कर्नाटक अब चैन की सांस ले सकता है। चार साल और दो गठबंधन सरकारों के बाद हालिया विधानसभा चुनाव में एक ही विजेता उभरकर आई है – भारतीय जनता पार्टी।
हालांकि, पार्टी इस वक्त भी चैन की सांस नहीं ले सकती। अगर इसके दो बागी विजयी उम्मीदवारों को पार्टी वापस बुला भी लेती है, तो भी वह बहुमत की दहलीज तक ही पहुंच पाएगी। दूसरी तरफ, इस बार विधानसभा तक पहुंचे विजयी निर्दलीय और छोटे दलों के उम्मीदवारों की तादाद पिछली बार के मुकाबले केवल एक तिहाई ही रह गई है।
इसलिए विधायकों के कूद-फांद की उम्मीद भी काफी कम हो गई है। लेकिन सबसे अहम बात यह है कि पार्टी में मुख्यमंत्री की कुर्सी के सबसे बड़े दावेदार बी.एस. येदियुरप्पा को न तो उनके विकास के एजेंडे और न ही प्रशासनिक क्षमता के लिए जाना जाता है। इसलिए, इस बात की उम्मीद कम ही है कि अपनी विस्तार योजनाओं के लिए सूबे से मुंह मोड़ चुकी बड़ी-बड़ी बीपीओ कंपनियां अब वापस आएंगी।
इस चुनाव में कर्नाटक के पारंपरिक राजनीति की जबरदस्त छाप देखी जा सकती है। इस बार यहां चुनाव का लड़ना और मतदान, दोनों ही जातिगत आधार पर हुए। सूबे के मजबूत लिंगायत समुदाय ने येदियुरप्पा के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उन्हें ऐसा करने में किसी तरह की हिचकिचाहट भी नहीं हुई क्योंकि भाजपा ने पहले से ही मुख्यमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर रखा था।
पार्टी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत तो की थी जनता दल (एस) से मिले धोखे की दुहाई देकर सहानुभूति हासिल करने की कवायद के साथ। लेकिन जब उसने देखा कि यह फॉर्मूला काम नहीं कर रहा, तो वह महंगाई और आतंकवाद के अपने पुराने मुद्दे की तरफ लौट गई। साथ ही, उसे सूबे की दोनों प्रमुख पार्टियों, कांग्रेस और जनता दल (एस) के खिलाफ लोगों के मन में मौजूद गुस्से का भी फायदा मिला।
दूसरी तरफ, सबसे बुरी गत तो जेडी (एस) की हुई। इस चुनावों में उसे पिछली बार के मुकाबले आधी से भी कम सीटों से संतोष करना पड़ा। यह इस बात का सबूत है कि पिछले चार साल में उसकी और एच.डी. देवेगौड़ा की भूमिका को लेकर लोगों के दिल में उसके खिलाफ कितना गुस्सा उबल रहा था। उनका वोटबैंक तो अब वोकालिग तक सिमट कर रह गया है।
कांग्रेस अपनी अक्षमताओं और अंदरुनी राजनीति में ही उलझ कर रह गई। इसने काफी देर से अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, जिसका खामियाजा इसे बागी उम्मीदवारों की रूप में झेलना पड़ा। मैदान में थे कई सारे नेता, जो पार्टी को अपनी-अपनी तरफ खींच रहे थे। यहां तक कि पार्टी के बड़े नेता एस.एम. कृष्णा का जादू भी फीका रह गया। शायद वह आए ही काफी देर से थे।
कांग्रेस को अब इस बात पर विचार करना चाहिए कि कैसे इसने बेंगलुरु में परिसीमन की वजह से बढ़े शहरी सीटों को हाथ से निकल जाने दिया। यह चुनाव भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर खुशी का पैगाम बनकर आया है, लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि अगले साल के आम चुनावों में क्या होगा।