लोकसभा में 16 जुलाई, 1991 को एक बड़ा ही मजेदार प्रश्नकाल हुआ था। उस दिन विपक्षी खेमे में बैठे जॉर्ज फर्नांडीस ने तब के पेट्रोलियम मंत्री बी. शंकरानंद से पूछा था कि क्या सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों को कम करने के बारे में सोच रही है?
इस पर मंत्री जी का जवाब काफी नपा-तुला आया था। उन्होंने कहा था कि, ‘पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में किसी तरह के फेरबदल के बारे में सरकार कोई भी फैसला आपूर्ति, मांग में इजाफे और दूसरे सामाजिक आर्थिक मुद्दों को ध्यान में रख कर ही करेगी।’
इस जवाब से फर्नांडीस कहां संतुष्ट होने वाले थे। उन्होंने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटील से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने की मांग कर डाली। उन्होंने अध्यक्ष से अनुरोध किया कि शंकरानंद साहब को सीधा जवाब देने को कहा जाए। लेकिन पाटील ने उनकी मांग को सिरे से नकार दिया। उन्होंने फर्नांडीस से कहा कि अगर उन्हें इस मुद्दे पर ज्यादा जानकारी चाहिए तो वह पेट्रोलियम मंत्री से पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं।
बस, फिर क्या था? फर्नांडीस ने इस मौके का इस्तेमाल और ज्यादा जानकारी निकालने के लिए किया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के आम चुनाव के दौरान किए गए वादे की याद दिलाई। दरअसल, पार्टी ने वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो पहले 100 दिनों में ही वह जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगा देगी। साथ ही, उसने यह भी कहा था कि वह डीजल और केरोसीन की कीमतों को 10 जुलाई, 1990 को मौजूद कीमतों के स्तर पर वापस ले जाएगी।
उसी समय लालकृष्ण आडवाणी भी इस मुद्दे पर कूद पड़े। उन्होंने भी मंत्री जी से सीधे-सीधे जवाब देने को कहा कि क्या कांग्रेस सरकार अपने चुनावी वादे के तहत डीजल और केरोसीन की कीमतों को कम करने के बारे में सोच रही है। इस पर शंकरानंद का जवाब था कि उनकी सरकार का लक्ष्य उन सभी मकसदों को पूरा करने का है, जो हमारे पार्टी के घोषणापत्र में शामिल हैं।
जब आडवाणी ने इस मुद्दे पर और भी साफ जवाब की मांग की तो शंकरानंद ने और भी ढुलमुल सा जवाब दिया था। मंत्री जी ने कहा था कि, ‘डीजल और केरोसीन की कीमतों के बारे में कोई भी फैसला लेने से पहले तेल की आपूर्ति, मांग में इजाफे और दूसरे सामाजिक आर्थिक मुद्दों को ध्यान रखा जाएगा। साथ ही, सरकार इस बारे में बजट में एक प्रस्ताव को शामिल करेगी।’ लेकिन फर्नांडीस को कहां चैन आने वाला था?
उन्होंने पेट्रोलियम मंत्री से एक और पूरक सवाल पूछ कर यह जानना चाहा कि क्या सरकार उस गल्फ सरचार्ज को सही मानती है, जो पूर्ववती वी.पी.सिंह सरकार ने देश की जनता के ऊपर लादा था? लेकिन शंकरानंद बाबू इस मुद्दे पर भी सीधा जवाब देने के मूड में नहीं थे। वह जल्द से जल्द इस बहस को खत्म करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने जवाब दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं है कि गल्फ सरचार्ज देश की जनता के ऊपर लादा गया था।
इसे क्यों लगाया गया था, इस बारे में तो पूर्ववर्ती सरकार ही अच्छी तरह से जानती है। यह बात देश की जनता भी जानती है। राजकोषीय नीतियों से संबंधित घोषणाएं तो बजट पेश करने के वक्त ही की जाती हैं। मैं इस तरह की राजकोषीय नीतियों के बारे में चर्चा करके सदन का वक्त बर्बाद नहीं करना चाहता।’
इसी समय जसवंत सिंह ने एक बड़ा ही जायज सवाल पूछा। उनका सवाल था कि, ‘गल्फ सरचार्ज तो एक खास हालत में लगाया गया था, जब कुछ समय के लिए कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 40 डॉलर तक चली गई थी। आज की तारीख में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल केवल 22 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर मिल रहा है। इसलिए गल्फ सरचार्ज को जारी रखने की कोई खास तुक नहीं है, जब कच्चे तेल की कीमत 40 डॉलर से घटकर 22 डॉलर पर आ गई है।
तो क्या बदलते हालात में सरकार गल्फ सरचार्ज को खत्म कर देगी, ताकि कीमतें सामान्य स्तर पर आ जाएं?’ मंत्री जी ने इस मुद्दे का कोई सीधा जवाब नहीं दिया। इसी के साथ लोकसभा में 16 जुलाई, 1991 को तेल की कीमतों पर एक बड़ा मजेदार प्रश्नकाल खत्म हो गया। इसके ठीक आठ दिन बाद नरसिंह राव सरकार में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने 1991-92 का बजट पेश किया। इसमें उन्होंने पेट्रोल और रसोई गैस की कीमतों में इजाफा कर दिया, जो 20 फीसदी तक का था।
हालांकि, उन्होंने डीजल की कीमतों में कोई भी फेरबदल नहीं किया और केरोसीन की कीमतों में 10 फीसदी की कटौती कर दी। तेल की कीमत पर लगने वाले 25 फीसदी के गल्फ सरचार्ज को वी.पी. सिंह सरकार ने ऐसे समय पर लगाया था, जब अगस्त, 1990 में कच्चे तेल की कीमत दोगुनी होकर 40 डॉलर के स्तर पर पहुंच गई थी। इसके एक साल के बाद कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में 45 फीसदी की गिरावट आ गई थी, लेकिन मनमोहन सिंह को उनके प्रधानमंत्री का पूरा साथ मिला।
इसी वजह से गल्फ सरचार्ज भी बरकरार रहा और पेट्रोल व एलपीजी की कीमतों में इजाफा भी किया गया। हालांकि, डीजल और केरोसीन पर सरकार का नरम रवैया जारी रहा, ताकि कांग्रेस पार्टी के घोषणापत्र में किए गए वादों का सम्मान किया जा सके। इस बात को आज 17 साल हो चुके हैं। आज मनमोहन सिंह खुद प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में केवल 10 फीसदी इजाफे की घोषणा की है, जबकि रसोई गैस की कीमत में 17 फीसदी का इजाफा हुआ है।
यह भी ऐसे हालात में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पिछले एक साल में लगभग दोगुनी हो चुकी हैं। यह बात इस बात का सबूत है कि कैसे भारत में सरकारें समय के साथ मजबूत होने के बजाए कमजोर हो गई हैं और लोकलुभावनी घोषणाओं की तरफ भागी जा रही हैं। आज तो इनमें इतना भी दम नहीं रहा है कि हालात के मुताबिक कोई मजबूत फैसला ले सकें।