अमेरिका की फालतू बयानबाजी
अमेरिका में सब प्राइम संकट की मार, आर्थिक मंदी, डॉलर की कमजोरी, इराक युध्द और पर्यावरण के मसले पर अलग थलग पड़ते अमेरिका को आगामी चुनावों में जनता को जवाब देते नहीं बन रहा है और इसलिए वह विवादास्पद बयानबाजी कर रहा है।
दुखद यह है कि भारत में ही कुछ लोग इस बात का समर्थन कर रहे हैं। बयानबाजी की बजाए सभी देशों को मिल बैठकर विचार करना चाहिए। – विवेक कुमार सिंह,
सहायक प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, आंचलिक कार्यालय, स्काई स्टार बिल्डिंग, सेवक रोड, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल
आदतें इतनी जल्दी नहीं बदलतीं
अगर आर्थिक विकास के चलते मध्य वर्ग प्रभावित हुआ है और उसकी क्रय शक्ति बढ़ी है तो इसका यह मतलब नहीं है कि उसने ज्यादा खाना शुरू कर दिया है। खाद्य उत्पाद जब तक मानवीय शरीर के ईंधन के रूप में इस्तेमाल होते रहे हैं तब तक उनकी मांग और पूर्ति में संतुलन बरकरार रहता है। खानपान की आदतें बहुत जल्दी नहीं बदला करती। यह बयानबाजी सिर्फ छिछली मानसिकता की परिचायक है। – नरेन्द्र कुमार डंग, सीनियर मैनेजर, पीएनबी, 284 राजा गार्डन, जालंधर, पंजाब
फिजूल की बात है यह
अमेरिकी राष्ट्रपति बुश इन दिनो घोर मंदी, चकनाचूर अर्थव्यवस्था, अपने घटते जनाधार, भारत की बढ़ती ताकत और लादेन के भूत से डरकर ऐसी ऊलजलूल हरकतें कर रहे हैं। आज भी प्रत्येक भारतीय को भरपेट खाना नहीं मिलता है और मिले भी तो वह अमेरिकावासियों की आधी खुराक भी नहीं होगी। – सुनील जैन राना, छत्ता जंबू दास, सहारनपुर
हमसे कह रहे हो…
खाद्यान्न समस्या हो गई सब समस्या की सरदार
इससे ही पैदा हुई है महंगाई की मार
मक्का से क्यों बना रहे हो बायोईंधन आप
और हमसे यूं कह रहे हो कि तुम हो जिम्मेदार?
”तुम हो जिम्मेदार ” अमेरिका गलत कह रहा है
खामियाजा इसका भारत का हर शख्स सह रहा है
अच्छा हो, पोषक अन्नों से तन का पोषण होने दें
बायोफ्यूल को अमरीका के जंगल में जाकर सोने दें।
– गुलाबचन्द वात्सल्य, बुधवारी बाजार छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश
ओलंपिक से उपजा है खाद्यान्न संकट
एक मुख्य कारण बीजिंग ओलंपिक भी है। यह अटपटा लगता है लेकिन हजारों लोग जो खेलने आ रहे हैं और लाखों जो देखने आने वाले हैं, के लिए अन्न का भंडारण किया जा रहा है जो खाद्यान्न संकट को बढ़ावा दे रहा है। – अनवर अंसारी, वाणिज्य निरीक्षक, उत्तर रेलवे, अंबाला मंडल, 140-सी, रेलवे कॉलोनी, अंबाला कैंट
कम पैदावार है जिम्मेदार
किसी भी देश के खाद्यान्न पैदावार को वहां की जलवायु, मौसम, सूखा, अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि वगैरह प्रभावित करते हैं। इसके लिए किसी दूसरे देश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अत: इस संकट के लिए वही देश जिम्मेदार होंगे जहां पैदावार कम हुई है। – संतोष मालवीय, आरएमएस कॉलोनी चौराहा, 222, मालवीय गंज, इटारसी
हमारे सिर न फोड़ें ठीकरा
जैविक ईंधन के लिए फसलों का विस्थापन अमेरिका और यूरोपीय देशों ने किया है, भारत ने नहीं। औद्योगीकरण और शहरीकरण के चलते कृषियोग्य जमीन का कम होना दुनिया भर की सच्चाई है। – शशिधर दुबे, अंबेडकरनगर, उत्तरप्रदेश
दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है
