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वैश्विक दुनिया में अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

Last Updated- December 07, 2022 | 7:01 AM IST

बैंक आफ इंगलैंड (यूनाइटेड किंगडम के केंद्रीय बैंक, बीओई) के गवर्नर मार्विन किंग ने चांसलर आफ एक्सचेकर एलास्टर डार्लिंग को एक खत लिखा, जो बैंक की वेबसाइट पर दिया गया है।


किंग को खत इसलिए लिखना पड़ा क्योंकि यूनाइटेड किंगडम की मौद्रिक नीति जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल रही। बैंक का लक्ष्य था कि मुद्रास्फीति की दर लक्ष्य के मुताबिक या 2 प्रतिशत के नीचे रहे। किंग ने पत्र ऐसी स्थिति में लिखा जब मुद्रास्फीति की दर लक्ष्य से 1 प्रतिशत अधिक हो गई। मई में इंगलैंड के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 3.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

इसी श्रृंखला में किंग के साथ ही यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) के अध्यक्ष जीन क्लाउड ट्रिचेट भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं। सौभाग्य से उन्हें इस तरह से जनता को स्पष्टीकरण देने के लिए बाध्य नहीं किया गया। यूरो जोन में भी आधिकारिक रूप से मुद्रास्फीति का लक्ष्य 2 प्रतिशत रखा गया है, जबकि वर्तमान में यह बढ़कर 3.7 प्रतिशत हो गई है। दोनों ही, यूके और यूरो जोन उसी तरह की बढ़ती हुई महंगाई से जूझ रहे हैं, जैसा कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व या भारतीय रिजर्व बैंक।

हाल के वित्तीय संकट और बढ़ती महंगाई से केंद्रीय बैंकों के कुछ कार्यों पर सवाल उठे हैं। अमेरिकी फेडरल बैंक और बैंक आफ इंगलैंड जैसे संस्थानों को मुसीबत में फंसे वित्तीय संस्थानों, जैसे बेयर सर््टन्स और ब्लैकरॉक की मदद करनी पड़ी। खुले बाजार की नीति धरी की धरी रह गई। बाजार ने वित्तीय संस्थानों  की कमजोर बैलेंस सीट के लिए उन्हें दडिंत किया और उनकी तरलता खत्म हो गई, ऐसे में केंद्रीय बैंक खुशी-खुशी से सामने आए और इन संस्थानों को नकदी देकर मदद किया।

महंगाई ने नीतियों पर भी फिर से विचार करने के लिए विवश कर दिया है। बैंक आफ इंगलैंड इन सब नीतियों को किनारे रखता हुआ नजर आ रहा है, भले ही यह अस्थायी तौर पर हो। बीओई के गवर्नर ने जनता को लिखे गए खुले पत्र में कहा है कि अगर बैंक दरों के माध्यम से 12 महीनों में महंगाई दर को लक्ष्य तक ले आया जाता है तो इससे रोजगार और आउटपुट में अनावश्यक अफरातफरी मचेगी।

हो सकता है कि यूरोपियन सेंट्रल बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी न करे, लेकिन अगर उन्होंने महंगाई के बारे में लक्ष्य प्राप्ति पर गंभीरता से विचार किया तो उनकी पालिसी रेट में अच्छा खासा प्रतिशत परिवर्तन होगा। ऐसी हालत में जबकि इस तरह का खेल चल रहा हो, तो मौद्रिक नीति का क्या मतलब है? केंद्रीय बैंकों के इन कदमों का क्या असर होगा? क्या महंगाई के  लक्ष्य को लेकर चलने का विचार है?

वे लोग जो कड़ी मौद्रिक नीति का समर्थन करते हैं, उनका वर्तमान चालबाजियों के बारे में यह जवाब हो सकता है- पहला, महंगाई को लक्ष्य बनाने वाले देश जैसे ब्रिटेन और यूरोप ने वर्तमान चरण में महंगाई को रोकने के लिए कोई काम नहीं किया, जैसा कि अमेरिका ने किया। दूसरा, अगर खतरनाक स्थिति उत्पन्न होने पर मौद्रिक नीति को त्याग दिया गया तो ( जैसा कि बैंक आफ इंगलैंड करता हुआ नजर आ रहा है) और केंद्रीय बैंकर अपने नीति निर्धारण के अधिकार को छोड़ देते हैं तो पहले चरण की नीतियों पर क्या ढेरों सवाल उठेंगे?

