राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे की मानें तो मुल्क में पांच साल से कम उम्र तकरीबन आधे यानी 48 फीसदी बच्चे भूखे हैं।
इसके अलावा, इस सर्वे का यह भी कहना है कि 43 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से काफी कम था। इसीलिए पिछले हफ्ते जब योजना आयोग की सदस्य सईदा हमीद ने यह कहा कि एकीकृत बाल सेवा कार्यक्रम (आईसीडीएस) के लिए दिए जा रहे पैसे लोगों तक नहीं पहुंच रहे, तो यह वाकई काफी हैरान कर देने वाली बात थी।
यह 6,300 करोड़ रुपये का कार्यक्रम देश की करीब नौ लाख आंगनवाड़ियों में छोटे बच्चों को पोषक खाना खिलाने के लिए चलाया जाता है। लेकिन सईदा की मानें तो इस योजना के तहत केंद्र सरकार एक बच्चे पर औसत एक रुपया ही देती है। ऊपर से, सरकार भी यह मानती है कि मुल्क के आधे जरूरतमंद बच्चों तक भी यह योजना नहीं पहुंच रही। इसकी वजह हाशिये पर जिंदगी गुजार रहे इन बच्चों की जिंदगियां आज की तारीख में खतरे में पड़ गई हैं।
इस कार्यक्रम के तहत योजना बनाई गई थी कि छह साल के कम उम्र के बच्चों को एक निर्धारित मात्रा में पका हुआ पौष्टिक खाना दिया जाएगा। जैसे उड़ीसा में पैनकेक देने की योजना बनाई गई थी, जबकि उत्तर प्रदेश में गेहूं और चीनी से बना हुआ एक व्यंजन देने की। इसी तरह मुल्क के अलग-अलग हिस्से में अलग-अलग खाना देने की योजना बनाई गई थी। साथ ही, बच्चों को अपना दूध पिलाने वाली मांओं के लिए खाने को पैक करके देने की योजना बनाई गई थी। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में प्रशासन को कम वजन के बच्चों और मांओं की दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ती तादाद की वजह से तो पसीना आ गया। इसीलिए उन्होंने फटाफट कम वजनी बच्चों और उनके माता-पिताओं को इलाज के लिए कैंपों में लाना शुरू कर दिया। प्रशासन ने उन लोगों को कैंपों में रहने के लिए पैसे दिए और उन्हें पौष्टिक खाना बनाना सिखाया। साथ ही, बच्चों को भी नियमित तौर पर पौष्टिक खाना खिलाया गया। उन लोगों को वापस तभी भेजा गया, जब बच्चों का वजन सामान्य हुआ।
खाने और जागरूकता को साथ में जोड़ने की योजना काफी कामयाब रही। यह मॉडल गुजरात सरकार को भी काफी भाया। इसलिए तो गुजरात ने भी इस मॉडल को अपना लिया है। आईसीडीएस में इस बात के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है, जिसके जरिये दो साल से कम उम्र के जरूरतमंद बच्चों की पहचान की जा सके। ध्यान देने लायक बात यह है कि यही वह उम्र है, जब कुपोषण की वजह से बच्चों के दिमाग पर असर पड़ने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
उससे भी बड़ी बात यह है कि, क्या मुट्ठी भर खाने से बच्चों में से कुपोषण को खत्म किया जा सकेगा? वह भी ऐसा खाना जो गेहूं और चीनी के मिश्रण से बना हो और जिसे बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें केवल एक-एक रुपया दे रही हैं। क्या ऐसे खाने से कुपोषण को दूर किया जा सकता है? हालांकि, देर ही सही केंद्र सरकार को इस बात का अहसास हो गया है कि एक रुपये की रकम कुछ भी नहीं है। इसीलिए तो उसने इस ‘बढ़ाकर’ दो रुपये करने का फैसला किया है।
राज्य सरकारों से भी उम्मीद की जा रही है कि वह इसमें अपने हिस्से को बढ़ाकर दो रुपये तक कर देंगी। इसका मतलब है कि अगर ऐसा हुआ तो एक बच्चे को करीब 4 रुपये का खाना मिल पाएगा। हालांकि, राज्यों की इस सूची में तमिलनाडु जैसे सूबे भी हैं। तमिलनाडु ने तो जरूरतमंद बच्चों को दिए जाने वाले खाने में अंडे, फल और दूसरे पोषक तत्त्वों को भी जोड़ दिया है। वहीं, उड़ीसा में मांओं को इस कार्यक्रम के तहत बच्चों के लिए खाना बनाने की इजाजत दी गई है। केरल और गुजरात में भी ऐसी ही योजनाएं अपनाई गईं हैं, जिसमें खास वर्गों को लक्ष्य करके कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
समाज के हाशिये पर जीवन गुजार रहे इन बच्चों के ऊपर इतनी कम रकम खर्च करने के पीछे यह वजह बताई जा रही है कि यह रकम बच्चों की 300 कैलोरी की जरूरत पूरी करने के लिए काफी है। यह आंकड़ा 1970 के दशक में निकला गया था, जिसे दो दशक बाद गलत करार दे दिया गया था। ताजा आंकड़ों के मुताबिक छह साल से कम उम्र के बच्चों को हर दिन कम से कम 600 कैलोरी की जरूरत होती है। इसीलिए 4 रुपये की यह छोटी सी रकम इसका बोझ उठाने के लिए नाकाफी है।
ऊपर से, एक वक्त का खाना खिलाने से समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता। साथ ही, मांओं को भी सिखाने के लिए कोई व्यावहारिक कार्यक्रम नहीं चलाया जा रहा है। यह कार्यक्रम योजना आयोग और महिला व बाल विकास मंत्रालय की आपसी खींचतान में शहीद हो रहा है। दोनों इस बात पर झगड़ रहे हैं कि बच्चों को पका कर खाना दिया जाए या पहले से बिस्कुट जैसा तैयार खाना। हालांकि, हकीकत तो यही है कि ज्यादातर बच्चों को दोनों में से कुछ भी नहीं मिल रहा है। इसकी वजह यह है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ज्यादा से ज्यादा बच्चों को इस कार्यक्रम के तहत लाने के लिए कोई प्रोत्साहन राशि नहीं दी जाती।
वैसे, केंद्र सरकार इस योजना के लिए पैसे तो दे रही है, लेकिन यह ठीक से लागू की जा रही या नहीं, इसकी जिम्मेदारी उठाने के लिए वह तैयार नहीं है। इसकी जगह योजना आयोग और मंत्रालय इसका ठीकरा हमेशा राज्य सरकारों पर फोड़ते रहते हैं। वैसे, आरोप-प्रत्यारोप की जंग में जीत किसी की भी हो, हार इन मासूम बच्चों की ही होगी।