कुछ समय पहले दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा आयोजित रैली ने देश की राजनीति की अन्यथा उदासीन और कमोबेश निष्क्रिय हालत में थोड़ी हलचल पैदा कर दी है। मौजूदा हालात ऐसे हैं कि सत्तारूढ़ दल किसी भी तरह से जीतने की कोशिश करता है और हारने वाले तुरंत जीतने वाली पार्टी में शामिल हो जाते हैं। संभव है कि सीजेपी ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन के समान बड़ा बदलाव नहीं ला पाए लेकिन इसके प्रति शुरुआती आधिकारिक प्रतिक्रिया बहुत कुछ बता रही है।
एक्स और इंस्टाग्राम में सीजेपी के खातों पर रोक लगाना और कुछ हजार लोगों की रैली में बड़ी संख्या में पुलिस बल को तैनात करना। इन कदमों ने जाहिर कर दिया कि हमारा राजनीतिक और सत्ता प्रतिष्ठान, दोनों युवाओं को स्वतंत्र विचारक के रूप में देखने को लेकर असहज हैं। हालांकि रैली बिना किसी बड़ी बाधा के संपन्न हो गई और किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। इससे संकेत मिलता है कि अधिकारियों ने अपनी रणनीति को नए सिरे से समायोजित किया ताकि आगे कोई बड़ा विवाद न उत्पन्न हो। पिछले कुछ समय से बार-बार जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
उदाहरण के लिए नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए और तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की प्रतिक्रिया को ही ले लें। वर्ष 2019 में एक 19 वर्ष की विद्यार्थी को देशद्रोह का आरोप लगाकार तीन महीने के लिए जेल में बंद कर दिया गया था क्योंकि उसने बेंगलूरु में एक सीएए विरोधी रैली में पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए थे।
निस्संदेह वह नारेबाजी गलत थी लेकिन वह युवाओं की अतिउत्साही मूर्खता के अलावा कुछ नहीं थी। वास्तव में आयोजकों ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए उसका माइक भी छीन लिया था। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि एक अकेले बागी किशोर द्वारा एक आतंकी जैसे देश की तारीफ करने की छिटपुट कार्रवाई भारत की ‘संप्रभुता, एकता और अखंडता’ को कैसे खतरे में डाल सकती है, जैसा कि देशद्रोह कानून में उल्लिखित है।
सीएए के विरोध प्रदर्शनों के दौरान राज्य ने युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अपने पूरे दमनकारी तंत्र को झोंक दिया। दिसंबर 2019 में पुलिस ने जबरदस्ती जामिया मिलिया विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश किया जिसमें पुस्तकालय भी शामिल था और आंसू गैस व लाठियों का इस्तेमाल करते हुए नागरिकता कानूनों का विरोध कर रहे छात्रों को गिरफ्तार किया। कई और छात्रों को शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शनों से घसीटकर ले जाया गया और कुछ को कठोर यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार किया गया। इसके बाद 2020-21 में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन हुआ जिन्हें संसद ने बिना उचित परामर्श के जल्दबाजी में पारित कर दिया था।
अमीर और ताकतवर किसानों ने राजमार्गों को घेरकर छोटे-छोटे शहरनुमा ठिकाने बसा लिए। इससे हजारों यात्रियों को असुविधा हुई। लेकिन गिरफ्तार हुईं बेंगलुरु की 22 वर्षीय जलवायु कार्यकर्ता दिशा रवि। उनका अपराध? स्वीडिश कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग द्वारा किसानों के आंदोलन से संबंधित तैयार किए गए कथित टूलकिट की कुछ पंक्तियों को संपादित करना। सरकार ने इस टूलकिट (जो मूलतः प्रदर्शनकारियों के लिए क्या करें और क्या न करें का दस्तावेज था) और दिशा रवि की भूमिका को भारत राज्य के खिलाफ असंतोष फैलाने का देशद्रोह माना। बाद में उन्हें खालिस्तानी अलगाववादियों से भी जोड़ा गया।
