क्या भारतीय मीडिया कंपनियां आम लोगों के प्रति अपनी जवाबदेही को लेकर दूसरी कंपनियों से अलग है? शायद इसी जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताया गया था।
शायद इसी वजह से मीडिया को यह दायित्व सौंपा गया था कि वह लोकतंत्र पर नजर रखे और उसमें संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाए। अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता को शामिल किया गया था।
मीडिया से इसी वजह से यह अपेक्षा की जाती है कि वह लोकहित में पूरी और संतुलित खबरें उपलब्ध कराए। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) एक्ट 1978 में एक ऐसा ढांचा तैयार किया गया था, जिससे बेरोकटोक रिपोर्टिंग की जा सके। पहले ऐसा माना जाता था कि मीडिया में प्रशासनिक और वित्तीय निर्णयों को संपादकीय गतिविधियों से अलग रखा जाना चाहिए। यह अलग बात है कि उस समय भी इसे सभी लोग नहीं मानते थे।
हालांकि कुछ लोग इस सिद्धांत को कुछ हद तक स्वीकार भी करते थे और वह इसलिए क्योंकि ऐसा माना जाता रहा है कि देश में मीडिया पेशेवरों को संपादकीय अखंडता बनाए रखने के लिए शुरुआती दौर में काफी संघर्ष करना पड़ा था। पर आज मीडियाकर्मियों के सामने कुछ दूसरे तरह की चुनौतियां हैं। आज वे जिन खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं, उनके लिए यह जरूरी होता है कि वे सूचना तो देती ही हों और साथ ही साथ मनोरंजक भी हों। खासतौर पर टेलीविजन पर जो खबरें दी जाती हैं उनकी पैकेजिंग को लेकर विशेष सावधानी (कि वे मनोरंजक हों) बरती जाती है।
एक और किस्म का चलन जो इन दिनों देखने को मिल रहा है, वह यह है कि अब युवाओं का आकर्षण वर्ल्ड वाइड वेब और व्यक्तिगत ब्लॉग्स की ओर बढ़ने लगा है। उन्हें लगता है कि इन माध्यमों पर जो सूचनाएं आती हैं वे अधिक वस्तुपरक होती हैं। वे अब मुख्यधारा मीडिया को मनोरंजन के लिहाज से ही देखती हैं। पर यह भी अपने आप में महत्त्वपूर्ण विषय है कि ऐसे समय में जबकि आर्थिक हालात बहुत स्थायी नहीं हैं और इनमें उठापटक जारी है तो क्या मीडिया कंपनियां बेहतर निवेश की अपेक्षा न करें, ऐसा मुमकिन है।
मीडिया कंपनियां भी तो दूसरी कंपनियों की तरह ही यही चाहती होंगी कि उनके शेयरधारकों को निवेश पर अधिक से अधिक रिटर्न मिल सके। मीडिया जगत से जुड़े लोगों को छोड़ दें तो भारतीयों को तो इस बात की भी जानकारी नहीं होगी कि मीडिया समूहों का किन निजी कंपनियों के साथ गठजोड़ होगा। दरअसल इन्हीं निजी भागीदारियों की वजह से कई दफा मीडिया कंपनियां साझेदार कंपनियों के उत्पादों या सेवाओं का प्रचार प्रसार करती हैं। इसके बदले में वे ऐसी कंपनियां मीडिया कंपनियों के शेयर खरीद लेती हैं। पर मीडिया कंपनियां जो दावा पेश करती हैं, वे इससे बिल्कुल जुदा हैं।
उनका कहना है कि वे आमतौर पर छोटी कंपनियों के साथ गठजोड़ करती हैं जिनके पास पैसे की कमी होती है और वे इस स्थिति में नहीं होतीं कि अपने किसी उत्पाद या सेवा के लिए खर्च कर सकें। अभी देश में लोगों के बीच इस पर भी जागरूकता नहीं है कि कई दफा भारतीय मीडिया में जो आलेख प्रकाशित किए जाते हैं वे किसी उत्पाद या सेवा के प्रचार के लिए होते हैं और दरअसल उन्हें विज्ञापन कहना भी गलत नहीं होगा जिसके लिए मीडिया कंपनी को भुगतान किया जाता है। पिछले दस सालों में भारतीय मीडिया कंपनियों के सूचीबद्ध होने का चलन बढ़ता जा रहा है और इनमें से कुछ का बाजार पूंजीकरण 1,000 करोड़ रुपये से अधिक है।
