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इक धुंध से आना है इक धुंध में जाना है

Last Updated- December 07, 2022 | 5:40 AM IST

अमिताभ बच्चन ने अपनी एक फिल्म ‘शहंशाह’ में कहा था, कनफ्यूजन तो है ‘अटर’।


इस वाक्य के गूढ़ रहस्य को अगर आप समझने की कोशिश करें तो यकीनन यह लगने लगेगा कि भारत को अपना सूत्र वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ से बदलकर यही रख लेना चाहिए।

पिछले एक दशक के दौरान इसे सरकारी नीतियों का नायाब तोहफा ही कहा जाए कि खुद यहां के बाशिंदों को यह समझ में नहीं आ रहा कि आखिर देश में हो क्या रहा है। चलिए सबसे पहले अर्थव्यवस्था की बात करते हैं। एक छोटा सा सवाल क्या महंगाई दर ऊंची है? जवाब सीधा और सपाट होगा, हां।

अब दूसरा सवाल कि क्या ब्याज दरें बढ़ेंगी? जवाब फिर वही, हां। तो क्या ब्याज दरों को बढ़ाने से विकास दर धीमी हो जाएगी? हां। पर अब यह सवाल कि क्या ऐसा हुआ? पर इस बार जवाब प्रत्याशित नहीं है। जवाब है, नहीं जी, बिल्कुल नहीं। पर आखिर ऐसा हुआ क्यों नहीं जबकि अर्थव्यवस्था का गणित तो सटीक है। जवाब है, पता नहीं। क्यों यह भी नहीं पता। क्या यह सब काले धन का खेल है। नहीं जानते।

क्या कोई है जिसके पास इसका जवाब है? नहीं जनाब। पर क्या हम इतनी सी बात पर कोई राय बना लेंगे, बिल्कुल नहीं। हो सकता है कुछ सवाल उलझे हुए हों या उनका सीधा सा जवाब न हो। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम किसी निष्कर्ष पर इतनी जल्दी पहुंच जाएं।

तो चलिए जरा कृषि विकास की ओर बढ़ते हैं। क्या कृषि क्षेत्र चिंता का विषय है। जवाब एक स्वर में आया, हां बिल्कुल। यह भी कोई पूछने की बात है। तो फिर इस बार पिछले कुछ सालों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हुए कृषि विकास दर चार फीसदी पर कैसे पहुंच गई? इस सवाल का जवाब किसी को नहीं सूझ रहा। हो सकता है आधार का असर हो, पर कुछ निश्चित नहीं है।

अब वित्तीय हालात का मुआयना भी कर लेते हैं। क्या यहां स्थितियां बदहाल हैं? यह सवाल आपने किससे पूछा है, अगर वित्त मंत्री से तो निश्चित तौर पर वह कहेंगे नहीं। पर आप उन्हें छोड़कर यह सवाल किसी और से पूछ लीजिए जवाब आएगा, हां। बहुत जल्द केंद्र और राज्य का सम्मिलित घाटा बढ़कर 10 फीसदी तक पहुंच जाएगा। क्या इससे फर्क पड़ता है, शायद किसी को नहीं पता।

क्या बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है? हां, नहीं, शायद, एक बार फिर किसी को नहीं पता। मौद्रिक नीतियां सही हैं या बेतुकी हैं और उनसे कोई फायदा हो रहा है या नहीं, इस बारे में भी किसी को नहीं पता। विनिमय दर नीति सही है या गलत यह भी कोई नहीं जानता। हां इतना जरूर है कि यह सवाल आप किससे पूछ रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है। रोजगार का ग्राफ ऊपर चढ़ा है या नीचे गिरा है, इसके बारे में भी किसी को पता नहीं है।

अगर ऐसा चलता रहे तो भी चलता रहे, शायद ही किसी को आपत्ति होगी, पर क्या यही लोकतंत्र की असली परिभाषा है। पर लगभग एक दशक पूर्व हालात ऐसे नहीं थे। हमारा जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) सही तरीके से काम किया करता था। पर अब हालात बदतर होते जा रहे हैं। हम यह उम्मीद तो पाले बैठते हैं कि सब कुछ अच्छा-अच्छा होगा, पर क्या हम कभी इस बात की तैयारी करते हैं कि अगर हालात बिगड़ गए तो हम क्या कर सकते हैं।