ग्रेटा थनबर्ग जो उस समय 17 वर्ष की थीं वो किसानों के विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में ट्वीट करने के कारण भारत सरकार के गुस्से का केंद्र बन गईं। उन्होंने भारतीय कृषि को लेकर अधूरी जानकारी भरी नुकसान न पहुंचा सकने वाली टिप्पणियां की थीं। विदेश मंत्री ने इसे वार्ताओं को बेपटरी करने का विदेशी एजेंडा बताया। जब कैरेबियाई पॉप स्टार रिहाना भी इस ऑनलाइन अभियान में शामिल हुईं तो भारत सरकार ने उनके और कुछअन्य हस्तियों व पत्रकारों के सोशल मीडिया खातों को बंद करने का आदेश दिया।
इन सारी बातों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा धूमिल हुई। सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान आमतौर पर राष्ट्रवाद की प्रतिस्पर्धी कथाओं को असहजता से देखते हैं और चाहते हैं कि युवा वर्ग आज्ञाकारी और सवाल नहीं करने वाला बना रहे। युवाओं में एकरूपता की यह प्राथमिकता राजनीतिक नेतृत्व की उस पुकार से मेल नहीं खाती, जिसमें भारत को महान बनाने के लिए अधिक नवाचार और रचनात्मकता की आवश्यकता बताई जाती है।
ये गुण उन युवाओं में विकसित नहीं हो सकते जिन्हें चुप रहने या बिना सवाल किए आज्ञा पालन करने के लिए मजबूर किया गया हो। नवाचारी सोच के लिए प्रश्न पूछना और खुला मन आवश्यक है। जब दो प्रतिभाशाली छात्रों ने सीबीएसई परीक्षाओं की ऑनलाइन अंकेक्षण प्रणाली में खामियों और चालबाजियों को उजागर किया तो आगे का रास्ता यही था कि उनसे संवाद किया जाए, समस्या को स्वीकार किया जाए और उसे ठीक करने की दिशा में कदम उठाए जाएं बजाय कि उनके उठाए गए मुद्दों को छिपाया जाए।
इसी तरह, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं पर की गई अनुचित टिप्पणियों के खिलाफ ऑनलाइन हल्के-फुल्के मजाकिया विरोध को आरंभ में ही राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे के रूप में देखा जाने लगा। यह एक गलत आकलन साबित हुआ और परीक्षाओं के पेपर लीक के मुद्दे को उठाने तथा शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करने वाला आंदोलन गति पकड़ने लगा।
हालांकि, नवजात सीजेपी आंदोलन से बांग्लादेश और नेपाल में देखे गए कट्टरपंथी शासन परिवर्तनों जैसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना नहीं देखी जानी चाहिए। दोनों पड़ोसी छोटे और अपेक्षाकृत सामाजिक रूप से एकजुट हैं। 17.7 करोड़ लोगों के साथ बांग्लादेश की आबादी उत्तर प्रदेश से भी कम है। वहीं, 2.9 करोड़ की आबादी वाला नेपाल संख्या के हिसाब से भारतीय राज्यों में 16वें स्थान पर आता है। वह असम और पंजाब के बीच में है।
नेपाल और बांग्लादेश में वह विशाल सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक विविधता नहीं है, जिसने भारत में एक सुसंगत राष्ट्रीय युवा आंदोलन के विकास को हमेशा कठिन बनाए रखा है। भारतीय महत्त्वाकांक्षी हो सकते हैं लेकिन उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि उन आकांक्षाओं की सीमा तय करती है, जो व्यापक रूप से भिन्न होती हैं। सीबीएसई परीक्षाएं और बेरोजगारी मध्यम वर्ग और गरीबों के लिए अलग-अलग चिंताएं हैं और विरोध की भाषा भारत के सभी युवाओं से मेल नहीं खाती। लेकिन फिलहाल आइए युवाओं की इस शांतिपूर्ण अवज्ञा के इस दुर्लभ दृश्य का आनंद लें।