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शायद ही कम हो महंगाई की पीड़ा

Last Updated- December 07, 2022 | 12:01 AM IST

देश में महंगाई के बारे में तमाम भविष्यवाणियां की जा रही हैं। कुछ अधिकृत अर्थशास्त्री और मंत्रियों का कहना है कि महंगाई कम होने में तीन महीने का समय लगेगा।


बहलहाल, आंकड़ों और प्रचलनों पर गौर करने पर पता चलता है कि स्थितियां बहुत बेहतर नहीं हैं। थोक मूल्य सूचकांक के 2007-08 के आंकड़ों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक इस साल की महंगाई दर के बारे में आश्चर्यजनक आंकड़े निकलकर सामने आते हैं। हालांकि ज्यादातर लोग इस बात की पुष्टि करते हैं कि थोक मूल्य सूचकांक की चाल, नीतिगत फैसले तय करते हैं।

31 मार्च 2007 से 29 मार्च 2008 के दौरान सूचकांक 210.4 अंकों से 226.0 अंक पर पहुंच गया। इसमें 7.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। लेकिन मार्च 2007 के अंत से लेकर गर्मियों के अंत (30 जून 2007) के दौरान सूचकांक में मामूली बढ़त दर्ज की गई। इस दौरान यह 212.8 अंकों तक ही पहुंचा।

वास्तव में सूचकांक लंबे समय तक बढ़त बनाए रहा। लेकिन तेजी से हो रहे वैश्विक परिवर्तन, जिसमें हम जी रहे हैं, का ध्यान रखते हुए हमें कम समय की बजाय लंबे समय के लिए अनुमान लगाना चाहिए। सूचकांक को देखते हुए इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर कीमतें वर्तमान स्तर पर स्थिर रहती हैं, तो भी महंगाई दर 7 प्रतिशत के करीब बनी रहेगी।

वर्तमान में 19 अप्रैल 2008 के आंकड़ों के मुताबिक सभी जिंसों का सूचकांक 227.5 अंकों पर था। अगर हम यह कल्पना करें कि यह इसी स्तर पर बना रहेगा, तो भी उपभोक्ताओं को कुछ राहत रहेगी। मुद्रास्फीति की दर अभी भी गर्मियों के अंत तक 7.5 प्रतिशत से 6.9 प्रतिशत के बीच बनी रहेगी। इस दर के बने रहने पर यह जरूरी होगा कि थोक मूल्य सूचकांक में पूरी तरह से गिरावट आए। ऐसी गिरावट का क्या मतलब है?

ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि मार्च 2007 से जून 2007 के बीच सूचकांक के अंकों की चाल पर सूचकांक में शामिल बड़े ग्रुप्स का पड़ा, जो आम उपभोक्ता प्रयोग करता है। बाद में स्वाभाविक है कि छोटे भारांक वाले जिंसों का असर रहा। गेहूं, दाल और चीनी के दामों पर गर्मियों के दौरान कोई असर नहीं पड़ा, जिन पर आंशिक नियंत्रण है। इसका अपवाद केवल वह मौसम रहा जब गन्ने की पेराई की जाती है। 

आरबीआई ने विभिन्न चीजों पर पड़ने वाले मौसमी प्रभाव के बारे में प्रकाशित किया है। उनमें से एक का प्रकाशन भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सितंबर 2007 में प्रकाशित बुलेटिन में 1995-96 से 2006-07 के आंकड़े शामिल हैं। आंकड़ों का गहन अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि कुछ अपवादों के साथ मौसमी प्रभाव धूमिल पड़ने लगा है।

 चार दशक पहले मौसम का जो प्रभाव था वह अब कहीं नजर नहीं आता। रिजर्व बैंक ने हाल ही में यह तर्क दिया था कि मौसम का प्रभाव अभी भी बरकरार है। लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि मौसम का कीमतों पर बहुत ही मामूली असर है। जिस समय का अध्ययन किया गया है सभी जिंसों के थोक मूल्य सूचकांक पर मौसमी परिवर्तन की औसत सीमा 1.4 रही है, जो 0.2 का मामूली मानक विचलन है।

