंटेंड, अलग-अलग उपभोक्ताओं के लिए एक ही सिक्योरिटी पर अलग-अलग मूल्यांकन करते थे। बहरहाल यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। सक्रिय और लिक्विड मार्केट की अनुपस्थिति में एकाउंटिंग के नियम इस बात की अनुमति देते हैं कि विभिन्न गणितीय मॉडलों के मुताबिक निवेश किया जाए।

जटिल और ढांचागत उत्पादों के मामले में कोई एक गणितीय मॉडल नहीं है, जिसे सार्वभौमिक रूप से लागू किया जा सके। एक इस बात की कल्पना कर सकता है कि यदि ऑडिटर जांच में कोई गड़बड़ी नहीं पाते हैं तो निवेशक उसे स्वीकार करता रहेगा, वे उस वैल्युएशन को स्वीकार कर लेंगे और शायद यही कारण है कि इसमें विभिन्नता नजर आती है।

सही कहें तो समस्या यह है कि डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स में बहुत जटिलता है। इसका ढांचा निर्धारित करते समय कोई  वास्तविक हेजिंग जरूरत या निवेशकों की मांग पूरी नहीं होती, क्योंकि इसमें प्राइसिंग मार्जिन और जोखिम मौजूद होते हैं। 

जैसा कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित जेम्स टॉबिन ने 1984 में कहा था, ”मैं आजकल एक बेहद तकलीफदेह संदेह महसूस कर रहा हूं। शायद किताबों की दुनिया में यह हकीकत न बन पाए। हम अपने ज्यादा से ज्यादा संसाधन और बेहतरीन युवा कुछ ऐसे वित्तीय कार्यों में लगा रहे हैं, जिनका उत्पादन से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। मुझे आशंका है कि आज कंप्यूटर की जबरदस्त ताकत का इस्तेमाल एक ‘कागजी अर्थव्यवस्था’ के लिए किया जा रहा है, जिसमें लेन-देन ज्यादा सस्ते नहीं होंगे, लेकिन फाइनैंशियल एक्सचेंज काफी मजबूत हो जाएंगे।”

समस्या यह है कि जानकारी में तालमेल का अभाव होने से जोखिम बढ़ता है। ऐसे में सारी जिम्मेदारी उन लोगों के कंधे पर आ जाती है, जो इसे समझने में सक्षम हैं। लेकिन यह हमेशा नहीं होता, जैसा कि बैंकों के 500 अरब डॉलर के सब प्राइम मॉर्गेज आधारित प्रतिभूतियों के मामले में हुआ।

क्या जटिलता की वजह से इस क्षेत्र के अत्याधुनिक कारोबारियों को मापन, प्रबंधन और जोखिमों को जानने में समस्या हो रही है? जैसा कि सत्यजीत दास ने ‘ट्रेडर्स, गन्स ऐंड मनी’ में तर्क दिया है, ”हाल के दिनों में अर्थव्यवस्था में इतनी गणितीय बाजीगरी दिखा दी गई है और उनकी बुनियाद कुछ इस तरह की है कि लेखक निरर्थक संकेतों के जाल में फंसकर रह गए हैं और उन्हें आगे की साफ तस्वीर नजर नहीं आ रही है।”

First Published - August 20, 2008 | 12:06 AM IST

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