facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

अमेरिकी मर्ज की हिंदुस्तानी दवा

Last Updated- December 07, 2022 | 6:43 PM IST

अमेरिका के फ्लोरिडा में मियामी चिल्ड्रंस हॉस्पिटल(एमसीएच) काफी बड़ा है। इस हॉस्पिटल में 289 बेड हैं, 650 फिजीशियन हैं, 2000 कर्मचारी हैं और साथ ही 40 बालरोग विशेषज्ञ भी हैं।


इसी हॉस्पिटल में राज्य का फ्री स्टैंडिंग पेडिएट्रिक ट्रॉमा सेंटर भी है। कुल मिलाकर अमेरिका के दक्षिणपूर्व हिस्से में मौजूद यह सबसे बड़ा टीचिंग हॉस्पिटल है। पिछले साल हॉस्पिटल के कुछ अधिकारियों को लगा कि इस हॉस्पिटल के स्तर में कुछ गिरावट आ रही है। यहां पर ‘वेट टाइम’ बढ़ता जा रहा था।

वेट टाइम वह समय होता है जब कोई मरीज हॉस्पिटल में आता है और जिस समय उसका इलाज शुरू होता है, इस बीच के समय को ही वेट टाइम कहते हैं। इस हॉस्पिटल में वेट टाइम बढ़कर दो घंटे तक पहुंच गया था। खास तौर से इमरजेंसी रूम (ईआर) में इस बात का बहुत फर्क पड़ता है जहां इलाज में जरा सी देरी मरीज की जान भी ले सकती है।

इस लिहाज से वेट टाइम को नीचे लाना बेहद जरूरी हो गया था। गौरतलब है कि अमेरिका में वेट टाइम एक बहुत बड़ा मानदंड है। वहां पर सरकार, नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने वाले संस्थानों में वेट टाइम पर नजर रखती है। इस साल की शुरुआत में एमसीएच ने तय किया कि इस मामले में कुछ न कुछ ऐसा किया जाए जिससे सर्विस का स्तर बेहतर हो पाए। इसके लिए एमसीएच ने जेनपेक्ट से संपर्क किया।

हॉस्पिटल, सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़ा निवेश करने के लिए तैयार था। हॉस्पिटल से जुड़े लोगों का यह भी मानना था कि प्रक्रिया में सुधार किये बिना बहुत अच्छे नतीजे नहीं हासिल किए जा सकते। एमसीएच के मुख्य परिचालन अधिकारी केविन हैमरमैन कहते हैं, ‘इस प्रायोजिक परियोजना के जरिये हम ईआर में कामकाज का आकलन कर रहे हैं। हम जल्द ही वेट टाइम को कम करने का रास्ता खोज लेंगे और इसके लिए हम जेनपैक्ट की मदद ले रहे हैं।’

जेनपैक्ट की शुरुआत 1997 में जीई कैपिटल के बीपीओ के तौर पर हुई थी और तीन साल पहले ही यह स्वतंत्र कंपनी बन गई है। इसके बाद इसने विनिर्माण क्षेत्र में कामकाज को सुधारने और जाया होने वाली चीजों को कम करने के क्षेत्र में काम किया। इसके चलते ईआर की 120 खास प्रक्रियाओं में कमी आई है और एक वैल्यू स्ट्रीम मैप तैयार किया गया है।

इससे मरीजों को भी यह पता लग पाएगा कि यहां पर काम को कैसे अंजाम दिया जाता है? हैमरमैन बताते हैं, ‘मान लीजिए कोई फ्रैक्चर का मामला आता है। आधे घंटे में ही नर्स उसके मामले को देखने लगेगी। इसके बाद वह उसे संबंधित डॉक्टर के पास भेज देगी।

उसके बाद उसका एक्स रे कराया जाएगा और फिर ऑपरेशन से पहले रेडियोलॉजिस्ट को बुलाया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में कई जगह वक्त की बर्बादी होती है। मसलन नर्स, डॉक्टर के लिए इंतजार करती है और इसमें बहुत सारी कागजी-कार्यवाही में काफी वक्त लग जाता है।’

