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सपनों को कैसे पूरा करे डीटीसी?

Last Updated- December 07, 2022 | 2:43 PM IST

दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के बेड़े में करीब 3,600 बसें हैं। मौजूदा बसों में से तकरीबन आधे को बाहर करने के बाद भी अगले दो सालों में इस काफिले में 80 फीसदी बसें और शामिल हो जाएंगी।


ऐसा नहीं है कि जिन बसों को अलविदा कहा जा रहा है वे पुरानी हो चुकी हैं, बल्कि इनमें से कुछ को तो थोड़े साल पहले ही इस काफिले में जोड़ा गया था जब डीटीसी ने बसों को डीजल को छोड़कर गैस से चलाने का निर्णय लिया था। दरअसल अब डीटीसी 5,000 नई लो-फ्लोर बसें खरीदने जा रही है, जिनमें से 25 फीसदी वातानुकूलित होंगी।

इन बसों को खरीदने के लिए डीटीसी को 1,800 करोड़ रुपये चुकाने पड़ेंगे। इनमें से कुछ ने तो दिल्ली की सड़कों पर दौड़ना भी शुरू कर दिया है और जिस खूबसूरत डिजाइन के साथ इन्हें तैयार किया गया है, उससे कहना गलत नहीं होगा कि शहर की सड़कों की रौनक बढ़ गई है। अब तक जो सीएनजी बसें चलती थीं उन्हें देखकर तो यही लगता था कि वह एक सदी से भी अधिक पुरानी होंगी। अब लगता है कि दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत के पहले बस सेवा दूसरे शहरों की तुलना में बेहतर नजर आने लगेगी।

पर डीटीसी के पास अपने सपने को पूरा करने के लिए पैसे नहीं हैं क्योंकि देश के सभी दूसरे शहर की सिटी बस सेवा प्रणालियों के नुकसान को जोड़ दें तो भी डीटीसी को उससे अधिक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। पिछले साल डीटीसी की कुल लागत राजस्व की तुलना में चार गुना अधिक थी और इस वजह से उसे 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा था। निगम का परिचालन खर्च राजस्व की तुलना में दो गुना था। यहां तक कि निगम अपने कर्मचारियों को जो तनख्वाह दे रहा था वह भी राजस्व से अधिक था।

आखिर समस्या क्या है? सड़क पर दौड़ने वाली हर बस पर डीटीसी के पास 10 कर्मचारी हैं। मुंबई की बेस्ट भी डीटीसी की तुलना में कम बसों के होने के बाद भी 75 फीसदी अधिक यात्रियों को यात्रा कराती है। मुंबई में बसें एक चक्कर पूरा करने में दिल्ली के मुकाबले कम फासला तय करती हैं। लेकिन, दोनों शहरों में हरेक बस में चलने वाले मुसाफिरों की तादाद में जमीन आसमान का फर्क है। समस्या दरअसल भारत के सरकारी क्षेत्र की ही है।

नागरिकों को सेवाएं तो देनी हैं लेकिन इसके लिए चुने गए वाहन बेहद घटिया तरीके से चलाए जाते हैं। इस काम के लिए पैसा भी खूब बहाया जाता है मगर ढर्रा नहीं सुधरता। सड़कों पर नई बसें देखकर दिल्ली वाले खुश हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि डीटीसी का खजाना अब और लुटेगा क्योंकि चमचमाती नई बसों की लागत निकालना ही मुश्किल होगा। दिल्ली वाले इससे नावाकिफ हैं क्योंकि पिछले तीन साल से डीटीसी की सालाना रिपोर्ट ही नजर नहीं आई।

डीटीसी अब दूसरे कामों में जुट गई है। अपने 4,500 बस स्टॉपों को वह नया जामा पहना रही है ताकि विज्ञापन से करोड़ों रुपये की कमाई हो। यह रकम यात्रियों से होने वाली कमाई से ज्यादा होगी। अपने 35 डिपो को भी वह रियल एस्टेट परियोजनाओं में तब्दील करने की सोच रही है। लेकिन बसें चलाने का ढंग सुधारने की फिक्र उसे अब भी नहीं है।

First Published - August 1, 2008 | 11:23 PM IST

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