क्या इसकी तैयारी पहले से करना जरूरी नहीं है? पर कुछ लोग इसी बात से संतुष्ट हो जाएंगे कि अगर कोई दूसरी सरकार होती तो शायद हालात इससे भी बदतर हो सकते हैं। हसे सकता है कि सत्ता कि बागडोर किसी कमजोर प्रधानमंत्री के हाथों में चली जाती। या फिर कोई ऐसी महिला इस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा रही होती जिसे यह भी नहीं पता होता कि आखिर उसकी जिम्मेदारियां क्या हैं।

या फिर जैसा कि अमेरिकी कहते हैं कि जनाब आपने अभी देखा ही क्या है, जरा अगला आम चुनाव तो होने दीजिए फिर आपको पता चलेगा कि कनफ्यूजन आखिर होता क्या है। देश के लोगों को नहीं पता कि क्या इस बार उन्हें इस कनफ्यूजन से छुटकारा मिलेगा या नहीं कि आने वाले आम चुनावों में किसकी सरकार बनेगी। कांग्रेस और बीजेपी दोनों को अगर मिला भी दिया जाए तो उनके 250 से अधिक सीटें जीतने की संभावना नहीं है।

वजह साफ है कि इनमें से किसी की भी बड़ राज्यों में मजबूत पकड़ नहीं है। हां अगर ये दोनों गठजोड़ के जरिए चुनाव के मैदान में उतरती हैं तो जरूर इन्हें क्षेत्रीय पार्टियों की जकड़न से मुक्ति मिल सकती है। अब जब इनकी चर्चा कर ही चुके हैं तो मायावती को भी इस चर्चा में शामिल कर ही लेना चाहिए। उम्मीद तो है कि उनकी पार्टी के 70 सदस्य लोकसभा के अंदर कदम रखने का टिकट कटा ही लेंगे।

और हर बार की तरह वामपंथी पार्टियों का समर्थन भी उन्हें मिलने की पूरी संभावना है ही। वामपंथी पार्टियां 35 के आस पास सीटें जीत ही लेती है और इस बार भी कुछ ऐसी ही उम्मीद है। तो कौन होगा अगला प्रधानमंत्री? अटकलें लगती रहें, जवाब क्या इतना आसान होगा, एक बार फिर कनफ्यूजन है जनाब। हां पर प्रकाश करात और मायावती दोनों ही अपना अपना भाग्य तो जरूर आजमाएंगे।

क्या उन्हें बाहर से कांग्रेस का समर्थन मिलेगा या फिर इस बार समर्थन देने की बारी भाजपा की होगी। पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता। क्यों नहीं? क्या देवगौड़ा, इंदर कुमार गुजराल और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं बने थे। इसलिए ऐसा तो कह ही नहीं सकते कि इस राजनीति में कोई बात संभव नहीं है। अगर सोनिया गांधी को अपने दुलारे को मुख्य धारा में लाना है तो उनके लिए यह शर्त सबसे सही हो सकती है। वह भी कुछ ऐसा ही मानती होंगी।

सतह के नीचे एक दूसरे किस्म का कनफ्यूजन भी पैदा हो रहा है। और इसकी बुनियाद इंदिरा गांधी की ओर से रखी गई थी। संसद, न्यायालय, चुनाव आयोग जैसे टियर 1 संस्थानों पर सीधा प्रहार करना अगर ये आपके खिलाफ जा रहे हों। पर 1980 के दशक में तो यह टियर 2 संस्थानों जैसे योजना आयोग, वित्तीय आयोग तक भी फैल चुका था। अब यह और भी ‘ऐडवांस’ स्तर पर पहुंच गया है, आरबीआई और दूसरी नियामक इकाइयों तक।

दिशाहीन, नेतृत्वविहीन, भटका हुआ सा, न कोई सोच न समझ, निगरानी की तो बात ही बेमतलब है और यहां ‘सोचना मना है।’ कुछ यही कहानी है कुछ ऐसी ही दिशा है भारत की। पर आखिर कब तक ऐसा चलता रहेगा। किसी तो इस बीमारी का इलाज ढूंढ़ना होगा या फिर लाइलाज बीमारी का तो एक ही परिणाम होता है- ‘मौत’।

First Published - June 13, 2008 | 10:33 PM IST

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