खबर है कि सरकार आर्थिक सूचकांकों को तैयार करने के तौर-तरीकों में दो अहम बदलाव पर विचार कर रही है।
पहले बदलाव के तहत मुख्य सूचकांक के लिए बेस ईयर का मानकीकरण किए जाने का प्रस्ताव है। एक ओर जहां औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) और थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के लिए जहां अभी 1993-94 को बेस ईयर माना जा रहा है, वहीं जीडीपी और इसके अवयवों का आकलन 1999-2000 के आधार पर हो रहा है।
अलग-अलग अवयवों द्वारा अलग बेस ईयर का इस्तेमाल किए जाने की वजह से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की उलझनें बढ़ जाती हैं। इस असमानता के कारण कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं, क्योंकि अलग-अलग सूचकांकों के आकलन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं का बॉस्केट एक-दूसरे से मेल नहीं खाता।
बदलते वक्त के साथ जैसे-जैसे देश का आर्थिक ढांचा बदल रहा है, इसके मद्देनजर बेस ईयर में भी फासला बढ़ता जा रहा है और इस वजह से विभिन्न सूचकांकों की तारतम्यता प्रभावित हो रही है। इन सूचकांकों से देश की आर्थिक सेहत के बारे में किया गया आकलन तमाम तरह की गड़बड़ियों से भरा पड़ा होगा, जो काफी खतरनाक है, क्योंकि ये आंकड़े देश के आर्थिक ढांचे की सच्ची तस्वीर पेश करने में अक्षम होते हैं।
इसके हल के लिए पेश किए गए प्रस्ताव के तहत सभी सूचकांकों को शेयर बाजार सूचकांकों की तर्ज पर वैरिएबल-वेट फॉरम्युला में बदलने की बात कही गई है। इस कदम के जरिये हर इंडेक्स अपडेट में अर्थव्यवस्था के वर्तमान ढांचे का जायजा लिया जा सकेगा। हालांकि, इस पहल का मुख्य मकसद डेटा संबधी गड़बड़ियों के प्रभावों को उजागर करना है।
इसके मद्देनजर इस दिशा में कॉमन बेस ईयर सबसे उचित समाधान नजर आता है और इस दिशा में बढ़ना स्वागतयोग्य कदम होगा। इससे अगर अर्थव्यवस्था के बदलते ढांचे पर पूरी तरह निगरानी नहीं रखी जा सकती है, तो कम से कम इसके लिए आश्वस्त रहा जा सकता है कि यह सभी सूचकांक वस्तुओं और सेवाओं के एक ही बास्केट की गतिविधियों को प्रतिबिंबित करेगा।
हालांकि इसमें कई एजेंसियों के शामिल होने के मद्देनजर इस प्रक्रिया को बहाल करना अपेक्षाकृत काफी मुश्किल होगा। इसके लिए मिशन के तहत काम करने की जरूरत होगी, जिसमें कई विभागों और मंत्रालयों के बीच उच्चस्तरीय समन्वय को अंजाम देना होगा। दूसरा प्रस्तावित बदलाव सिर्फ थोक मूल्य सूचकांक से जुड़ा है और इस वजह से इस पर बहुत ज्यादा खींचतान नहीं होगी और इसे जल्द ही लागू किया जा सकता है।
थोक मूल्य सूचकांक अंकों की रिपोर्टिंग को साप्ताहिक से बदलकर मासिक करने की बात है। विशेषज्ञ इस सलाह के पीछे राजनीतिक मकसदों का हवाला देते हैं, क्योंकि सरकार को हर हफ्ते महंगाई के बढ़ते आंकड़े का प्रकोप झेलना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थोक मूल्य सूचकांक की मासिक रिपोर्टिंग ही होती है और भारत को भी ऐसा करना चाहिए।