भारतीय अर्थव्यवस्था को देखकर ऐसा लग रहा है, मानों ढलान पर लुढ़कने का उसका सफर शुरू हो रहा है।
हालांकि पिछले कुछ महीनों में विभिन्न सूचकांकों में अजीब सी हरकत देखी जा रही है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में हालात कुछ अलग ही हो गए और कशमकश भी बढ़ गई। वैसे मेरा यही मानना है कि आर्थिक अस्थिरता की ये अटकलें और उसकी संभावनाएं अभी बहुत क्षीण हैं।
लेकिन यह सोचना जरूरी हो गया है कि आर्थिक संकट के इन संकेतों से किस तरह निपटा जाए और इस उठापटक से बचने या उबरने के लिए तमाम कारोबारों को किस तरह के उपाय करने होंगे।
नीति निर्माताओं को भी अस्थिरता के विभिन्न कारणों या स्रोतों के लिए वैकल्पिक उपाय तलाशना शुरू करना होगा। इसके साथ ही उन्हें इन उपायों के लिए तकनीकी और राजनीतिक दोनों ही तरह के आधार भी अभी से तैयार करने होंगे। इस आलेख में मैं ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश करूंगा, जो वैश्विक और स्थानीय कारकों के प्रतिकूल प्रभाव की वजह से पैदा हो सकती है।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि अमेरिका में जिस मंदी को अभी हल्की फुल्की समस्या माना जा रहा है, वही भारत या समूचे एशिया में बड़ी अस्थिरता पैदा करने वाला मुख्य कारक है। कई महीने बीत चुके हैं, हम क्षेत्रीय मंदी के लिए अमेरिकी मंदी को ही जिम्मेदार मानकर चर्चा करने में जुटे हुए हैं।
इस दौरान तेल, खाद्य और तमाम प्राकृतिक संसाधनों की कीमत उस स्तर तक पहुंच गई, जहां उसे किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक माना जाने लगा, खास तौर पर उस अर्थव्यवस्था के लिए जो इनमें से किसी एक या दो के आयात पर निर्भर है।
यदि अमेरिका की मंदी रफ्तार के मामले में उतनी धीमी है, जितने आंकड़े बताते हैं (पहली तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के आंकड़े नकारात्मक 0.2 फीसद रहे), तो जिंसों खास तौर पर तेल की कीमत मौजूदा स्तरों से काफी नीचे आने की अपेक्षा बेमानी ही होगी। यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था अपनी विकास की रफ्तार को फिर पटरी पर ले आती है, तब तो दुनिया भर को कमोडिटी के और भी ज्यादा दामों से जूझना पड़ेगा।
खाद्य मूल्यों के खतरे उतने ज्यादा नहीं हैं क्योंकि हाल के महीनों में हरेक मुल्क को इनकी बढ़ती कीमतों से जूझना पड़ा है और उसकी वजह से आने वाले महीनों में सभी देश खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। ऊंची कीमतों के साथ दूसरी रियायतें मिलने से हालात में काफी सुधार हो जाना चाहिए। लेकिन तेल और प्राकृतिक संसाधन मिलकर दुनिया भर में कीमतों पर जबरदस्त प्रतिकूल असर डाल सकते हैं। इससे मांग और मुनाफा देने की प्रवृत्तिपर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव निवेश संबंधी क्रियाकलापों पर भी पड़ेगा।
इस संकट से निपटने की केंद्रीय बैंकों की क्षमता कम वक्त में तो किसी काम नहीं आ सकेगी यानी दीर्घकालिक उपाय करने में तो वे कारगर साबित हो सकते हैं, लेकिन अल्पकालिक उपाय उनके वश में नहीं। महंगाई से निपटने की रणनीति के तौर पर ब्याज दरों में इजाफा करने मांग तो कम हो जाएगी और उसकी वजह से कमोडिटी के मूल्य भी कम हो जाएंगे, लेकिन ऐसा तुरंत नहीं, बल्कि कुछ महीनों में ही होगा।
