प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष अब वैश्विक भू-राजनीति में गहरी दरारें पैदा कर रहा है। यूरोपीय संघ (ईयू) और जापान ने पश्चिम एशिया में हो रहे इस संघर्ष में शामिल होने से इनकार कर दिया है, खासतौर पर होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री मार्गों की सुरक्षा के मुद्दे पर जहां ईरान ने कुछ देशों के लिए पाबंदी लगा रखी है। ऐसे समय में निश्चित रूप से मध्यम स्तर की शक्तियों के एक नए गठबंधन के निर्माण का अवसर सामने है जिसमें भारत अहम भूमिका निभा सकता है। भारत जैसे देश इस गठबंधन का नेतृत्व करते हुए वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा में पहल कर सकते हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका ने 60 से अधिक वैश्विक संगठनों से खुद को अलग करके स्थिति को और जटिल बना दिया है। वहीं, चीन भले ही खुद को मुक्त व्यापार का समर्थक बताता हो लेकिन वह अपने दुर्लभ खनिज संसाधनों के एकाधिकार का इस्तेमाल कर दुनिया पर दबाव बना रहा है और विभिन्न बाजारों में सस्ते सामान की भरमार कर वैश्विक निर्माताओं को नुकसान पहुंचा रहा है।
जहां एक ओर अमेरिका अपने व्यापार घाटे को कम करने के लिए आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ा रहा है (हालांकि अमेरिका के उच्चतम न्यायालय के एक फैसले के कारण इन्हें फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दिया गया है), वहीं दूसरी ओर चीन ने 2025 में 1.2 लाख करोड़ डॉलर का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार अधिशेष दर्ज किया है। ऐसे में केवल ये दो बड़ी शक्तियां (अमेरिका और चीन) मिलकर भी एक स्थिर और नियम आधारित भविष्य की गारंटी नहीं दे सकतीं। इसी वजह से, मध्यम शक्तियों के एक गठबंधन की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है जो पुराने वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग करते हुए एक अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था बनाने की दिशा में काम कर सके।
इस नए गठबंधन को हम ‘आर7’ नाम दे सकते हैं, जहां ‘आर’ का अर्थ है सुधार और ‘7’ उन सात प्रमुख मध्यम शक्तियों को दर्शाता है जिनकी बदलाव में गहरी दिलचस्पी है। इस आर7 के शुरुआती सदस्य भारत, जर्मनी, जापान, इंडोनेशिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा हो सकते हैं। हालांकि, इसे आगे बढ़ाकर आर10 या आर12 भी बनाया जा सकता है, जिसमें यूरोप, लातिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया की अन्य मध्यम शक्तियों को शामिल किया जा सकता है। यह आर7 समूह लगभग 2.2 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा, जो दुनिया की कुल आबादी के एक-चौथाई से भी अधिक है। अगर यूरोपीय संघ भी औपचारिक रूप से आर7+ का हिस्सा बन जाता है तब यह सुधार समर्थक समूह, दुनिया की लगभग 35 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करेगा।
आर7 का उद्देश्य किसी सीमित समूह का निर्माण करना नहीं है बल्कि वैश्विक और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार का नेतृत्व करना है। जैसे-जैसे शुरुआती विचार और नीतियां स्पष्ट होंगी, इस समूह में अन्य देशों को भी शामिल किया जा सकता है। शुरुआत में समूह को छोटा रखना इसलिए जरूरी है ताकि सुधारों के लिए एक व्यापक लक्ष्य और स्पष्ट सिद्धांत तय किए जा सकें।
इस गठबंधन के शुरुआती चरण में अमेरिका, चीन और रूस जैसी महाशक्तियों को बाहर रखा जा सकता है जब तक कि वे सुधारवादी एजेंडे के साथ जुड़ने की इच्छा न दिखाएं। यह भी संभव है कि ये देश आर7 को कमजोर करने की कोशिश करें और उसके कुछ सदस्यों पर दबाव डालें कि वे इस पहल से बाहर हो जाएं। संयुक्त राष्ट्र के पुराने स्थायी सदस्य, ब्रिटेन और फ्रांस को भी बाद में शामिल किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उन्हें 1940 के दशक के अंत में बनी संस्थाओं में सुधार करने की प्रतिबद्धता दिखानी होगी। इसका मतलब यह भी होगा कि उन्हें अपने विशेष और अधिक अधिकारों में कटौती करनी पड़ेगी।
