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परमाणु करार में हमने रखा है हर बात का ख्याल : सरकार

Last Updated- December 07, 2022 | 10:41 AM IST

परमाणु करार को अमेरिका के साथ हुए उपकरण सहयोग समझौता, संयुक्त युद्धाभ्यास और हथियार खरीदने के लिए हुए समझौतों से अलग हटकर नहीं देखा जाना चाहिए।


सरकार : जहां तक हथियार और प्रतिरक्षा से जुड़ी अन्य चीजों की खरीद की बात है तो इस मामले में भारत सरकार की अपनी एक अलग नीति है। उपकरण सहयोग समझौते में भी इसी तरह की बातें हैं जो रक्षा जरुरतों के हिसाब से ही तय होती हैं। और मुश्किल हालातों में इसको बढ़ाया भी जा सकता है।

यह द्विपक्षीय समझौता ‘हाइड एक्ट’ से बंधा है। ‘हाइड एक्ट’ अमेरिका के राष्ट्रीय कानून का हिस्सा है और भविष्य में भी यह कानून लागू रहेगा।

सरकार: अमेरिकी कानूनों की अपनी बंदिशें हैं, यह ठीक उसी तरह है जिस तरह भारत अपने कानूनों से बंधा हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका या भारत एक दूसरे के कानूनों को मानने के लिए बाध्य हो जाएं।

हाइड एक्ट के कुछ प्रावधानों को लेकर संशय है।
पहला, तो यह कि इस करार से भारतीय विदेश नीति के प्रभावित होने की बात की जा रही है। इस करार के बाद भारत को हर साल सर्टिफिकेट लेना होगा। साथ ही विदेश नीति से जुड़े कई मुद्दों के बारे में अमेरिकी कांग्रेस को भी सूचित करना होगा। आशंका व्यक्त की जा रही है कि करार के बाद भारतीय विदेश नीति पर अमेरिका का असर और बढ़ जाएगा जिसके चलते ईरान को अलग-थलग करने की अमेरिकी कवायद में भारत भी शामिल हो सकता है।

सरकार : सरकार हमेशा से यही राग अलापती आ रही है कि भारत की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति का वहां की कांग्रेस को अलग-अलग मुद्दों पर संबोधित करना वहां की परंपरा है।

अमेरिका का विवादास्पद अप्रसार सुरक्षा कानून जिसमें अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में जहाजों के प्रवेश की अवैध नीति भी शामिल है। उसमें भारत की सहभागिता और उसका औपचारिक समर्थन करना भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। 

सरकार : भारत ने अप्रसार सुरक्षा कानून को लेकर अभी तक अपना रुख तय नहीं किया है। भारत सरकार ऐसा कुछ भी नहीं करेगी जिससे अंतरराष्ट्रीय कानूनों को क्षति पहुंचे।

भारत को कई द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौतों के बारे में आश्वस्त करना होगा। जबकि भारत ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए हैं। इसमें अमेरिकी मिसाइल टेक्नोलोजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) और द ऑस्ट्रेलिया ग्रुप जैसे समझौते शामिल हैं। (धारा-104 सी, ई, एफ, जी)

सरकार : एमटीसीआर पर अभी भी विचार चल रहा है।

‘हाइड एक्ट’ में इस तरह का प्रावधान है जिसके अनुसार 123 समझौता कभी भी रद्द किया जा सकता है। न केवल परमाणु परीक्षण की स्थिति में बल्कि अमेरिकी विदेश नीति को समर्थन न देने की स्थिति में भी प्रस्तावित समझौते को खत्म करने का प्रावधान मौजूद है। इसकी वजह से आईएईए की शर्तों को मानने के बावजूद भारत को एक बार फिर ‘परमाणु अकेलेपन’ का सामना करना पड़ सकता है।

सरकार : हाइड एक्ट अमेरिका का घरेलू कानून है जो भारत की विदेश नीति को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करता।

करार के बाद भारत दोबारा परमाणु परीक्षण नहीं कर सकता, एक तरह इस पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू हो जाएगा। ‘हाइड एक्ट’ में मौजूद ‘फिसिल मैटेरियल कट ऑफ ट्रीटी (एफएमसीटी)’ किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।

