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सरकारी बाबूओं को मिले काम करने का वक्त

Last Updated- December 07, 2022 | 7:42 PM IST

स्थायित्व और स्थिरता को अपने मुल्क में सिविल सर्विसेज यानी प्रशासनिक सेवाओं की रक्षा में काफी बड़े हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। ये हथियार तो लोकतंत्र के लिए भी काफी अहम है।


मंत्री जाते-आते रहते हैं, लेकिन नौकरशाहों की वजह से ही मंत्रालयों का काम बदस्तूर चलता रहता है। उनके पास मंत्रियों के मुकाबले काम का ज्यादा तजुर्बा होता है और इसलिए वह सरकारी ढांचे को स्थिरता मुहैया कराते हैं।

कभी-कभी उनका तबादला होता है, लेकिन इस वजह से भी काम पर असर नहीं पड़ता है। चूंकि, वे सभी एक ही सेवा के कैडरों से ताल्लुक रहते हैं, इसलिए ऊपर बैठे मंत्रियों के बदलने से भी काम पर ज्यादा असर नहीं पड़ता।

हालांकि, केंद्र सरकार में पिछले कुछ सालों में यह परंपरा टूटती जा रही है। आपको सुनकर अजीब लगेगा, लेकिन अब ऊपर बैठे मंत्रियों की स्थिरता और स्थायित्व का ज्यादा ख्याल रखा जा रहा है। इसलिए तो मंत्रियों की तुलना में सचिवों के तबादले काफी ज्यादा किए गए।

इसलिए तो कई बार ऐसे भी मौके आए हैं, जब किसी मंत्री ने तो पांच साल का अपना कार्यकाल एक ही मंत्रालय में पूरा किया हो, लेकिन उसी कार्यकाल के दौरान मंत्रालय ने एक से ज्यादा सचिवों का चेहरा देखा हो। मिसाल के तौर पर रेल मंत्रालय को ही ले लीजिए। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के इस पूरे कार्यकाल में केवल एक ही रेल मंत्री ही हुए हैं, लालू प्रसाद।

और इस साढ़े चार साल के वक्त में लालू जी को कितने रेलवे बोर्ड अध्यक्षों से दो चार होना है, कम से कम तीन। रेलवे बोर्ड अध्यक्षों को तो छोड़िए, जरा खुद रेलवे बोर्ड को ही ले लीजिए। बोर्ड को इतनी बार और इतनी जल्दी-जल्दी बदला गया है कि स्थायित्व और स्थिरता की बातें, मजाक बनकर रह गई हैं।

अब जरा वक्त की गली में पीछे की ओर चलें तो इससे भी मजेदार तस्वीर सामने आती है। कांग्रेस सरकारों या कांग्रेस नीत सरकारों ने तो हमेशा से ही अपने रेल मंत्रियों को पूरे पांच सालों का वक्त दिया है। राजीव गांधी सरकार में रेल मंत्रालय में 1985 से लेकर 1989 तक माधवराव सिंधिया का एकछत्र राज था।

इसी तरह नरसिंह राव ने भी 1991 से 1996 तक सी.के. जाफर शरीफ को बतौर रेल मंत्री बेखटक काम करने का मौका दिया। अब लालू प्रसाद इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। अगर रेल मंत्री बदले भी गए हैं तो ऐसा केवल संयुक्त मोर्चा सरकारों और वाजपेयी सरकार के दौरान हुआ है। लेकिन इस दौरान भी रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष का औसत कार्यकाल केवल दो सालों का ही रहा है।

वित्त मंत्रालय में भी तस्वीर ज्यादा अच्छी नहीं है। वहां भी ऐसी बातों का ही सामना करना पड़ता है। वहां सचिवों के लिए सबसे अच्छा वक्त तो नरसिंह राव सरकार के वक्त आया था, जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। तब वित्त मंत्रालय में मौजूद सचिवों की टीम को सबसे कम फेरबदल हुए थे। यशवंत सिन्हा ने पांच बजटों को पेश किया था और अपने हर बजट को पेश करने के मौके पर उनके साथ अलग-अलग वित्त सचिव हुआ करते थे।

हालत तो यहां तक पहुंच गई थी कि एक बार बजट पेश करने के मौके पर उनके बगल में कोई वित्त सचिव नहीं खड़ा था। तब उन्हें आर्थिक मामलों के सचिव के साथ से काम चलाना पड़ा था। पी. चिदंबरम भी संप्रग सरकार के लिए पांच बजट पेश कर चुके हैं, लेकिन उन्हें भी अपने इस कार्यकाल में कम से कम चार वित्त सचिवों का साथ मिला है।

यह आम लोगों के लिए भले ही चिंता की कोई बात नहीं हो सकती है, लेकिन असल में यह बात हमारी व्यवस्था में मौजूद एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है। बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को सही तरह से काम सीखने और उसे बेहतर से करने के लिए काफी कम वक्त मिल रहा है। सरकार के सभी मंत्रालयों में इक्का-दुक्का ही ऐसा सचिव होंगे, जो उस मंत्रालयों में दो साल से ज्यादा वक्त से काम कर रहे हों।

कुछ साल पहले सरकार ने फैसला लिया था कि मुल्क के सबसे बड़े नौकरशाह यानी कैबिनेट सचिव की कुर्सी के लिए चुने गए शख्स का कार्यकाल कम से कम दो साल का होगा। संप्रग सरकार ने भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के कई वरिष्ठ अधिकारियों को नजरअंदाज एक जूनियर अधिकारी, शिवशंकर मेनन को विदेश सचिव बनाया।

सरकार के मुताबिक मेनन काम के लिए बिल्कुल उपयुक्त थे और उनके रिटायरमेंट में कम से कम तीन साल बाकी थे। इसलिए सरकार का कहना था कि इस दौरान वह अपना काम अच्छी तरह से कर सकते थे। इस पर काफी हंगामा भी मचा था, लेकिन सरकार अपने फैसले पर कायम रही। मनमोहन सिंह सरकार को काम करने के लिए एक अच्छे-खासे कार्यकाल वाले अधिकारी का चुनाव करने से काफी फायदा हुआ।

अक्सर गैर जरूरी कामों के लिए अधिकारियों का चुनाव करते वक्त सरकार इस बात का खास ख्याल रखती है कि उन्हें काम करने के लिए कम से कम दो से पांच साल का वक्त मिले। लेकिन किसी अहम पद के लिए किसी को चुनने की बात आती है, तो सरकार उसके लिए एक न्यूनतम कार्यकाल के बारे में बिल्कुल भी ध्यान नहीं देती है।

अब समय आया गया है कि जब मंत्रालयों में ऊंचे ओहदों पर बैठे सचिवों को भी एक न्यूनतम कार्यकाल मुहैया कराया जाए, ताकि उनकी और सरकारी अमले की कार्यकुशलता में इजाफा हो सके।

First Published - September 2, 2008 | 10:41 PM IST

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