बुधवार की सुबह मैंने एक कूड़े बीनने वाले से पूछा कि क्या उसने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(माकपा) के बारे में सुना है?
जवाब में उसने दो मिनट सोचने के बाद अपना सिर न में हिलाया। हालांकि, उसने पेप्सी और कोका कोला के बारे में जरूर सुन रखा है। अभी मंगलवार को ही लोकसभा में 61 सदस्यों वाले वामदलों ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। माकपा इन चार वामदलों में से सबसे बड़ी पार्टी है और अक्सर गरीबों का मसीहा होने का दम भरा करती है।
कूड़े बीनने वाले उस शख्स ने कोका कोला और पेप्सी का नाम इसलिए सुन रखा है क्योंकि उसका एक रिश्तेदार अपने गांव में एक परचून की दुकान में काम करता है, जहां ये कोल्ड डिं्रक मिलती हैं। इसलिए वह भी इन्हें पी चुका है। वह भी अपने रिश्तेदार की तरह इसी तरह का कोई काम करना चाहता है। अब आप ही बताएं क्या इस बात ने उसे ‘अमेरिकियों का कुत्ता’ (इस मुहावरे का इस्तेमाल 60 के दशक में वामपंथी दल खूब किया करते थे ) बना दिया? या फिर वह भी एक ऐसा इंसान है, जो तेजी से बढ़ते एक मुल्क में तरक्की करना चाहता है?
मतलब एक ऐसा शख्स, जिसे आजकल आम आदमी कहना फैशन बन गया है। ज्यादा उम्मीद है कि आप उस शख्स को आम आदमी ही कहेंगे, न कि ‘अमेरिकी कुत्ता’। ऐसी हालत में आप को भी हैरानी हो रही होगी कि आखिर अब मुल्क में कम्युनिस्ट आंदोलन की क्या अहमियत रह गई है? यहां एक गरीब इंसान है, जो वामदलों की विचारधारा के केंद्र में है। लेकिन उस शख्स को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के जरिये पैसे कमाने का रास्ता दिख रहा है। ऐसे शख्स की सोच और वामदलों की सोच के बीच में जो खाई है, उसकी चौड़ाई इस धरती की सबसे बड़ी खाई की चौड़ाई से भी ज्यादा है।
मजे की बात यह है कि वामपंथी पार्टियां उस कूड़े बीनने वाले शख्स जैसे लोगों की ही सच्ची दोस्त होने का दम भरा करती हैं और इन दोनों की सोच में इतनी बड़ी खाई है। वामदलों ने सरकार से इसलिए समर्थन वापस लिया क्योंकि उन्हें डर था कि भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते को अमली जामा पहना दिए जाने से मुल्क अमेरिकी ‘साम्राज्यवाद’ के पंजे में फंस जाएगा। फिर अमेरिकी कंपनियां मनमाने तरीके से हमारे मुल्क का खून चूस सकेंगी। लेकिन जो लोग हाशिये पर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं, उनसे आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उनके लिए बड़ी कंपनियों की संभावित ‘दुष्ट’ योजनाएं कोई मायने रखेंगी।
उन्हें तो अपनी नौकरी की फिक्र होगी, जिनसे उन्हें दो वक्त की रोटी मिल सकती है। यह सचमुच अनोखी बात है कि माकपा, भाकपा, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक जैसे वामदल नहीं, बल्कि मुल्क की बड़ी कंपनियां और गरीब लोग एक-दूसरे के बारे में ज्यादा जानते हैं। इस बात की भी अपनी अहमियत है कि कई बड़े-बड़े कारोबारियों ने कम भ्रष्ट पार्टियों के सत्ता से बाहर जाने पर संतुष्टि जाहिर की। भले ही उनकी जगह ऐसी पार्टी सत्ता पर काबिज हो जाए, जिसकी ईमानदारी के रिकॉर्ड ज्यादा अच्छे न रहे हों और जिसके पास अर्थव्यवस्था को लेकर कोई निश्चित विचारधारा न हो। बंबई स्टॉक एक्सचेंज में आज राहत का माहौल है।