पिछले दिनों खरीफ बेहतर मौसम था जब जिसमें भारी मात्रा में पैदावार हुई। अब  रबी भी कमोबेश खरीफ के मौसम की तरह महत्वपूर्ण है, खासकर खाद्यान्नों के मामले में। सिंचाई की सुविधाएं बढ़ाने और कृषि क्षेत्र में विविधता की वजह से निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। जहां तक विनिर्माण क्षेत्र का सवाल है, बीते दिनों में तमाम महत्वपूर्ण उद्योग जिसमें काटन और जूट, टेक्सटाइल, खाद्य प्रशंसकरण शामिल हैं, कृषि से सीधे जुड़े रहे हैं।

अब इस बात पर गौर दिए जाने की जरूरत है कि तमाम महत्वपूर्ण उद्योग हैं, जिनपर कृ षि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसमें हम पेट्रोलियम उत्पादों, इंजिनियरिंग गुड्स, जेम्स ऐंड ज्वैलरी, केमिकल्स, फामास्यूटिकल्स और सूचना प्रौद्योगिकी की गणना कर सकते हैं। इन क्षेत्रों का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव बढ़ा है, जो पूरे साल काम करते हैं।  कुछ समय पहले रिजर्व बैंक ने अपने त्रैमासिक अध्ययन में इस बारे में अध्ययन किया था।

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि मौसम के मुताबिक आकलन करना सामयिक नहीं रह गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मांग का सीधा प्रभाव कुछ जिंसों पर पड़ता है। खासकर अनाजों और सब्जियों पर इसका प्रभाव अधिक होता है। इस बात के लिए धन्यवाद दिए जाने की जरूरत है कि लोगों का जीवन स्तर और आय बेहतर हुआ है। खाने की आदतों में परिवर्तन दूसरा कारण है। चुनावी साल होने की वजह से तेल सूचकांक में कोई परिवर्तन नहीं आया है। 

स्वाभाविक है कि इसमें कोई गिरावट नहीं होने जा रही है।  तेल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार भी अपने विचारों में परिवर्तन लाएगी। जहां तक विनिर्मित वस्तुओं का सवाल है, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए इसमें कोई कमी आने की संभावना नजर नहीं आती। उपभोक्ता का संबंध इस बात से होता है कि वह किसी चीज को खरीदने के लिए कितना पैसा खर्च करता है। उसे तकनीकी विश्लेषणों और मौसमी प्रभाव और प्रवृत्तियों से मतलब नहीं होता।

हाल ही में यह सवाल उठा था- क्या कीमतों और महंगाई दर में गिरावट आएगी? यह होना बहुत कठिन लगता है। खाद्य तेल की कीमतों के मामले में कुछ नरमी की गुंजाइश है, वह आयात के चलते होगा। गर्मियों के मौसम में सब्जी की आवक कम होती है। इस तरह से इस स्तर पर राहत की कोई उम्मीद नहीं बन रही है। अगर सब्जियों की कीमतें आम की तरह ही ऊपर नहीं जाती हैं तो यह बहुत ही राहत की बात होगी।

अगर केले की कीमत 2 रुपये प्रति केला से अधिक नहीं होती तो राहत मिलेगी, क्योंकि ज्यादातर लोग इसका उपभोग करते हैं। मुंबई के तीसरे दर्जे का उडिपी रेस्टोरेंट भी आम लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। 

अगर 12.5 प्रतिशत वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) लागू किया गया तो महानगरों में रहने वाले लोगों की जिंदगी कठिन हो जाएगी। सरकार कुछ जिंसों की आपूर्ति बढ़ाकर थोड़ा बहुत राहत दे सकती है। सब्जियों और फलों के मामले में यह भी नहीं हो सकता। इससे केवल चावल दाल और गेहूं की कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है, जिसके लिए आपूर्ति बढ़ाने का विकल्प है।

First Published - May 17, 2008 | 12:24 AM IST

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