इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
पश्चिम एशिया संकट और उसके कारण कच्चे तेल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों को लगा आपूर्ति झटका बताता है कि भारत एक आर्थिक तूफान की ओर बढ़ रहा है। उभरते जोखिमों को दो घटकों में बांट कर देखा जा सकता है: उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पादों जैसे कच्चे माल की कम उपलब्धता के कारण जरूरी चीजों की कमी और मजबूत अल नीनो प्रभाव के कारण मॉनसून विपरीत रहने वाला है।
विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों में बिकवाली कर रहे हैं जिसके चलते देश में शुद्ध पूंजी की आवक कम हो रही है। भुगतान संतुलन की चुनौतियां व्याप्त हैं और विनिमय दर पर दबाव उत्पन्न हुआ है। निजी कारोबारी क्षेत्र की ओर से धीमे निवेश की समस्या पहले से व्याप्त है। इस सूची में जहां दो शुरुआती घटकों पर ध्यान देने की जरूरत है वहीं देश की दीर्घकालिक वृद्धि संभावना तीसरे घटक पर कहीं अधिक निर्भर करती है।
पिछले दशक के दौरान कई अहम नीतिगत और नियामकीय बदलाव हुए। इनमें दिवालियापन और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), द्विपक्षीय निवेश संधियों (बीआईटी) का पुनर्गठन और पूंजीगत आय पर कर लगाने के तरीके में बदलाव शामिल था। इस आलेख में इनमें से कुछ बदलावों के संभावित विपरीत प्रभावों को लेकर एक वैचारिक प्रयोग करने का प्रयास करेंगे। आईबीसी से शुरुआत करें तो इसे 2016 में इस स्पष्ट उद्देश्य के साथ पेश किया गया था कि वित्तीय अनुशासन लाया जाए और कॉरपोरेट में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जाए। दस वर्ष बाद, इस संहिता ने कॉरपोरेट क्षेत्र में कुछ व्यवहारगत बदलावों को प्रेरित किया है।
प्रारंभिक अवधि में व्यापक स्तर पर ऋण लेने की प्रवृत्ति में उल्लेखनीय कमी देखी गई। बदले हुए नियामक वातावरण ने कॉरपोरेट निवेश व्यवहार में बदलाव पैदा किया। निवेश को संचित आय, योग्य संस्थागत प्लेसमेंट और इक्विटी बाजारों से वित्तपोषित करने की कोशिश की गई। दूसरे शब्दों में कंपनियों ने संचित आय का बड़ा भंडार बनाया ताकि अनिश्चित समय में ऋण चुकाने में मदद मिले और निवेश भी किया जा सके।
विचार प्रयोग: निवेश व्यवहार में इस बदलाव के परिणाम। इक्विटी, धन के स्रोत के रूप में, ऋण की तुलना में अधिक महंगी होती है। इक्विटी से जुड़ा जोखिम अधिक रिटर्न की मांग करता है। नियामक वातावरण में इस संरचनात्मक बदलाव के परिणामस्वरूप नए उपक्रमों पर अपेक्षित रिटर्न दर अधिक होनी चाहिए ताकि परियोजना को आगे बढ़ाया जा सके। क्या यह निवेश के लिए एक अवरोधक के रूप में काम कर सकता है?
इस प्रभाव को उस अवधि की विशिष्टताओं ने और मजबूत किया। कोविड-19 महामारी से उत्पन्न आपूर्ति और मांग के झटके तथा पूंजी बाजारों से प्राप्त मजबूत रिटर्न। पहला कारक निवेश के लिए प्रोत्साहन को कम कर सकता है जबकि दूसरा कारक निवेश को व्यवहार्य और आकर्षक बनाने के लिए आवश्यक न्यूनतम रिटर्न सीमा को बढ़ा सकता है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण नियामक परिवर्तन बीआईटी के पुनर्गठन से संबंधित है। व्हाइट इंडस्ट्रीज और वोडाफोन जैसे कई हाई-प्रोफाइल निवेशक-राज्य विवाद में हारने के बाद, भारत ने 2016 में लगभग 75 बीआईटी को एकतरफा रूप से समाप्त कर दिया। इसके बाद आया 2016 मॉडल बीआईटी राज्य की संप्रभुता की ओर झुका हुआ था। इसमें निवेशकों से अपेक्षा की गई कि वे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का सहारा लेने से पहले पांच वर्षों तक स्थानीय न्यायिक उपायों का सहारा लें। यह तर्क दिया जा सकता है कि नियामक व्यवस्था में इस तरह का बदलाव देश में निवेश को हतोत्साहित करेगा। भारत में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह में तेज गिरावट इस कथन की पुष्टि करता प्रतीत होता है। विचार प्रयोग: बीआईटी पुनर्गठन का नकारात्मक प्रभाव शुद्ध एफडीआई प्रवाह में कमी के रूप में दिखना चाहिए या सकल एफडीआई प्रवाह में भी?