कई देशों में तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि पब्लिक रेडियो और टेलीविजन की विज्ञापनों पर निर्भरता को कम करने के लिए उन्हें थोड़ा बहुत अनुदान दिया जाता है। माना जाता है कि कम से कम विज्ञापनों के प्रभाव से दूर रहने से उनकी संपादकीय वस्तुपरकता तो बनी रहती है। हालांकि, भारत में अब तक इस तरह का चलन देखने को नहीं मिला है। अगर हम अपने देश में पुराने समय के मीडिया की तुलना अब की मीडिया कंपनियों से करेंगे तो उनमें काफी फर्क देखने को मिलेगा।
अब तो कई मीडिया कंपनियां केवल अपने राजनीतिक और कारोबारी हित साधने का जरिया बन कर रह गई हैं। अब अगर ऐसी मीडिया कंपनियां किसी एक पक्ष से प्रभावित होकर खबरें देने लगेंगी तो निश्चित है कि आने वाले समय में इनके दर्शकों की संख्या भी कम होती जाएगी। इसका सीधा असर उन्हें मिलने वाले विज्ञापनों पर पड़ेगा। पर फिर भी विज्ञापन नहीं मिलने के बाद भी उन मीडिया कंपनियों पर खास असर नहीं पड़ेगा जिनके प्रायोजकों की जेबें गर्म हैं। पर यहां सुकून की बात यह है कि मीडिया का यह मॉडल लंबे समय तक नहीं चल सकेगा।
मीडिया का एक काम जनमत तैयार करना भी होता है और अगर मीडिया कंपनियों के टारगेट ऑडियंस ही कम होने लगेंगे, तो वे अपना लक्ष्य कैसे पूरा कर पाएंगे। मीडिया कंपनियों के प्रबंधक भी अपनी ओर से प्रायोजकों के साथ निकटता बनाए रखते हैं और उनके दिमाग में यह बात घूमती रहती है कि आखिर कैसे शेयरधारकों के दूरगामी हित साधे जाएं। पर मीडिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर उन्हें चौथे स्तंभ की भूमिका निभानी है तो उन्हें सरकार या फिर विशेष हित साधने वाले समूहों के अनुचित कार्यों का पर्दाफाश करने के लिए भी तैयार होना चाहिए।
भारतीय टेलीविजन और अखबार समूह अपने अपने स्तर पर सार्वजनिक सेवा के लिए पुरस्कार भी बांटते हैं। ऐसा नहीं है कि ये चलन सिर्फ देसी मीडिया में है बल्कि विदेशी मीडिया भी ऐसे आयोजन करता रहा है। कई दफा ये अवार्ड निर्णायक मंडली में शामिल विशिष्ट शख्सियतों के सुझाव पर दिए जाते हैं। अब यह अपने आप में काफी दिलचस्प है कि कारोबारी खबरें प्रसारित करने वाले निजी टेलीविजन चैनल वित्तीय क्षेत्र के नियामकों को अपनी ओर से अवार्ड देते हैं।
अब जरा सोचिए कि क्या हाल हो अगर साबुन से स्टील बनाने वाली हर छोटी बड़ी कंपनी सार्वजनिक सेवा के लिए पुरस्कार बांटने लगे और इसके लिए टेलीविजन पर समय खरीदने लगे। हालांकि, यह भी तर्क हो सकता है कि मीडिया की ओर से पुरस्कार वितरण समारोहों को बहुत गंभीरता के साथ नहीं लिया जाता है। जरूरी है कि सरकारी अधिकारी अपने निजी और राजनीतिक हित से ऊपर उठकर सोचना शुरू करें। वे जो निर्णय लेते हैं उनमें राजनीतिक और निजी हितों का प्रभाव नहीं हो।
हर बार मीडिया से ही यह उम्मीद करना कि वह अपने स्तर को बनाए रखने के लिए खुद पर नियंत्रण रखेगा और अपने लिए मानदंड तैयार करेगा, वाजिब नहीं लगता। सभी मामलों पर विचार करने के बाद यही समाधान सूझता है कि प्रेस काउंसिल आफ इंडिया और संपादकों को एकजुट होकर काम करना चाहिए ताकि वे मौजूदा गतिविधियों पर नजर रख सकें और ऐसे नियम सुझा सकें, जो भारतीय मीडिया के लिए फायदेमंद हों।