इस बीच मुद्रास्फीति की दर बढ़ती रह सकती है क्योंकि कमोडिटी के मूल्य उस पर लगाम नहीं लगने देंगे। अगर वक्त की कमी के मसले को दरकिनार कर दें, तो भी ब्याज दरें बढ़ाना ऐसे वक्त में कोई दानिशमंदी का काम नहीं कहा जाएगा, जब आर्थिक विकास का पहिया पथरीले रास्ते पर चला गया हो। पिछले साल के अंत में अमेरिका में तस्वीर बिल्कुल ऐसी ही थी और अब भारत के सामने भी यही सूरत-ए-हाल है।
2007-08 में सकल घरेलू उत्पाद के बारे में अनुमान लगाकर विकास की दर 9 फीसद बताई गई थी, लेकिन हालत तो उससे बिल्कुल जुदा है। पिछले कुछ समय से विकास की तेज रफ्तार का एक अहम घटक विनिर्माण क्षेत्र था। 2006-07 में इसकी विकास दर 12 फीसद थी, जो पिछले वित्त वर्ष में घटकर केवल 8.8 फीसद रह गई। सबसे बड़ी बात है कि वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में तो यह आंकड़ा 6 फीसद से भी कम रहा।
कई प्रमुख विनिर्माण क्षेत्र ब्याज दरों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। इसलिए महंगाई से लड़ने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाने के मामले पर भारतीय रिजर्व बैंक के लिए फैसला करना इतना आसान भी नहीं है। अगर विकास की रफ्तार धीमी पड़ती है, तो कर से होने वाले राजस्व में भी कमी आएगी। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से घरेलू ग्राहकों को बचाने के सरकारी प्रयास के कारण उपजी वित्तीय समास्याओं में इससे इजाफा ही होगा।
यदि यह अंतर बरकरार रहता है, तो इस साल के आखिर तक तेल सब्सिडी ही अनुमानित वित्तीय घाटे से ज्यादा हो जाएगी। समाधान सीधा है, कीमतें बढ़ा दी जाएं। लेकिन उस हालत में यह और भी मुश्किल है, जब मुद्रास्फीति की दर पहले से ही कुलांचे मार रही है। अंत में, भुगतान के संतुलन की बात पर आते हैं। यह मसला काफी समय से हमारे जेहन से बाहर था, लेकिन एक बार फिर यह माथे पर शिकन डाल सकता है।
विकास की रफ्तार अगर काफी कम हो जाती है, तो पूंजी आना भी कम हो जाएगा और तेल कीमतों के कारण पैदा हुआ चालू खाते का घाटा बढ़ने का डर खड़ा हो जाएगा। घरेलू और विदेशी निवेश अगर पूंजी बाहर भेजते हैं, तो रुपये की कीमत कम हो जाएगी और भुगतान का संतुलन और बिगड़ जाएगा।
कुल मिलाकर हमारे सामने होगी, मंद पड़ती विकास की रफ्तार, या तो बेहद ऊंची मुद्रास्फीति दर या वित्तीय घाटा या फिर शायद दोनों ही और भुगतान की कमी की बढ़ती खाई और उनसे भी ऊपर रुपये की कम होती कीमत। यह वह तस्वीर है, जब आर्थिक स्थायित्व की पारंपरिक नीतियां और उपाय कारगर साबित नहीं होते। यह बेहद खौफनाक खयाल है और भारत में अवसरों की उन कहानियों से बिल्कुल उलट भी, जिन पर हम पिछले 4 साल से भरोसा कर रहे हैं।
क्या यह उस सपनीले सफर का खात्मा है? यह हो भी सकता है, लेकिन ऐसा होना नहीं है। ऐसी हालत में, सबसे सही तरीका वह होता है, जो समस्या की जड़ से ही खोजा जाता है और सबसे प्रभावी भी होता है। इसलिए पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ाना तो किसी भी नीति के केंद्र में होना चाहिए। इससे समस्या खत्म नहीं होगी, लेकिन यह कदम उठाए बिना कोई भी दूसरा उपाय कारगर साबित नहीं हो सकता। अगर अगले कुछ महीनों में दुनिया भर में कीमतें कम होती हैं, तो मौद्रिक नीति आर्थिक सुस्ती से निपट सकती है।