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अमेरिकी कंपनी की दिक्कतों का भारतीय समाधान

Last Updated- December 07, 2022 | 8:43 PM IST

पिछले साल जून में जब दिनेश पालीवाल ने एबीबी कंपनी छोड़ी तो उनके कई सहकर्मियों और कुछ विश्लेषकों को उनके इस फैसले से बड़ी हैरानी हुई।


अध्यक्ष (वैश्विक बाजार और तकनीक), चेयरमैन और सीईओ (उत्तरी अमेरिका) और हाई प्रोफाइल ग्रुप एक्जीक्यूटिव कमिटी के सदस्य होने के नाते बहुत से लोगों का यह मानना था कि इस प्रमुख वैश्विक इंजीनियरिंग कंपनी के शीर्ष पद के पालीवाल प्रबल दावेदार थे।

पालीवाल ने अमेरिका की हर्मन इंटरनेशनल जो प्रोफेशनल, पर्सनल और ऑटोमोटिव कम्युनिकेशन उपकरण (स्पीकर, ऐम्प्लीफायर और ऑडियो सिस्टम्स) बनाती है, के साथ जुड़ने के लिए एबीबी छोड़ी थी। भले ही पालीवाल इस नई कंपनी के साथ जुड़ रहे हों पर यह ध्यान रखना चाहिए कि एबीबी की तुलना में यह काफी छोटी है।

हर्मन का कारोबार महज 3.5 अरब डॉलर का है जो एबीबी (वर्ष 2005 में कंपनी का राजस्व 29 अरब डॉलर था) से काफी कम है। पर हर्मन के पोर्टफोलियो में जेबीएल, इनफिनिटी, मार्क लेविंसन और हर्मन कार्डन जैसे बड़े ब्रांड शुमार हैं।

दरअसल प्रमुख प्राइवेट इक्विटी फर्म कोलबर्ग क्रेविस रॉबर्ट्स ऐंड कंपनी (केकेआर) के सह संस्थापक हेनरी क्रेविस का एक फोन पालीवाल के पास आया था और तभी उन्होंने हर्मन के साथ जुड़ने का मन बना लिया। उनकी कंपनी ने हर्मन को खरीदने के लिए 8 अरब डॉलर की पेशकश की थी और क्रेविस चाहते थे कि उनका कोई आदमी कंपनी की ड्राइविंग सीट पर हो।

जुलाई 2007 में पालीवाल हर्मन के साथ जुड़ गए। पर उन्होंने जिस समय हर्मन के साथ रिश्ता जोड़ा शायद उससे बुरा समय कोई नहीं हो सकता था। इसके ठीक बाद वित्तीय बाजार में जबरदस्त उथल पुथल मची और इसमें गिरावट देखने को मिली। कुछ ही हफ्तों के बाद केकेआर डील भी पूरी होते होते रह गई और हर्मन के शेयरों में जबरदस्त गिरावट आई।

कंपनी के शेयर गिरकर आधे से भी कम कीमत पर रह गए। पर फिर भी पालीवाल ने कंपनी के साथ रहने का मन बनाया। कंपनी चाहती तो अधिग्रहण मामले में पीछे हटने के लिए केकेआर पर पेनल्टी लगा सकती थी पर इसके बदले कंपनी ने केकेआर से 5 सालों के लिए एक फीसदी की ब्याज दर पर 40 करोड़ डॉलर का ऋण लिया। 51 वर्षीय पालीवाल को यह समझते देर नहीं लगी कि कंपनी के लिए कौन कौन सी समस्याएं हैं।

हर्मन को प्रमुख ऑटोमोबाइल उत्पादकों से 5 अरब डॉलर का ठेका मिला हुआ था जो उसे 2009 से 2012 के बीच में पूरा करना था पर इन ऑडरों को पूरा करने के लिए कंपनी शोध और विकास पर नाममात्र ही खर्च कर रही थी।

पिछले कुछ सालों में कंपनी ने 8 से 10 अधिग्रहण किए थे पर उन सभी कंपनियों को मूल कंपनी के साथ जोड़कर नहीं चलाया जा रहा था। पालीवाल ने बताया, ‘सारी कंपनियां अलग अलग काम कर रही थीं।’ ऐसे में स्वाभाविक है कि खर्च भी बढ़ेगा ही।