खाद्यान्न संकट के लिए दरअसल विकसित राष्ट्रों की आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं। यही समय है जब दूसरी हरित क्रांति शुरू की जानी चाहिए और यह सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में होनी चाहिए। यह दुनिया के सभी देशों की जिम्मेदारी है कि वह पूरे विश्व को खाद्यान्न क्षेत्र के रूप में विकसित करें कि फिर कभी ऐसा संकट पैदा न हो। – अमर आनंद, कृष्णा कॉलोनी, मेरठ कैंट
अपनी गलती छिपाने की कोशिश
अपनी गलतियों पर से ध्यान हटाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति और विदेश मंत्री लोगों का ध्यान एशियाई लोगों की तरफ लगाना चाहते हैं। जबकि सच यह है कि अमेरिका मक्के से बायोडीजल बना रहा है, जिसके चलते मक्के के खेत बंजर होने की कगार पर हैं। दूसरी ओर मैक्सिको, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार करने वाले देशों मे काफी कम पैदावार हुई है। – चंद्रमोहन जोशी, प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, कीर्ति कॉलेज, मुंबई
प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल गलत
माननीय राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश जी खाद्यान्न संकट के लिए भारत की जनता को दोषी ठहराने की बजाय अपने यहां मक्के का इस्तेमाल बायो ईंधन के रूप में करना बंद करें। आंकड़ों से जाहिर है कि खाद्यान्न की सबसे ज्यादा खपत अमेरिका में हो रही है। ऐसे में एक-दूसरे पर आरोप लगाने की जगह इसका उपाय करना ज्यादा उचित होगा। –
प्रवीण कुमार टिबड़ेवाल, किराना व्यवसायी
विकसित देश हैं जिम्मेदार
खाद्यान्न उत्पादन की लिहाज से हमारा देश पूरी तरह भरा-पूरा है। उच्च कोटि की गेहूं, चावल, तिलहन और दाल सहित अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों की पैदावार में हमारा देश सबसे आगे है। अनाजों की जमाखोरी में भी विकसित देश सबसे आगे हैं। लिहाजा वैश्विक खाद्यान्न संकट के लिए भारत नहीं बल्कि विकसित देश जिम्मेदार हैं। – रचना जैन,
विज्ञापन व्यवसायी और लेखिका (चिल्ड्रेन बुक), सी-19, कस्तूरबा नगर, भोपाल
विकसित राष्ट्र की नीतियां असल वजह
विकसित राष्ट्रों द्वारा बनाई जाने वाली आर्थिक नीतियों की वजह से ही विकासशील राष्ट्रों को मार झेलनी पड़ रही है। जहां तक भारत का सवाल है तो वह लंबे समय से खाद्यान्न सुरक्षा के बारे में उपदेश देता आ रहा है। – अनिल खन्ना, कार्यकारी निदेशक, पीपुल्स गु्रप, 25, पारस मैजेस्टिक, ई-8 गुलमोहर, भोपाल
मिलजुल कर समाधान निकालें
यह वक्त एक-दूसरे पर दोषारोपण करने का नहीं है बल्कि इस अंतरराष्ट्रीय समस्या पर विशेष कमेटी गठित कर विचार में बदलावों एवं सूक्ष्म परीक्षणों का है। वर्तमान में आवश्यकता है अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की, आपसी विचारों के पुर्नमूल्यांकनों की एवं नई नीति प्रबंधन की सूक्ष्म प्रणालियों को उजागर करने की। – नयन प्रकाश गांधी ‘प्रदीप्त’,
वसंत विहार, कोटा, राजस्थान
संकट अमेरिका का पैदा किया हुआ है
एक भारतीय की तुलना में एक औसत अमेरिकी एक साल में 5 गुना अधिक खाद्यान्न का उपयोग करता है। एक दिन में करीब 1.5 करोड़ भारतीय उपवास रखते हैं। अमेरिका में एक तिहाई मक्का बायो-पेट्रोल बनाने के काम आता है तथा खाद्यान्न उत्पादक भू्मि बायो-पेट्रोल बना सकने वाली फसलों में तेजी से बदलती जा रही हैं। – प्रो. मानचंद खंडेला, निदेशक, सुबोध प्रबंधन संस्थान, जयपुर
संकीर्ण मानसिकता का परिचायक
