भारत के नए राष्ट्रपति के चुनाव की कवायद लगभग पूरी हो चुकी है। अगर आखिरी वक्त में कोई उथल-पुथल जैसी स्थिति न हो तो द्रौपदी मुर्मू 25 जुलाई के बाद राष्ट्रपति भवन में आने वाली पहली आदिवासी बन जाएंगी जब उस तिथि को मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे।
इसके बाद दूसरे बड़े चुनाव का वक्त आ जाएगा। यह चुनाव उपराष्ट्रपति का होगा जो 6 अगस्त को होने वाला है और यह लगभग उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि राष्ट्रपति का चुनाव। उपराष्ट्रपति राज्यसभा या संसद के उच्च सदन के पदेन सभापति भी होते हैं। इसका अर्थ यह है कि वह सदन की अध्यक्षता भी करते हैं जिसके निर्णय कानून की तरह हैं और सदन के सभी सदस्यों पर बाध्यकारी होने के साथ ही यह संसदीय तथा संवैधानिक इतिहास का हिस्सा बन जाता है।
इसका अर्थ यह भी है कि राज्य सभा सदस्य सदन के पटल पर जो भी समस्याएं लेकर आते हैं उनकी सराहना के अलावा (राज्यसभा राज्यों का सदन है, इसलिए सदन के सदस्य (सांसद) अपने राज्यों के साथ ही राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों से संबंधित समस्याओं पर भी ध्यान दिलाते हैं), उन्हें उन राज्यों का पूरा ज्ञान होना चाहिए जिनसे राष्ट्र बनता है। जाहिर है संवैधानिक कानून का व्यापक ज्ञान और उसके पूर्व उदाहरण का संज्ञान भी हो।
जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राज्यसभा के अध्यक्ष के रूप में शामिल किया गया तब उन्होंने अपने पहले ही भाषण में लॉर्ड बालफोर के बयान को याद किया कि नरक शायद एक ऐसी जगह है जहां पढ़ने के लिए एकमात्र हैंसार्ड (संसदीय कार्यवाही) की फाइल है। वे टिप्पणियां अब भी राज्यसभा के अभिलेखागार का हिस्सा हैं। यह कोई आसान काम नहीं है क्योंकि हर जगह से एतराज की गुंजाइश है।
सभापति के रूप में संसदीय कानून में पारंगत लोगों से भरे सदन को चलाने से पहले भी कई लोगों को काफी मुश्किलें आईं। निवर्तमान सभापति एम वेंकैया नायडू भी खुद को वर्ष 2020 में भावुक होने से नहीं रोक सके क्योंकि सांसदों ने एक मंत्री के हाथों से कागजात छीन लिए, कुर्सियां तोड़ दीं और सदन की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
वर्ष 1988 में सदन के सभापति शंकर दयाल शर्मा की आंखों से आंसू निकल पड़े क्योंकि राजीव गांधी के वफादारों ने व्यवस्थित तरीके से राज्यसभा चलाने की उनकी कोशिशों के बावजूद भी खूब शोर मचाया। उन वर्षों के दौरान लोकसभा में कांग्रेस के पास प्रचंड बहुमत था लेकिन राज्यसभा में विपक्ष का दबदबा था जिससे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां पैदा हो गई थीं।
सभापति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान हामिद अंसारी ने प्रश्नकाल (पारंपरिक रूप से सुबह 11 बजे से दोपहर 12 बजे तक का समय) का समय बदल दिया, जिससे कार्यवाही को बाधित करने के लिए उत्सुक विपक्षी सदस्यों के उत्साह में कमी आए।
यह समस्या का सार है: संसद की संरचना इस तरह से की गई है कि सत्तारूढ़ दल को निचले सदन में भारी बहुमत मिल सकता है लेकिन जब तक वह आम चुनावों के बाद लगभग सभी राज्यों के चुनाव जीत नहीं जाती है तब तक विपक्ष का दबदबा उच्च सदन पर हावी रहता है। इसकी वजह से राज्यसभा का संचालन विशेष रूप से मुश्किल हो जाता है और वक्त के साथ यह दिक्कत बढ़ती ही जा रही है।
निवर्तमान सभापति एम वेंकैया नायडू का कार्यकाल ही लीजिए। कोविड-19 की वजह से राज्यसभा का कामकाज बुरी तरह से प्रभावित हुआ। लेकिन महामारी से पहले, विपक्ष से निराश होकर नायडू ने सभी मौजूदा नियमों का अध्ययन करने और नए सुझाव देने के लिए राज्यसभा के पूर्व महासचिव वी के अग्निहोत्री और विधि एवं न्याय मंत्रालय में पूर्व अतिरिक्त सचिव दिनेश भारद्वाज की दो सदस्यीय समिति का गठन किया।
विचार यह था कि समय के हिसाब से वर्तमान नियमों को ध्यान में रखते हुए समीक्षा की जरूरत है, इस तरह की कवायद नियमों की समीक्षा समिति के माध्यम से पहले भी कई बार की गई थी।
दो सदस्यीय समिति की रिपोर्ट में मौजूदा नियमों में 77 संशोधनों और 124 नए नियमों को लागू करने का प्रस्ताव किया गया। सदन के संचालन के विभिन्न पहलुओं के संबंध में राज्यसभा की मौजूदा नियम पुस्तिका में कुल 303 नियम हैं। समिति ने रिपोर्ट निवर्तमान सभापति को सौंप दी।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के विधायी एवं नागरिक पहल के प्रमुख चक्षु रॉय ने कहा, ‘हम नहीं जानते कि रिपोर्ट में क्या है क्योंकि इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है।’ लेकिन उनका कहना है कि चार व्यापक क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, ‘पहला, ऐसा लगता है कि संसद के दोनों सदन ज्यादातर सरकारी कामकाज के लिए ही मिलते हैं। समिति को अन्य राजनीतिक दलों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार-विमर्श के साथ सरकारी कामकाज को पूरा करने में संतुलन बनाना होगा। दूसरा, संसद के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा तंत्रों (जैसे प्रश्नकाल) ने अपनी धार खो दी है। समिति को इन तंत्रों में पूरी तरह बदलाव करने के लिए उपाय सुझाने होंगे। तीसरा, संसद के सामने आने वाले मुद्दे अब पहले से कहीं अधिक जटिल और तकनीकी हैं। ऐसे माहौल में, सदन में विचार-विमर्श को मजबूत करने के लिए समिति के सुझाव अहम होंगे। आखिरकार संसदीय कार्यवाही में व्यवधान एक नियमित दिनचर्या वाला मामला बन गया है। समिति के पास सुचारु रूप से संसदीय कार्यवाही चलाने के लिए समाधान सुझाने का कठिन काम है।’
आगामी अध्यक्ष का काम न केवल व्यवस्थित और लोकतांत्रिक तरीके से राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन करना होगा बल्कि यह इससे भी संबंधित होगा कि अग्निहोत्री समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई की जाए या कोई अन्य समिति गठित की जाए।
एस राधाकृष्णन ने कहा था, ‘संसद हमें बराबर का हिस्सा बनने की भावना देती है। यह हमें वास्तविकता का अहसास भी कराती है।’ नए सभापति को इस चुनौती का समाधान करना होगा।