यदि यह बदला हुआ ढांचा विदेशी निवेशकों के लिए निवेश माहौल को और खराब करता है तो सकल प्रवाह भी प्रभावित होना चाहिए। हालांकि यह ध्यान देने योग्य है कि पिछले 10 वर्षों में सकल एफडीआई प्रवाह में गिरावट केवल 2022-24 के दौरान दर्ज की गई। वर्ष 2025-26 में सकल एफडीआई प्रवाह 94.53 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। सतत सकल एफडीआई प्रवाह के साथ समस्या कहीं और दिखाई देती है। शुद्ध एफडीआई प्रवाह में तेज गिरावट का एक अन्य कारण भारत से बाहर प्रत्यक्ष निवेश में वृद्धि है। इस घटक को भारतीय निवेशकों द्वारा रुचियों के स्वस्थ विविधीकरण के रूप में देखा जा सकता है।
वैकल्पिक रूप से यह भारत में घरेलू निवेश की चुनौतियों का प्रतिबिंब भी हो सकता है। यदि ऐसा है, तो यह चर्चा आईबीसी से जुड़ी हो सकती है। व्यावसायिक वातावरण में तीसरा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन पूंजी आय पर कराधान से संबंधित है। लाभांश और पूंजीगत लाभ पर कराधान में पिछले दशक में कुछ बदलाव हुए हैं। लाभांश पर कंपनी के हाथों में 20.56 फीसदी की दर से कर लगाया जाता था। वर्ष 2020 में इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया और अब ये आय निवेशक के हाथों में कर योग्य है।
दूसरी ओर सूचीबद्ध प्रतिभूतियों पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) को फिर से लागू किया गया। वर्ष 2004 से 2018 की अवधि के दौरान सूचीबद्ध प्रतिभूतियों पर प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) लगाया जाता था और वे एलटीसीजी कर से मुक्त थीं। 2018 में एलटीसीजी को पुनः लागू किया गया लेकिन एसटीटी को समाप्त नहीं किया गया। इन कदमों को मिलाकर देखा जाए तो यह पूंजी आय पर कर में वृद्धि का संकेत देता है, विशेषकर उच्च मूल्य वाले व्यक्तियों के लिए, जिनमें कंपनियों के प्रमोटर भी शामिल हैं।
विचार प्रयोग: क्या अधिक कर निवेश को हतोत्साहित करेंगे? हाल की कुछ सामग्री जिनमें अमेरिका और स्वीडन में लाभांश करों में कटौती के प्रभाव का अध्ययन किया गया है यह सुझाव देती हैं कि कर दर में कटौती से कुल निवेश में कोई बदलाव नहीं होता लेकिन यह व्यक्तिगत कंपनियों को अलग-अलग प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से उन कंपनियों के लिए जो निवेश को वित्तपोषित करने के लिए संचित आय पर निर्भर हैं, लाभांश करों में बदलाव निवेश निर्णयों के स्तर को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकता।
कुल मिलाकर, भारतीय अर्थव्यवस्था को वास्तविक अर्थव्यवस्था में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किसी तंत्र की आवश्यकता है। इक्विटी बाजारों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) की निकासी और इसके परिणामस्वरूप इक्विटी बाजारों में निवेश पर रिटर्न दर में कमी नकदी-समृद्ध कॉरपोरेट क्षेत्र को वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश की ओर ले जाने के लिए आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान कर सकती है। यदि यह कारगर होता है, तो विदेशी पूंजी की रुचि को भी वापस ला सकता है।
(लेखिका राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान की निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)