उपर्युक्त बयान उस देश के शीर्ष स्तर पर बैठे उन राजनयिकों का है, जो दुनिया को अपनी बपौती तथा हर वैश्विक क्रियाकलाप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना अपना अधिकार समझते हैं और यह वक्तव्य भी उनकी उसी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। – अमित कुमार यादव, 82 बी6सी रसूलाबाद, तेलियरगंज, इलाहाबाद
बयानबाजी से काम नहीं बनेगा
यह सही है कि भारत का मध्य वर्ग फल-फूल रहा है लेकिन खाद्यान्न खपत स्थिर है। खाद्यान्न संकट एकदम से पैदा नहीं हुआ है। दुनिया भर के तेल बाजार में वृध्दि से अमेरिका जैसे देश वैकल्पिक ईधन में खाद्यान्नों का बेड़ा गर्क करने पर तुले हैं। गेहूं की जगह मक्का और गन्ना उत्पादन पर भारी सब्सिडी दे रहे हैं। चलताऊ बयान देने से हल न निकलेगा। – सोहित कटियार, देव नगर, कानपुर
जरा अपने गिरेबां में झांके अमेरिका
खाद्य और कृषि संगठन के आंकड़ों के अनुसार पिछले दो सालों में भारत की खाद्यान्न खपत 2.17 फीसदी और चीन की 1.8 फीसदी बढ़ी है जबकि अमेरिका में यह खपत 11.81 फीसदी बढ़ गई है। अमेरिका द्वारा प्रयोग बायो ईंधन में किया जा रहा है और यही इस संकट की वजह है। – नरेश व्यास, गुन्दी का मोहल्ला, जोधपुर शहर, राजस्थान
अमेरिका का निहितार्थ छुपा है
जिस तरह अमेरिका का मकसद इराक को ध्वस्त करने और ईरान पर आंखे तरेरने के पीछे रासायनिक हथियार नहीं, तेल संपदा पर कब्जा करना था उसी तरह यह बयान भारत पर अज्ञात दबाव बनाने और वास्तविक तथ्यों से ध्यान हटाने के लिए हो सकता है। – डॉ. जी.एल. पुणतांबेकर, रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश
भारत पर उंगली उठाना सही नहीं
अमेरिका द्वारा खाद्यान्न संकट के लिए भारत पर उंगली उठाना वाकई सोचनीय है। यहां समस्या यह है कि अमेरिका किसी भी समस्या के लिए सिर्फ और सिर्फ दूसरों पर उंगली उठाना जानता है। इस समस्या के लिए विशेष रूप से विकसित देश जिम्मेदार हैं, जो अपने यहां अधिकतर जमीन का प्रयोग बायो-फ्यूल बनाने में कर रहे हैं। – श्रवण कुमार ठाकुर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्यप्रदेश
कम पैदावार हो सकती है जिम्मेवार
खाद्यान्न संकट के लिए भारत जिम्मेदार है, यह कहना सही है पर गलत तथ्यों पर आधारित है। वजह यह नहीं कि भारतीय ज्यादा खाने लगे हैं बल्कि वजह यह है कि हमारे देश में पैदावार कम हुई है। उद्योग और तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की बेहतर स्थिति ने किसानों को खेती की जगह दूसरे काम करने के लिए प्रेरित किया है। वह कहीं और अपना भविष्य तलाश रहे हैं। सबसे पहले खेती योग्य जमीनें बेचने पर रोक लगानी होगी, सुनियोजित खेती पर ध्यान देना होगा । – मनोज मोदी, ई-मेल से
बकौल विश्लेषक
खुद पर न उठ जाए उंगली, इसलिए हम हैं निशाना – देवेंद्र शर्मा , कृषि विशेषज्ञ
पूरी दुनिया में उत्पन्न हुए खाद्यान्न संकट के लिए खुद अमेरिका जिम्मेदार है और अपने ऊपर उंगली उठने से पहले ही वो दूसरों (भारत और चीन) पर उंगली उठा रहा है। बायोफ्यूल के लिए पूरी दुनिया के 46 फीसदी इथेनॉल का प्रोडक्शन अमेरिका द्वारा किया जाता है।
क्योंकि अमेरिका में इथेनॉल का प्रोडक्शन अन्न पर आधारित होता है, निस्संदेह उससे खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ेंगे। अमेरिका ऐसा इसलिए भी कर रहा है ताकि आयातित तेल पर से उसकी निर्भरता कम हो सके।