अगर हर्मन के लिए हालात बिगड़ते जा रहे थे तो उसके पीछे एक वजह यह भी थी कि कंपनी की 95 फीसदी इंजीनियरिंग और उत्पादन इकाइयां यूरोप और अमेरिका की हाई कॉस्ट लोकेशन में थीं। थे। पर पालीवाल को इन समस्याओं के बारे में पता था। जब वह एबीबी के साथ थे तो उन्होंने कारोबार के विस्तार के लिए चीन और भारत का रुख किया था क्योंकि इन देशों में उत्पादन पर खर्च कम आता है और यहां का बाजार भी काफी तेजी से उभर रहा था।

इसका नतीजा यह हुआ था कि बाजार में बेहतर पकड़ तो बन ही रही थी, साथ ही बचत भी पहले की तुलना में अधिक होने लगी थी। उन्होंने तय किया कि हर्मन के लिए भी वह कुछ ऐसी ही योजनाएं तैयार करेंगे। पालीवाल ने खर्चे को कम करने के लिए अमेरिका में चार इकाइयों को बंद कर दिया और यूरोप में तीन इकाइयों में उत्पादन को कम किया गया।

इसके बदले उन्होंने चीन में एक नई इकाई स्थापित की तथा हंगरी और मेक्सिको में संयंत्रों की संख्या दोगुनी कर दी। इसी क्रम में अमेरिका में करीब 400 कर्मचारियों को नौकरी से हटाया गया। पिछले हफ्ते हर्मन ने विप्रो के साथ मिलकर बेंगलुरू में शोध और विकास केंद्र खोला है। विप्रो के करीब 200 कर्मचारी हरमन के लिए शोध का काम करेंगे।

शोध हैंड्स फ्री, नेविगेशन और ब्लूटूथ टेक्नोलोजीस को लेकर किया जाएगा। शोध से जुड़े कई लोगों को यूरोप में ऑटोमोटिव उपभोक्ताओं के पास भेजा गया है ताकि उनकी जरूरतों को समझा जा सके। साथ ही हर्मन की सभी 20 कारोबारी इकाइयों को ग्लोबल सोर्सिंग और ह्यूमन रिर्सोसेज के लिए एक साथ जोड़ा गया है।

पालीवाल को उम्मीद है कि इन सभी प्रयासों से 2010 तक खर्च में 40 करोड़ डॉलर की कटौती की जा सकेगी। वहीं हर्मन ने ऑटोमोटिव उत्पादों के शोध और विकास के लिए 25 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। हर्मन के कारोबार में 70 फीसदी हिस्सेदारी ऑटोमोटिव उत्पादों की ही है। कंपनी के थिंक टैंक में भी काफी फेरबदल किया गया है। कंपनी के बोर्ड के सदस्यों में 70 फीसदी और शीर्ष प्रबंधन में शामिल 75 से 80 फीसदी लोग नए हैं।

खर्च को कम करना पालीवाल की रणनीति का महज एक हिस्सा भर है। कंपनी ने दूसरे देशों में विस्तार योजनाओं के लिए कुछ नए उपाय किए हैं। चीन में बाजार की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए एक फुल टाइम कंसल्टेंट नियुक्त किया गया है। आगे भारत और रूस के लिए भी ऐसा ही कुछ करने की तैयारी है।

पालीवाल कहते हैं, ‘हमारे कारोबार में इन तीनों देशों का हिस्सा फिलहाल 10 फीसदी है। आने वाले पांच सालों में यह हिस्सेदारी बढ़कर 30 से 40 फीसदी तक होनी चाहिए।’ नवंबर में हर्मन का प्रबंधन बोर्ड चीन के दौरे पर जाने वाला है और पालीवाल बताते हैं कि हो सकता है कि यह दल भारत का दौरा भी करे।

भारत के साथ पालीवाल का गहरा रिश्ता है। पालीवाल के पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर भारत की आजादी के लिए ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। पालीवाल ने आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद रुड़की के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से भी शिक्षा प्राप्त की है।

First Published - September 10, 2008 | 11:51 PM IST

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