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मुद्रास्फीति का असर

Last Updated- December 11, 2022 | 6:31 PM IST

जनवरी-मार्च 2022 (वित्त वर्ष 2022 की अंतिम तिमाही) में 2,939 सूचीबद्ध कंपनियों (जिनकी न्यूनतम बिक्री एक करोड़ रुपये) के नतीजों से संकेत मिलता है कि आर्थिक वृद्धि जारी है लेकिन उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर खपत और मांग जैसे चुनौतीपूर्ण पहलू भी हैं। तेल एवं गैस, रिफाइनिंग, बैंकिंग तथा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) जैसे अस्थिर क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो भारतीय उद्योग जगत की शुद्ध बिक्री 19 प्रतिशत बढ़ी है जबकि ‘अन्य आय’ में  40 प्रतिशत की उछाल आई है। इसकी वजह से परिचालन मुनाफा 16 प्रतिशत और कर पश्चात लाभ 24 प्रतिशत बढ़ा। व्यय में 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और परिचालन मार्जिन में कमी आई। तथाकथित अस्थिर क्षेत्रों की बात करें तो बैंकों का ऋण 9 प्रतिशत बढ़ा। यह उत्साहवर्धक है लेकिन अनुमान से कम भी है। बैंकों के कर पश्चात लाभ में 89 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली क्योंकि फंसे हुए कर्ज की प्रॉविजनिंग काफी निम्न थी। मौजूदा वर्ष में कठिनाई बढ़ेगी क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक अब दरों में इजाफा कर रहा है। तेल एवं गैस उत्पादकों का मुनाफा 70 प्रतिशत बढ़ा क्योंकि कीमतों में काफी तेजी आई तथा नमूने में शामिल कंपनियों के बिजली और ईंधन संबंधी व्यय में 30 प्रतिशत से अधिक की तेजी रही। तेल परिशोधक और विपणन कंपिनयों को भारी दबाव का सामना करना पड़ा और तेल कीमतों में तेजी के कारण उनका सकल रिफाइनिंग मार्जिन कम हुआ है।
वाहन कलपुर्जा क्षेत्र के मुनाफे में काफी इजाफा हुआ लेकिन उसके कारोबार का आकार नहीं बढ़ा। वाहन निर्माण के रुझानों में विविधता है। महिंद्रा ऐंड महिंद्रा तथा मारुति का प्रदर्शन अच्छा रहा है। परंतु दोपहिया वाहन क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के मुनाफे में कमी आई है जबकि ट्रैक्टर क्षेत्र स्थिर रहा है। टाटा मोटर्स की जेएलआर अभी भी घाटे में है। दोपहिया वाहनों और ट्रैक्टरों के बीच मजबूत संबंध के चलते ग्रामीण मांग अनुपस्थित नजर आई। दैनिक उपयोग की उपभोक्ता वस्तुओं के कमजोर प्रदर्शन से भी इस भावना को बल मिलता है। इन कंपनियों की बिक्री और मुनाफा एक अंक में बढ़ा। विनिर्माण में जरूर सक्रियता नजर आ रही है। हालांकि इसके कारण सीमेंट की बिक्री बढ़ी है लेकिन सीमेंट समेत संपूर्ण विनिर्माण और बुनियादी विकास क्षेत्र के मार्जिन पर दबाव बना हुआ है। विनिर्माण में प्रयोग होने वाली अन्य अहम जिंस मसलन स्टील तथा गैर लौह धातुओं में तेजी बरकरार है और इनकी अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी तेज हैं।
बिजली उत्पादकों के लिए यह तिमाही शानदार रही और उन्होंने बढ़ी हुई लागत को आगे बढ़ा दिया लेकिन सरकारी वितरण कंपनियों को चुकाये जाने वाले बकाये में बढ़ोतरी अच्छा संकेत नहीं है। इसके भुगतान में देरी प्रमुख आपूर्तिकर्ता कोल इंडिया तक को प्रभावित कर रही है। बिजली और परिवहन लागत सीमेंट तथा धातु उत्पादकों के लिए बहुत अहम हैं। धातु उत्पादकों ने तो इस लागत को आगे बढ़ा दिया लेकिन सीमेंट क्षेत्र को संघर्ष करना पड़ रहा है।
निर्यात शुल्क स्टील संयंत्रों को आगे चलकर परेशान करेगा। आईटी उद्योग का प्रदर्शन अच्छा रहा और उसका राजस्व 21 प्रतिशत तथा कर पश्चात लाभ 45 प्रतिशत (स्थिर मुद्रा संदर्भ में) बढ़ा। औषधि क्षेत्र में अभी भी आपूर्ति श्रृंखला बाधित है और मुनाफा स्थिर है। तिमाही आधार पर तुलना करने पर यह स्पष्ट है कि मुनाफे में वृद्धि धीमी है। आधार प्रभाव असर दिखा रहा है लेकिन वास्तविक वजह है मुद्रास्फीति में तेजी। इस तेजी ने मांग को कमजोर किया है। सख्त मौद्रिक व्यवस्था में भविष्य की मांग वृद्धि भी प्रभावित हो सकती है। सरकारी व्यय में कुछ तेजी आई है लेकिन अधिकांश बड़ी कंपनियों की सलाह तथा बैलेंस शीट के आंकड़ों के व्यापक रुझान यही बताते हैं कि 2022-23 में वृद्धि दर स्थिर रहेगी।मुद्रास्फीति का असर