बताया जा रहा है कि जेनपैक्ट ने ईआर में कामकाज के स्तर को सुधारने के लिए 13 फॉर्मूले सुझाए हैं। इन सुझावों में प्री रजिस्ट्रेशन और नर्सों के शेडयूल के अलावा कई और बातों का उल्लेख किया गया है। जेनपैक्ट ने मरीजों की केस शीट को फिर से डिजाइन करने का प्रस्ताव रखा है और यह भी सुझाया है कि उन चीजों को बाहर कर देना चाहिए जिनका काफी अरसे से उपयोग नहीं किया गया है।

जेनपैक्ट का मानना है कि इससे ईआर को चलाने में 10 फीसदी कम खर्च आएगा और वेट टाइम भी 75 फीसदी कम होगा। एमसीएच ने अपने हॉस्पिटल की परिचालन लागत में कमी करने के लिए भी जेनपैक्ट से सलाह लेने के लिए उसके साथ अपने अनुबंध को आगे बढ़ाया है। हैमरमैन का अनुमान है कि जिन परिवर्तनों को लागू किया है उसके चलते 10 लाख डॉलर की बचत का अनुमान है।

हैमरमैन इस बात से संतुष्ट नहीं हैं बल्कि वह अगामी वर्षों में एक करोड़ डॉलर सालाना तक बचाना चाहते हैं। जेपपैक्ट के  सीनियर वाइस प्रेसीडेंट और एमसीएच प्रोजेक्ट के प्रमुख (री इंजीनियरिंग) एस बाला बताते हैं कि अमेरिकी हॉस्पिटल अब अपना सारा रिकॉर्ड डिजिटल करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

बाला का कहना है कि अमेरिका में हॉस्पिटल बेहद कम मुनाफे पर काम कर रहे हैं, ऐसे में लागत में कमी करना वक्त की जरुरत है। लेकिन अब सवाल है कि एक भारतीय कंपनी अमेरिका के हॉस्पिटल में बेहतर सेवाओं को बढ़ाने के लिए काम करेगी? क्या ये लोग एक तरह से अमेरिकी लोगों के मुनाफे या ऐसी ही मदद के लिए ही काम नहीं कर रहे हैं। अब जागरूक होने का समय आ गया है।

हालांकि अब उम्मीदों की बेहद बड़ी तस्वीर अब नजर आ रही है। अगर ऐसा ही बेहतर प्रंबंधन जारी रहा तो बीपीओ में भारतीय सफलता की इबारत लिखी जाएगी। हैमरमैन इन नतीजों से बेहद खुश हैं। उनका कहना है, ‘हमारे काम में खराब चीजों का परीक्षण करके उसे अलग किया जाता है उसके बाद ही दूसरे चरण में पहुंचते हैं। एक तरह से यह पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया है और यह सही भी है।’

वह इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हर चरण पर देखभाल के लिए जो पहल की जाती है उसमें इस बात का ख्याल रखा जाता है कि इमरजेंसी रुम के  स्टाफ के पहले से ही व्यस्ततम समय में और समय की कोई मांग न रखी जाए। एमसीएच की टीम को स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल के लिए छोटी-छोटी सावधानियों के लिए  प्रशिक्षित किया गया और सुधार की गुंजाइश बनाई गई।

केपीएमजी में सूचना तकनीक के सलाहकार विरल ठक्कर का कहना है, ‘वे दिन लद गए जब बीपीओ कंपनियां सेल्स जैसे कामों में जुटी थी अब तो पूरे कारोबार का काम संभाल लिया है। बीपीओ कंपनियां केवल कर्मचारियों को लेने और देने के काम से ही नहीं जुड़ी है बल्कि अब ये अपनी वैल्यू चेन चलाना चाहते हैं।