सुधारों की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से की जा सकती है। इसके लिए जी4 देशों, जर्मनी, जापान, भारत और ब्राजील द्वारा दिया गया प्रस्ताव एक महत्त्वपूर्ण आधार हो सकता है, जिसमें सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या मौजूदा पांच से बढ़ाकर 11 करने की बात कही गई है।
एक महत्त्वपूर्ण सुधार यह होना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार को समाप्त किया जाए। महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों पर मतदान किसी एक देश की शक्ति के बजाय आबादी, आर्थिक आकार और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में योगदान जैसे मानकों के आधार पर अनुपातिक तरीके से किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, किसी भी देश पर एकतरफा हमला या आक्रमण चाहे उसके पीछे मानवाधिकार या कोई नैतिक कारण ही क्यों न बताया जाए, उसे नई नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में अवैध माना जाना चाहिए।
विश्व व्यापार संगठन के संदर्भ में भी नए नियम केवल निष्पक्ष व्यापार तक सीमित नहीं रहने चाहिए बल्कि उनके परिणामों की समय-समय पर समीक्षा भी जरूरी होनी चाहिए। यदि किसी देश को लगातार व्यापार घाटा या अधिशेष का सामना करना पड़ रहा है तो उसे इस असंतुलन को दूर करने के लिए प्रोत्साहित या बाध्य किया जाना चाहिए। दरअसल, व्यापार में हमेशा कुछ देश जीतते हैं और कुछ हारते हैं।
ऐसे में, नियमों और नियमित समीक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि इसके परिणाम लंबे समय तक असंतुलित या नुकसान पहुंचाने वाले न बने रहें। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं केवल पी5 देशों या अमेरिका और चीन की स्थायी संरक्षक नहीं रहनी चाहिए। यही बात संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष पदों और डब्ल्यूटीओ जैसे संगठनों के प्रमुख पदों पर भी लागू होती है कि इन पर सभी देशों को समान अवसर मिलना चाहिए।
नई वैश्विक व्यवस्था के लिए एक चौथा और शायद अधिक विवादास्पद सिद्धांत यह होना चाहिए कि किसी एक तरह के ऐतिहासिक अनुभव या सांस्कृतिक पसंद के आधार पर नैतिक मानदंड थोपने से बचा जाए। उदाहरण के तौर पर लोकतंत्र कुछ देशों के लिए एक साझा मूल्य हो सकता है लेकिन अगर कोई देश लोकतांत्रिक नहीं है तो सिर्फ इसी आधार पर उसे नियम आधारित व्यवस्था का विरोधी नहीं माना जाना चाहिए।
हर देश को अपने तरीके से विकसित होने का अधिकार होना चाहिए भले ही वह रास्ता दूसरे देशों को अल्पकालिक स्तर पर या मध्यम अवधि में स्वीकार्य न हो। इसी तरह, धार्मिक स्वतंत्रता को केवल ईसाई या पैगंबर इब्राहिम की परंपराओं के आधार पर परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। इसे समझने के अन्य तरीके भी हो सकते हैं और इसकी मौजूदगी या अनुपस्थिति को संयुक्त राष्ट्र के किसी सदस्य देश के साथ भेदभाव का आधार नहीं बनाना चाहिए।
वैश्विक स्तर पर मध्यम शक्तियां अब तक महाशक्तियों द्वारा बनाए गए पुराने वैश्विक ढांचे के भीतर काम करती रही हैं क्योंकि इसके कारण उनके कुछ हित साधे जा रहे थे (जैसे कनाडा, जापान और यूरोप) लेकिन अब उन्हें बदलाव की अगुआई करने की जरूरत है। भारत को इस परिवर्तन में एक प्रेरक शक्ति की भूमिका निभानी चाहिए। जिस तरह वह कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख नेतृत्वकर्ता रहा था, उसी तरह अब वैश्विक संस्थाओं में सुधार के इस नए अभियान को भी इसे अपनी प्राथमिकता बनानी चाहिए। वैश्विक स्तर पर मौजूदा अव्यवस्था किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं है यहां तक कि उन दो बड़ी महाशक्तियों के लिए भी नहीं जो आज दुनिया पर अपना वर्चस्व रखती हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)