जनवरी-मार्च 2022 (वित्त वर्ष 2022 की अंतिम तिमाही) में 2,939 सूचीबद्ध कंपनियों (जिनकी न्यूनतम बिक्री एक करोड़ रुपये) के नतीजों से संकेत मिलता है कि आर्थिक वृद्धि जारी है लेकिन उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर खपत और मांग जैसे चुनौतीपूर्ण पहलू भी हैं। तेल एवं गैस, रिफाइनिंग, बैंकिंग तथा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) जैसे अस्थिर क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो भारतीय उद्योग जगत की शुद्ध बिक्री 19 प्रतिशत बढ़ी है जबकि ‘अन्य आय’ में  40 प्रतिशत की उछाल आई है। इसकी वजह से परिचालन मुनाफा 16 प्रतिशत और कर पश्चात लाभ 24 प्रतिशत बढ़ा। व्यय में 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और परिचालन मार्जिन में कमी आई। तथाकथित अस्थिर क्षेत्रों की बात करें तो बैंकों का ऋण 9 प्रतिशत बढ़ा। यह उत्साहवर्धक है लेकिन अनुमान से कम भी है। बैंकों के कर पश्चात लाभ में 89 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली क्योंकि फंसे हुए कर्ज की प्रॉविजनिंग काफी निम्न थी। मौजूदा वर्ष में कठिनाई बढ़ेगी क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक अब दरों में इजाफा कर रहा है। तेल एवं गैस उत्पादकों का मुनाफा 70 प्रतिशत बढ़ा क्योंकि कीमतों में काफी तेजी आई तथा नमूने में शामिल कंपनियों के बिजली और ईंधन संबंधी व्यय में 30 प्रतिशत से अधिक की तेजी रही। तेल परिशोधक और विपणन कंपिनयों को भारी दबाव का सामना करना पड़ा और तेल कीमतों में तेजी के कारण उनका सकल रिफाइनिंग मार्जिन कम हुआ है।
वाहन कलपुर्जा क्षेत्र के मुनाफे में काफी इजाफा हुआ लेकिन उसके कारोबार का आकार नहीं बढ़ा। वाहन निर्माण के रुझानों में विविधता है। महिंद्रा ऐंड महिंद्रा तथा मारुति का प्रदर्शन अच्छा रहा है। परंतु दोपहिया वाहन क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के मुनाफे में कमी आई है जबकि ट्रैक्टर क्षेत्र स्थिर रहा है। टाटा मोटर्स की जेएलआर अभी भी घाटे में है। दोपहिया वाहनों और ट्रैक्टरों के बीच मजबूत संबंध के चलते ग्रामीण मांग अनुपस्थित नजर आई। दैनिक उपयोग की उपभोक्ता वस्तुओं के कमजोर प्रदर्शन से भी इस भावना को बल मिलता है। इन कंपनियों की बिक्री और मुनाफा एक अंक में बढ़ा। विनिर्माण में जरूर सक्रियता नजर आ रही है। हालांकि इसके कारण सीमेंट की बिक्री बढ़ी है लेकिन सीमेंट समेत संपूर्ण विनिर्माण और बुनियादी विकास क्षेत्र के मार्जिन पर दबाव बना हुआ है। विनिर्माण में प्रयोग होने वाली अन्य अहम जिंस मसलन स्टील तथा गैर लौह धातुओं में तेजी बरकरार है और इनकी अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी तेज हैं।
बिजली उत्पादकों के लिए यह तिमाही शानदार रही और उन्होंने बढ़ी हुई लागत को आगे बढ़ा दिया लेकिन सरकारी वितरण कंपनियों को चुकाये जाने वाले बकाये में बढ़ोतरी अच्छा संकेत नहीं है। इसके भुगतान में देरी प्रमुख आपूर्तिकर्ता कोल इंडिया तक को प्रभावित कर रही है। बिजली और परिवहन लागत सीमेंट तथा धातु उत्पादकों के लिए बहुत अहम हैं। धातु उत्पादकों ने तो इस लागत को आगे बढ़ा दिया लेकिन सीमेंट क्षेत्र को संघर्ष करना पड़ रहा है।
निर्यात शुल्क स्टील संयंत्रों को आगे चलकर परेशान करेगा। आईटी उद्योग का प्रदर्शन अच्छा रहा और उसका राजस्व 21 प्रतिशत तथा कर पश्चात लाभ 45 प्रतिशत (स्थिर मुद्रा संदर्भ में) बढ़ा। औषधि क्षेत्र में अभी भी आपूर्ति श्रृंखला बाधित है और मुनाफा स्थिर है। तिमाही आधार पर तुलना करने पर यह स्पष्ट है कि मुनाफे में वृद्धि धीमी है। आधार प्रभाव असर दिखा रहा है लेकिन वास्तविक वजह है मुद्रास्फीति में तेजी। इस तेजी ने मांग को कमजोर किया है। सख्त मौद्रिक व्यवस्था में भविष्य की मांग वृद्धि भी प्रभावित हो सकती है। सरकारी व्यय में कुछ तेजी आई है लेकिन अधिकांश बड़ी कंपनियों की सलाह तथा बैलेंस शीट के आंकड़ों के व्यापक रुझान यही बताते हैं कि 2022-23 में वृद्धि दर स्थिर रहेगी।

First Published - June 2, 2022 | 1:14 AM IST

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