पहले कुछ मुनाफे की साझेदारी की बात वैकल्पिक थी और अब तो यह काम के कॉन्ट्रैक्ट की एक निहायत जरूरी चीज बन गई है।’ ग्लोबल डेटा सोर्सिंग कंपनी टीपीआई ने हाल ही में एक आंकड़ा रिलीज किया है। इसके मुताबिक वर्ष 2007-08 के पहले छमाही के दौरान भारतीय आईटी कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट में कुल 24 फीसदी का इजाफा हुआ है जबकि सालाना 36 फीसदी का इजाफा हुआ है।

इन नए कॉन्ट्रैक्ट की संख्या बढ़ने से पहले से ही मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट को बेहतर बनाने का दबाव और बढ़ेगा। ठक्कर का कहना है, ‘बीपीओ इंडस्ट्री का पूरा बिजनेस मॉडल ही बदलाव को आंकने पर बनता है। पहली बार में ही आपके पास एक डेटा होता है कि एक प्रोसेस में कितना समय आपको देना पड़ेगा और उसकी लागत कितनी होगी।

इसके अलावा बीपीओ अपने आप को ज्यादा सक्षम बना रहे हैं। खास तौर पर वैश्विक मंदी के समय में। कुछ हद तक वे अपने सबक का इस्तेमाल कर रहे हैं और अपनी कोशिश जारी रखे हुए हैं।’ गार्टनर ने भी इसी तरह की रिपोर्ट पेश की है। उसके मुताबिक साल 2004 में टीसीएस, इन्फोसिस और विप्रो की बड़ी सफलता राज यही है कि उन्होंने सारी प्रक्रियाओं में अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिया है।

इसके अलावा भी दूसरी वजहें हैं मसलन बेहतर मानव संसाधन प्रबंधन, और कम दाम में अच्छे नतीजे देना। बेहतरीन प्रदर्शन के लिए भारत की इन तीन कंपनियों ने एक फ्रेमवर्क बनाने के लिए ज्यादा खर्च किया है। इसके अलावा  बेहतर मार्केटिंग रणनीति भी अपनाई है ताकि यह संदेश लोगों तक जाए कि वे लगातार अच्छे नतीजे देने में सक्षम हैं।

ठक्कर का कहना है कि कई उम्मीदों के बीच इंफोसिस और टीसीएस में जूझ रहे हैं। इसमें से ज्यादातर प्रोजेक्ट ऑटोमोटिव सेक्टर में हैं। इसके अलावा होटल, अस्पताल और एविएशन कंपनियों के प्रोजेक्ट भी हैं। मिसाल के तौर पर टीसीएस अपने ग्राहकों को ‘आईटी एनेबल्ड लीन बिजनेस सॉल्यूशंस’ मुहैया करा रही है। इसके तहत इंडस्ट्रियल मशीनरी, एयरोस्पेस और केमिकल्स के दक्ष 75 कंसल्टेंट काम करते हैं।

इसके अलावा मेटल्स, फार्मास्यूटिकल्स और बेहतर तकनीकों की मांग भी बढ़ रही है। टीसीएस के वाइस प्रेसीडेंट और हेड (मैन्यूफैक्चरिंग) मिलिंद लक्कड़ का कहना है, ‘हमने बेहतर तकनीक का इंतजाम किया है, और हम मनचाहे मुनाफे के लिए मौके का फायदा भी उठाना चाहते हैं।

अगर आप किसी काम को पूरी बेहतरी के साथ करना चाहते हैं तो उससे कई छोटे-छोटे प्रोजेक्ट सभी जुड़ जाते हैं। इसके अलावा इसमें कई फैसलों की जरूरत होती है जिससे कारोबार बढ़े। इसके बाद ही आईटी की सक्षमता बढ़ेगी और मुनाफे का आंकड़ा भी बढ़ सकता है। ग्राहकों की ओर से बेहतर सॉल्यूशन फे्रमवर्क की मांग हो रही है।’

First Published - August 26, 2008 | 1:38 AM IST

संबंधित पोस्ट