इस्पात बनाने वाली तमाम दिग्गज कंपनियों ने सरकार की गुहार के बाद कीमतें बढ़ाने पर तीन महीने की जो रोक लगाई थी, उसकी मियाद पूरी हो गई है, लेकिन कीमतों में इजाफे का कोई भी ऐलान इस महीने शायद ही सुनाई देगा।
सरकार ने इस्पात उद्योग से निर्यात के मामले में भी नरमी बरतने की बात कही थी और इसके बदले उसने निर्यात पर तमाम प्रतिबंध नहीं लगाने और निर्यात कर से भी तौबा करने का वायदा किया था। ऐसा लगता है कि इस्पात कंपनियों ने इस बात पर भी गौर करने का फैसला किया है।
जून में समाप्त हुई तिमाही के आंकड़ों पर निगाह डालें, तो पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले निर्यात में 31 फीसद की गिरावट आई, जबकि दुनिया भर में इस्पात की कीमत भारत के मुकाबले तकरीबन तीन गुना थी।
उद्योग और सरकार के बीच यह शानदार तालमेल (हो सकता है कि कुछ लोग इसे बंदूक की नोक पर हुआ तालमेल कहें) उस धींगामुश्ती के ठीक उलट है, जो चंद महीनों पहले ही सरकार और सीमेंट उद्योग के बीच देखने को मिली थी।
दरअसल इस्पात के मामले में ऐसा कोई टकराव सरकार और उद्योग दोनों के नरम रुख की वजह से ही नहीं दिखा। हालांकि दोनों ने अपना चिर परिचित रवैया ही रखा था, लेकिन एक दूसरे के लिए थोड़ी सी गुंजाइश छोड़ दी थी। सरकार कीमतों में इजाफा रोकने में कामयाब रही क्योंकि हर तरह की कीमतों पर अंकुश नहीं लगाई गई थी।
यह अंकुश केवल हाजिर कीमतों पर था, जिनकी प्रति टन हिस्सेदारी बमुश्किल 40 फीसद होती है। लंबी मियाद के करार, जो निर्यात के मामले में कारोबारियों पर असर डालते हैं, पर इस अंकुश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।
इस्पात के दिग्गज अब तक खामोश बैठे हैं क्योंकि फिलहाल वे सरकारी लौह अयस्क निर्यातक कंपनी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) और जापानी आयातकों के बीच कीमतों पर चल रही बातचीत के नतीजे की बाट जोह रहे हैं।
अगर एनएमडीसी को जापानियों से मोटी कीमत हासिल हो जाती है, जैसी ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों को चीनी कंपनियों से मिली थी, तो लौह अयस्क और इस्पात की कीमतों में भी इजाफा हो जाएगा। वैसे भी इस्पात उद्योग इस तिमाही को अच्छा मान रहा है और वह घरेलू या अंतरराष्ट्रीय बाजार में हालात बिगड़ने की कल्पना भी नहीं करना चाहता।
दूसरी ओर सीमेंट उद्योग पहले से ही परेशान है क्योंकि घर में मांग लगातार कम हो रही है। हालांकि यह भी सच है कि यदि बड़ी भारतीय कंपनियां कीमतों में अच्छा खासा इजाफा करती हैं, तो उनकी कमाई भी काफी अच्छी होगी। भारतीय कंपनियां इसके जरिये अपनी तिजोरी भी भर सकती हैं, जो अगले बुरे दौर में उनके काफी काम आएगा।
भारत की बड़ी इस्पात कंपनियां खामोश बैठी हैं क्योंकि उन्हें पता है कि दुनिया भर में सबसे कम कीमत के उत्पाद उन्हीं के पास हैं, इसलिए अपना भविष्य सुखद होने का उन्हें पूरा यकीन है। वैसे भी भारत या चीन में लंबे अरसे तक मांग में कोई कमी आने के आसार नहीं दिख रहे हैं, उल्टे मंदी के बावजूद दोनों देशों में इस्पात की खपत लगातार बढ़ने की भरपूर संभावनाएं नजर आ रही हैं।
भारत में इस्पात की कीमतों पर नजर डालें, तो भारतीय कंपनियां अपना कोई भी उत्पाद बेच देंगी और उन्हें घर और बाहर अच्छा खासा बाजार मिल जाएगा। बस एक ही दिक्कत सामने है कि भविष्य में वे कितना उत्पादन कर पाएंगी।