सरकार: भारत सरकार ने सैन्य और नागरिक परमाणु संयंत्रों को अलग-अलग करने का जो खाका तैयार किया है, उसको स्वीकार कर लिया गया है। ऐसे में भारत के सामने सैन्य परमाणु संयंत्रों की गतिविधियों की जानकारी देने की बाध्यता नहीं है।

गुटनिरपेक्ष देशों में परमाणु निशस्त्रीकरण को लेकर भारत पहले से जो भूमिका निभाता आ रहा है, उस छवि को नुकसान पहुंचने का अंदेशा लगाया जा रहा है।

सरकार : भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, फिर भी भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश के तौर पर देखा जा रहा है। इस तरह से तो भारत की स्थिति और मजबूत ही हुई है।

प्रस्तावित 123 समझौते में जिसको 2005 में संयुक्त बयान में ‘पूर्णत:नागरिक परमाणु सहयोग ‘ का दर्जा दिया गया था। उसके मुताबिक इस करार से भारत को परमाणु ईंधन, रिप्रोसेसिंग और हैवी वाटर तकनीक मिलेगी। इसमें परमाणु संवर्धन के साथ-साथ रिप्रोसेसिंग और हैवी वाटर में भी प्रयोग किये जाने वाली दोहरे इस्तेमाल में काम आने वाली परमाणु सामग्री के इस्तेमाल पर भी मनाही है।

सरकार
: वर्तमान परिदृश्य में भारत ‘परमाणु अकेलेपन’ की स्थिति में है। इस समझौते से भारत का परमाणु अकेलापन खत्म हो जाएगा। 

 इसमें एक बड़ा मुद्दा फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों को लेकर भी है। इस समझौते के तहत फास्ट ब्रीडर रिएक्टर को फ्यूल साइकल के रूप में मान्यता दी जाएगी और इसके लिए आवश्यक कोई भी तकनीक दोहरी तकनीक के अंतर्गत आएगी। इसके अलावा नए लगने वाले फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भी नागरिक परमाणु संयंत्रों के तहत ही संचालित होंगे और उनको आईएईए के मानकों के अनुसार चलाना होगा।

सरकार : जब तक भारत का थोरियम आधारित बिजली बनाने का देसी कार्यक्र म पूरा नहीं हो जाता, तब तक हमें दोहरे इस्तेमाल वाली तकनीक की जरुरत होगी। इस करार के बाद इस पर लगी पाबंदी के हटने का रास्ता साफ हो जाएगा।

भारत द्वारा परमाणु ईंधन का रणनीतिक भंडार बनाने में अमेरिका कोई रोड़ा नहीं अटकाएगा, इस बात को लेकर समझौते में सहमति बन गई है। अमेरिका के साथ करार खत्म होने की स्थिति में अमेरिका भारत को परमाणु सामग्री और उपकरण मुआवजे के तौर पर देगा। लेकिन ईंधन की आपूर्ति और दूसरी कई चीजें अमेरिकी कांग्रेस के रहमोकरम पर ही निर्भर रहेंगी।

सरकार : दूसरी परमाणु शक्तिओं से ईंधन की आपूर्ति में बाधा को लेकर बात करने के मामले में अमेरिकी प्रशासन घरेलू कानून से बंधा हुआ है।

भारतीय 123 समझौते में उस वाक्य को शामिल नहीं किया गया है जो चीन के साथ हुए समझौते के अनुच्छेद 2.1 में है।

सरकार : करार के हर मसौदे में हमने कई चीजों का ख्याल रखा है और अंतिम समझौता उन्हीं शर्तों पर होगा जिनसे हम संतुष्ट होंगे। अमेरिका यह कहता रहा है कि काफी कुछ चीजें कांग्रेस के हाथ में ही होंगी।
लेकिन हम समझौते के एक और अनुच्छेद 16.4 को खत्म कराने में कामयाब रहे हैं।


इस अनुच्छेद में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला था। इसमें वियना संधि को उध्दृत किया गया था। इसके अनुसार कोई पक्ष किसी संधि की असफलता के लिए अपने आंतरिक कानूनों का उल्लंघन करे, यह जरूरी नहीं है।

First Published - July 10, 2008 | 11:13 PM IST

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