वैश्विक खाद्यान्न संकट का एक कारण विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का निर्माण भी है। अगर डब्लूटीओ के बनने से सबसे अधिक किसी को नुकसान हुआ है तो वे हैं विकासशील देश। खासकर खाद्य निर्यात करने वाले देशों पर सबसे नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। लिहाजा आज जब पूरी दुनिया में खाद्यान्न संकट का प्रकोप छाया है, तो इन देशों में लाले पड़े हैं। हालांकि भारत अभी इस संकट से बचा हुआ है क्योंकि यहां की कृषि को अभी भी ग्लोबल इकोनामी के साथ जोड़ा नहीं गया है।
बहरहाल, भारत में खाद्यान्न संकट के मुख्य रूप से दो कारण है- पहला वायदा कारोबार और दूसरा जमाखोरी। भारत में 40 लाख करोड़ रुपये का वायदा कारोबार होता है और साथ ही डब्बा ट्रेडिंग (अवैध कारोबार) भी 40 लाख करोड़ रुपये के आसपास किया जाता है। भारत के कुल कारोबार से यह 16 गुना अधिक है। लिहाजा अगर महंगाई को रोकना है तो वायदा कारोबार को बंद करना होगा। भारत में एक सबसे बड़ी समस्या जमाखोरी की भी है।
बातचीत: पवन कुमार सिन्हा
हाथ पसारने तो नहीं जाते, फिर क्यों हमको देते हैं ताने – एस.के.झा , वैज्ञानिक, पूसा विश्वविद्यालय, समस्तीपुर, बिहार
शुरुआत से ही अमेरिका की नीति दूसरों पर कीचड़ उछालने की रही है और आज तक वह यही करता आ रहा है। वैश्विक खाद्यान्न संकट भारत और चीन की देन नहीं है बल्कि इसके लिए पूरी तरह अमेरिका जिम्मेदार है। भारत से कई गुना अधिक खाद्य पदार्थों की खपत अमेरिका में होती है।
वहां खाद्यानों से बायोफ्यूल बनाने का काम किया जा रहा है। अमेरिका का यह कहना कि भारत में जितनी तेजी से आबादी बढ़ी है, उस हिसाब से वहां पर खाद्य पदार्थों की पैदावार नहीं होने की वजह से स्थिति ने विकराल रूप धारण किया है। मैं अमेरिका से पूछता हूं क्या हम लोग उसके सामने खाद्यान्न के लिए हाथ फैलाने जाते हैं? क्योंकि अमेरिका की इकॉनमी फेल हो रही है, उस व्याकुलता में वह दोषारोपण कर रहा है।
यहां (भारत) महंगाई और खाद्यान्न संकट जैसी समस्या उत्पन्न होने के पीछे कई कारण हैं। भारत को हमेशा ही प्राकृतिक आपदा की मार झेलनी पड़ी है यानी कभी बाढ़ ने तो कभी सूखे ने देश को अक्सर रुलाया है। बिजली किसी भी देश की बुनियादी जरूरत होती है लेकिन यहां बिजली एक घोर समस्या है और इस लिहाज से देश में अधिकांश क्षेत्र तेल पर ही निर्भर हैं।
क्योंकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत सातवें आसमान पर है, उससे हमारे देश में भी महंगाई बढी है। कमोबेश सरकार की आर्थिक नीतियां भी खाद्यान्न संकट के लिए जिम्मेदार है। कोई भी सरकार कृषि को लेकर कभी भी गंभीर नहीं हुई। एक सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि यहां साल-दो साल में सरकार बदल जाती हैं। स्थिति सामान्य होने में कम से कम एक साल का वक्त लग जाएगा।
बातचीत: पवन
पुरस्कृत पत्र
समस्या का समाधान खोजें
आज जब महंगाई अपने शीर्ष स्तर पर है और पूरी दुनिया समेत भारत में भी खाद्यान्न संकट पूरे उफान पर है तो हमें गलत और सही की समीक्षा में पड़कर समय और ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी चाहिए बल्कि उसका हल खोजना चाहिए।
और इसका समाधान यह है कि हम अपनी कृषि उत्पादकता में सुधार करें, खेती योग्य भूमि का पूरा उपयोग करें और जहां खेती नहीं हो सकती है उसे खेती योग्य बनाकर नई नई तकनीक से खेती की पैदावार बढ़ाएं, लोगों में कृषि के प्रति जागरूकता पैदा करें, खेती को आर्थिक उन्नति का व्यवसाय बनाएं और संभावनाओं से अधिक वास्तविकता का धरातल ढूंढें तभी इस समस्या के समाधान का रास्ता मिल सकता है। बेकार की बयानबाजी में उलझने से किसी भी देश को कुछ नहीं हासिल होने वाला है। – विकास वात्सल्य , विकास ऑफसेट प्रिंटर्स, बुधवारी बाजार, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश
