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महंगाई के दौर में महंगा हुआ विज्ञापन करना भी

Last Updated- December 07, 2022 | 3:04 PM IST

महंगाई का असर सबसे ज्यादा उपभोक्ताओं की मांग पर पड़ा है। महंगाई के दौर में उपभोक्ता बेहद जरूरी चीजों पर ही खर्च करना चाहते हैं।


इसकी वजह यह है कि उपभोक्ता कुछ टिकाऊ वस्तुओं की अपनी मांग को कुछ दिनों के लिए टाल भी सकता है। ऐसी टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं बनाने वाली कंपनियां बढ़ती लागत से लगातार जूझ रही हैं। इसके अलावा गर्मी के मौसम में मानसून से पहले की बारिश ने स्थिति को और नाजुक बना दिया और बिक्री कम हुई। ऐसी हालत में विज्ञापन करना भी उनके लिए सिरदर्द साबित हो रहा है।

इसकी वजह है विज्ञापनों की बढ़ती दर। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसी बड़ी मीडिया कंपनियां अगस्त से अपने विज्ञापनों की दर में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने वाली हैं। एलायड मीडिया के सीओओ श्रीपाद कु लकर्णी का कहना है कि सभी मीडिया में 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। न्यूजप्रिंट की कीमतों में भी बढ़ोतरी होने से अखबार भी 20 फीसदी महंगे होने के आसार हैं।

अखबारों में सबसे ज्यादा विज्ञापन टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के ही होता है। आमतौर पर मंदी के  दौरान विज्ञापनों पर इसका असर सबसे ज्यादा होता है और विज्ञापनों की दर महंगी हो जाती है। केपीएमजी के मैनेजर (रणनीतिक) सी. रविशंकर का कहना है, ‘आमतौर पर टिकाऊ वस्तुएं बनाने वाली कंपनियों के विज्ञापन का खर्च बिक्री का 7 से 8 फीसदी तक होता है जबकि इसके  सामान की लागत 68 से 72 प्रतिशत तक होती है। विज्ञापनों पर कटौती के लिए कोई सलाह नहीं देता क्योंकि एक कमजोर ब्रांड का तमगा लगने के बाद ऐसी कंपनियों को अपनी कीमतें बढ़ाने में ज्यादा मुश्किल होती है।’

जहां तक मीडिया के चुनाव की बात है, इसके लिए सबसे बेहतर विकल्प की तलाश की जाती है। मसलन एलसीडी, प्लाजमा टीवी, और काफी बेहतर रेफ्रीजरेटरों की खास बातों और उनके तकनीकी पहलू को बेहतर तरीके से बताने के लिए प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों का ही सहारा लेना पड़ता है क्योंकि इन उत्पादों की खासियत की बेहतर नुमाईश प्रिंट में बेहतर तरीके से हो सकती है। हालांकि रेफ्रीजरेटरों और एसी के विज्ञापनों पर खर्च करने से पहले इस बात का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा कि विज्ञापनों के लिए ऐसे मीडिया का इस्तेमाल न किया जाए जिसकी पहुंच बहुत कम लोग तक है।

रेफ्रिजरेटरों और एसी की कंपनियां ऐसे मीडिया पर खर्च करने का ख्याल छोड़ सकती हैं। कंपनियों के पास एक और विकल्प यह हो सकता है कि वे अपने किसी खास प्रोडक्ट के विज्ञापन पर खर्च करने के बजाए अपने मूल ब्रांड पर ज्यादा खर्च करते हैं। रविशंकर के मुताबिक इसकी वजह यह है कि सभी उत्पादों पर बड़ी रकम खर्च करने के बजाए अपनी ब्रांड अपील को बनाए रखने के लिए मूल ब्रांड पर खर्च करना ज्यादा अच्छा होगा।

गोदरेज और बॉयसी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड में वाइस प्रेसीडेंट (सेल्स और मार्केटिंग)कमल नंदी का कहना है, ‘हमारे विज्ञापन की योजनाएं लंबे समय के लिए होती हैं। हम मंदी के दौर में भी अपने विज्ञापनों के  खर्च पर कटौती नहीं कर सकते क्योंकि हमें अपने उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद को खरीदने लुभाना पड़ता है। हालांकि हम अपने विज्ञापन सभी माध्यमों पर करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। हमने 2 साल से प्रायोगिक मार्केटिंग पर ज्यादा जोर दिया था।

हालांकि प्रिंट मीडिया की दरों में काफी तेजी से बढ़ोतरी हुई है इसलिए अगर प्रिंट में कोई स्कीम होती है तो हम वहां अपने कुछ कुछ जरूरी विज्ञापनों को देते है।’ हमारे यहां एटीएल यानी टीवी और अखबार पर जो मुख्य विज्ञापन दिखते हैं उन पर पहले 70 से 75 प्रतिशत तक खर्च किया जाता था जो अब कम होकर 60 फीसदी तक पहुंच चुका है। दूसरी ओर बीटीएल यानी अन्य प्रमोशन गतिविधियों और सूचना संदेशों आदि के विज्ञापनों पर खर्च 40 फीसदी तक पहुंच चुका है। हमारी यही योजना है कि हम बीटीएल के लिए ज्यादा पैसे खर्च करें क्योंकि यह ज्यादा प्रभावपूर्ण होता है।

हालांकि अब हमारे लिए अगला खास सीजन दिवाली और शादी के मौसमों के दौरान होगा जब हमें अपने ब्रांड के अपील को ज्यादा रिफ्रेश करने की जरूरत होगी। नंदी को उम्मीद है कि त्योहारों के  मौसम में ग्राहकों की खरीदारी के जरिए इस दौर की मंदी पड़ी बिक्री की भरपाई हो जाती है।

फिलिप्स इंडिया के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर विवेक शर्मा का कहना है, ‘हमलोग साल 2010 तक के  विज्ञापनों के लिए अपनी योजनाएं बना रहे हैं ताकि हमारे मार्केटिंग शेयर में बढ़ोतरी हो। इसी वजह से हम विज्ञापनों में कोई कटौती नहीं कर रहे हैं। उपभोक्ता भी मंदी के समय में क्वालिटी की चाहत रखते है। इसीलिए हम अपने प्रोडक्ट में थोडे बदलाव पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया है और नई रेंज लाने की भी हमारी कोशिश है। इसके जरिए ही नए और अलग तरह के विज्ञापनों की गुंजाइश बनती है।’

First Published - August 5, 2008 | 10:59 PM IST

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