भारत ने आर्थिक सुधारों की जबरदस्त ताकत को दूसरे किसी भी मुल्क से ज्यादा अच्छी तरह से पहचाना है। अर्थशास्त्री और नीति-निर्धारक इस बात पर कितनी ही लंबी बहस क्यों न कर लें कि आज गरीबी कितनी कम हुई है। लेकिन इस बात से किसी को ऐतराज नहीं है कि आर्थिक सुधारों के बाद गरीबी तो सचमुच कम हुई है। आप मानें या न मानें हाशिये पर रहने वाले लोगों ने भी इस बात को बड़ी आसानी से स्वीकार कर लिया है। लेकिन शायद इस पूरी बात को वामदलों ने सिरे से नजरअंदाज कर दिया। वामपंथी दलों ने समर्थन वापसी पर जो बयान जारी किया है, उसके एक पैराग्राफ में इसकी झलक मिलती है।
उसमें लिखा है कि,’भारत-अमेरिकी परमाणु करार मुल्क के हितों के लिए गलत है। कांग्रेस नीत इस सरकार ने अमेरिकी के साथ एक रणनीतिक समझौता कर रखा है। इस डील की वजह से अब अमेरिका को हमारे रक्षा समझौतों में अहम जगह दी जा रही है। इस वजह से अमेरिकी पूंजी की रिटेल और शिक्षा धड़ल्ले से आ रही है।’ यह बात थोड़ी अजीब लगती है न, लेकिन इस वक्त रिटेल और शिक्षा जैसे क्षेत्रों को अमेरिकी क्या, किसी भी मुल्क की पूंजी की जरूरत है। स्वदेशी अब बीते कल की बात हो चुकी है।
अब तो इनके साथ-साथ टेलीकॉम, बैंकिंग, एयरलाइंस, बीमा और मीडिया तक को ज्यादा से ज्यादा विदेशी पूंजी की जरूरत है। यह न सिर्फ बाजार में खुद को बरकरार रखने और विस्तार करने के लिए जरूरी है, बल्कि समाज के हरेक वर्ग के लिए नौकरियों की जरूरत को भी पूरा करने के वास्ते इसकी जरूरत है। आंकड़े पूरी तस्वीर को नहीं दिखा सकते हैं, लेकिन पूरे माजरे पर निगाह रखने वाले लोग-बाग इसकी गवाही दे सकते हैं। अब जेनपैक्ट के सीईओ प्रमोद भसीन को ही ले लीजिए, जिन्होंने अक्सर बताया है कि कैसे सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी सेवाओं ने खान-पान, परिवहन और सिक्योरिटी सर्विसेज जैसे सेक्टरों में नए अवसर पैदा किए।
सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी सेवाएं अपने मुल्क में कामयाब हैं तो अमेरिका की वजह से, जहां से इसके लिए सबसे ज्यादा मांग आती है। इस सेक्टर ने कई अकुशल लोगों को नौकरियां मुहैया कराईं। वामदलों के रिकॉर्ड को देखें तो उसे एक मिसाल तो कतई नहीं कहा जा सकता। आज भी वामपंथी एक ऐसी विचारधारा के पीछे भाग रहे हैं, जिसे पूरी दुनिया एक बड़ी नाकामयाबी के रूप में देखती है। यहां तक कि रूस और चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों ने भी इससे पीछा छुड़ा लिया है। इससे भी बुरी बात यह है कि वे असल समस्याओं के बारे में सोच ही नहीं रहे हैं।
उनकी नजर मुल्क में यूनियन से बाहर काम करने वाले 90 फीसदी मजदूरों की दिक्कतों, स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती हालत, घटिया शिक्षा व्यवस्था, बद से बदतर होती पर्यावरण की हालत और सामाजिक सुरक्षा की बुरी गत पर जाती ही नहीं है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जहां मैंने उस कूड़े बीनने वाले बात की थी, वह जगह माकपा नेता सीताराम येचुरी के घर से कुछ ही दूरी पर है। सचमुच कितने दूर, कितने पास।