सर्वश्रेष्ठ पत्र
कई वजहें हैं इस संकट के पीछे
भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर है। साथ ही यह एक निर्यातक देश भी है। जहां तक उपभोग का सवाल है तो उन्नत किस्मों का उत्पादन भी बढ़ा है और निम्न स्तरीय फसलों के उत्पादन में कमी आई है। खाद्यान्न संकट के लिए निम्न कारण जिम्मेदार हैं।
1- अन्न का प्रयोग बायो ईंधन में करना
2- वायदा बाजारों का हस्तक्षेप
3- उपजाऊ भूमि पर कारखानों का लगाना
4- किसानों की आर्थिक निराशा का प्रभाव
5- उत्पादन का लगभग एक तिहाई भाग चूहों द्वारा नष्ट किया जाना
– मुकेश मोदी, स्टूडेंट, आईसीडब्ल्यूएआई, बोकारो
भारत में बचपन अब भी कुपोषित
वैश्विक खाद्यान्न संकट ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते कम उत्पादन, कृषि की उपेक्षा, कृ षि भूमि पर बायो ईंधन फसलें उगाने और डब्ल्यूटीओ के बेतुके एग्रीमेंट ऑन एग्रीक्लचर से जुड़ा है।
भारत में जहां अभी भी तीन में से एक वयस्क और हर दो में से एक बच्चा कुपोषित है और जहां करोड़ों लोग केवल एक जून का खाना पाते हैं, यह कहना कि यह संकट भारत की वजह से है, अमानवीय है। भारत में औसत खाद्यान्न खपत 178 किलोग्राम है वहीं अमेरिका में यह 1046 किलोग्राम है और यूरोपियन यूनियन में यह ढाई गुना ज्यादा है। – शिखा मिश्रा, काशीडीह, जमशेदपुर, झारखंड
खुद भूख लगे तो मुंह तकते हैं
अमेरिका अपना अनाज बायो ईंधन और जानवरों को खिला कर खत्म कर रहा है और पेट भरने के लिए वह भारत और चीन जैसे देशों की ओर ताकता है। सही है कि भारत में खेती का स्तर सुधारने की कोशिश नही की गयी। खेती को उन्नत नही किया गया पर अमेरिकी आरोप सरासर गलत है। आस्ट्रेलिया का सूखा, विकसित देशों में घटती खेती इसके लिए ज्यादा दोषी हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में अनाज की खपत अमेरिका की तुलना में कम बढ़ी है। साथ ही भारत में बीते 3 सालों से उपज भी ठीक है। – उमर सलीम पीरजादा, संयोजक, एएमयू मूवमेंट फाउंडेशन, इंदिरानगर, लखनऊ
वो कत्ल भी करते हैं तो ……..
हकीकत तो यह है कि एक भारतीय की तुलना में एक अमेरिकी तीन गुना ज्यादा पौष्टिक व बढ़िया खाना खाता है। अमेरिका के मुखिया जार्ज बुश आखिरकार यह क्यों भूल जाते है?
ऊपर से अमेरिका व यूरोप की बायोडीजल नीति के तहत कृषि योग्य भूमि का बहुत तेजी से व्यवसायीकरण व मक्का सहित कई खाद्यान्नों का बायोडीजल में इस्तेमाल जैसी चीजों को भुलाया नहीं जा सकता। बुश के बारे में तो यही कहा जा सकता है कि वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता, हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम। –
हर्षवर्ध्दन कुमार, डी- 55 56, गांधी विहार, नई दिल्ली
…और यह है अगला मुद्दा
सप्ताह के ज्वलंत विषय, जो कारोबारी और कारोबार पर गहरा असर डालते हैं। ऐसे ही विषयों पर हर सोमवार को हम प्रकाशित करते हैं व्यापार गोष्ठी नाम का विशेष पृष्ठ। इसमें आपके विचारों को आपके चित्र के साथ प्रकाशित किया जाता है। साथ ही, होती है दो विशेषज्ञों की राय।
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