मैं इसके खिलाफ अपने तर्क रख रहा हूं। पहले मसले पर, इस बारे में थोड़ा सा संदेह है कि पिछले कुछ महीने में हुई घटनाएं अपवाद हैं। महंगाई को लक्ष्य करना यह प्रदर्शित नहीं करता कि संकट के समय में पूरी तरह से लोचशीलता है। अपवाद की स्थितियों में ऐसा होता है कि जो मॉडल तैयार किए गए हैं उसमें थोड़ा परिवर्तन कर दिया जाए। इसमें कोई समस्या नहीं है। सवाल यह है कि मौद्रिक अधिकारी ऐसे संकट को टालने के लिए क्या करेंगे?

मेरे विचार से चीजें सामान्य हो जाएंगी। केंद्रीय बैंकों को इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए। इसके दो कारण हैं- पहला इसलिए क्योंकि तेल और जिंसों की कीमतें आसमान छू रही हैं। इस तरह से हम लंबे समय तक महंगाई दर में बढ़ोतरी के शुरुआती कदम पर चल रहे हैं। इसका एक ही रास्ता है कि महंगाई को रोकने के लिए हम किसी भी तरह की नरमी न अपनाएं।

ऐसा करने के लिए केंद्रीय बैंक एक निश्चित मुद्रास्फीति लक्ष्य तय कर सकते हैं। इसके साथ वे यह भी संकेत दे सकते हैं कि बाजार भी उस पर लगाम लगाने की कोशिश करे। वे महंगाई को काबू में रखने के लिए विभिन्न क्षेत्रों पर नजर रख सकते हैं। इस समय महंगाई वैश्विक समस्या बन गई है, ऐसे में सभी केंद्रीय बैंकों में समन्वय किए जाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।

इसका संभव मॉडल यह हो सकता है कि सभी केंद्रीय बैंक मिलजुलकर मुद्रास्फीति के लिए लक्ष्य तय करें और मौद्रिक नीतियों को कड़ा करें। दूसरा, वर्तमान वित्तीय संक ट ने हमें बहुत स्पष्ट रूप से यह दिखा दिया है कि बाजार और भौगोलिक स्थितियों में किस तरह का वित्तीय संबंध बना है। इसका जाल इस तहह जटिल है, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी।

ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या नीति निर्माताओं ने सक्रियता से इस पर काम किया है कि अनिश्चितता का माहौल खत्म हो या इसके लिए कभी संयुक्त प्रयास हुए हैं? मेरा तर्क यह है कि नीतिगत वातावरण इस तरह का हो कि वित्तीय बाजार के लिए आसानी हो और इससे नीतियों के मामले में अनिश्चय का वातावरण खत्म हो। इस अनिश्चितता को कम करने के लिए एक ही रास्ता हो सकता है कि केंद्रीय बैंक इसके लिए मौद्रिक नीतियों को कड़ा करें, जिससे वे बेहतर कर सकें और महंगाई दर का संयुक्त लक्ष्य तय करके इससे लड़ें। इसकी अनुशंसा रघुराम राजन कमेटी ने की थी कि रिजर्व बैंक के लिए महंगाई का लक्ष्य तय होना चाहिए।

क्या महंगाई से लड़ाई करने और कड़े मुद्रास्फीति के लक्ष्य का मतलब विकास से समझौता करना होगा? यह देखा गया है कि विकास दर बरकरार रखने के लिए कम और स्थायी मुद्रास्फीति जरूरी शर्त है। महंगाई को लक्ष्य बनाकर केंद्रीय बैंक विकास का समर्थन ही करेंगे, उसे नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।

First Published - June 23, 2008 | 12:59 AM IST

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