facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

अवसर व चुनौतियों से भरा हिंद-प्रशांत आर्थिक ढांचा

Last Updated- December 11, 2022 | 3:32 PM IST

अमेरिका के लॉस एंजलिस में बीते दिनों हिंद-प्रशांत आर्थिक ढांचे (आईपीईएफ) की पहली मंत्री-स्तरीय बैठक संपन्न हुई। इससे पहले जुलाई के अंत में सिंगापुर में वाणिज्य मंत्रियों के बीच मंत्रणा हुई थी, जिसमें भारत ने एक ‘पर्यवेक्षक’ के रूप में शिरकत की थी। हालांकि जुलाई में हुई उस बैठक के बाद कोई संयुक्त बयान जारी नहीं किया गया था, लेकिन यह माना गया कि सितंबर में होने वाली बैठक के बाद भागीदार देश इससे जुड़ी किसी विधिसम्मत व्यवस्था की आधिकारिक घोषणा करेंगे। बहरहाल, आईपीईएफ को लेकर भारत में जारी बयानबाजी के बीच उसके व्यापार स्तंभ में भारत की वार्ता रणनीति के विकास में कुछ प्रासंगिक पहलुओं पर प्रकाश डालना उपयोगी होगा। 

यहां यह उल्लेख करना महत्त्वपूर्ण होगा कि आईपीईएफ कोई व्यापार समझौता न होकर एक व्यापार स्तंभ है। ऐसे में इसे एशिया जैसे बड़े क्षेत्र में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) और व्यापक एवं प्रगतिशील अंतर-प्रशांत साझेदारी (सीपीटीपीपी) के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें भी और स्पष्ट रूप से कहा जाए तो सीपीटीपीपी अपने प्रावधानों और सदस्यता दोनों पैमानों पर चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की अमेरिका की एशिया केंद्रित रणनीति के मूल से जुड़ा आर्थिक उपकरण रहा। डब्ल्यूटीओ प्रावधानों को प्रवर्तित कर, विशेष रूप से सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों, बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) और निवेशक-राज्य विवाद निपटान जैसे पहलुओं के संदर्भ में एक नियम-आधारित व्यापार ढांचे की स्थापना के पीछे यही उद्देश्य था कि या तो चीन के लिए उसका पालन करना मुश्किल होगा या फिर दुश्वार घरेलू सुधारों के मोर्चे पर भारी कीमत चुकानी होगी। 

जहां तक सीपीटीपीपी की बात है तो यह टीपीपी का एक नरम प्रारूप है, विशेषकर निवेश और श्रम एवं पर्यावरणीय मानकों के संदर्भ में ऐसा ही दिखता है। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू आईपीआर से जुड़े प्रावधानों में व्यापक परिवर्तन का रहा, जिसने चीन के लिए इसकी सदस्यता लेना आसान बना दिया। चीन ने सितंबर 2021 में सीपीटीपीपी के लिए आवेदन किया। हालांकि, उसमें यह दलील दी गई कि कुछ सदस्य देशों (जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा) की चीन के साथ असहजता को देखते हुए चीन की वास्तविक सदस्यता में काफी समय लग सकता है। वहीं यह भी एक तथ्य है कि ऑस्ट्रेलिया और जापान दोनों ही एशिया के एक बड़े समझौते आरसेप का हिस्सा हैं, जिसमें चीन भी शामिल है और इस समझौते पर कोविड महामारी के बीच उस दौर में हस्ताक्षर हुए, जब चीन के खिलाफ भावनाओं में बहुत उबाल था। क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखला और व्यापार में अपनी केंद्रीय भूमिका को देखते हुए सीपीटीपीपी और आरसेप जैसे दोनों क्षेत्रीय समझौतों की सदस्यता क्षेत्र में व्यापार नियम तय करने के लिहाज से चीन के वर्चस्व को स्थापित करेगी। इस संदर्भ में अमेरिका द्वारा प्रवर्तित और चीन को बाहर रखने वाला आईपीईएफ अपना खासा महत्त्व रखता है। भारत आरसेप और सीपीटीपीपी जैसे दो बड़े व्यापार समझौतों से नहीं जुड़ा है तो उसके लिए आईपीईएफ से जुड़ाव लाभदायक हो सकता है। 

इसके जरिये भारत को पूर्वी एशिया के आठ सदस्य देशों (जिनमें से छह आसियान सदस्य अर्थव्यवस्थाएं हैं) और व्यापार संपर्क एवं लचीली आपूर्ति श्रृंखला पर केंद्रित चार में से दो स्तंभों का साथ मिलने से गतिशील-स्फूर्त पूर्वी एशियाई मूल्य वर्धन श्रृंखला हब से एकीकृत होने का अवसर मिलेगा। 

महामारी और यूक्रेन युद्ध के बाद बने वैश्विक परिदृश्य में दुनिया की जो दिग्गज कंपनियां अपने उत्पादन को चीन से बाहर पुनर्केंद्रित करने की ‘चाइना प्लस वन’ यानी चीन से इतर एक विकल्प वाली जिस रणनीति पर काम कर रही हैं, उसमें क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के ही मुफीद विकल्प के रूप में उभरने के आसार हैं। साथ ही ऐसे भी संकेत मिले हैं कि महामारी के बाद आर्थिक कायाकल्प की व्यापक योजनाओं में आसियान देश लचीली आपूर्ति श्रृंखला के लिए अपने क्षेत्र (और आरसेप से भी परे) से परे द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। ऐसे में आईपीईएफ का लचीला प्रारूप एक बड़ा अवसर हो सकता है। विशेषकर इसके व्यापार सहूलियत घटक (ट्रेड फैसिलिटेशन कंपोनेंट) को देखते हुए। इसमें गैर-प्रशुल्क बाधाओं का वह पेच सुलझ सकता है, जिसकी भारत आसियान के साथ अपने एफटीए के संदर्भ में लंबे समय से शिकायत करता आया है। 

यह अवसर अवश्य है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। आईपीईएफ में प्रशुल्क (टैरिफ) प्राथमिकताएं नहीं और इस प्रकार बाजार में पहुंच की गुंजाइश को लेकर प्रश्न उठता है। अमेरिका में घरेलू राजनीतिक बाधाएं प्रशुल्कों को शामिल न करने की वजह मानी गई हैं। इसके पीछे एक और कारण विनिर्माण क्षेत्र में वैश्विक औसत तरजीही देश प्रशुल्क का निम्न स्तर (शून्य से पांच प्रतिशत) भी हो सकता है, जिसे कई विकसित और विकासशील देशों की एकतरफा व्यापार उदारवाद नीतियों और तरजीही व्यापार समझौतों दोनों के माध्यम से हासिल किया गया। ऐसे में आईपीईएफ का ढांचा सुनियोजित रूप से डिजिटल व्यापार, व्यापार सहूलियत और श्रम एवं पर्यावरणीय मानकों के संदर्भ में सतत सामाजिक विकास पहलू जैसे कहीं अधिक आधुनिक प्रावधानों पर केंद्रित किया जाए। आईपीईएफ अमेरिकी पहल है और उसमें अमेरिका-मैक्सिको कनाडा समझौते (यूएसएमसीए) पर उसकी घोषित स्थिति की छाप दिखने की संभावना है। इसमें भविष्योन्मुखी श्रम मानकों का समावेश है, जिसमें मूल की नवाचार से ओतप्रोत परिभाषा के माध्यम से न्यूनतम पारिश्रमिक सुनिश्चित करने की व्यवस्था है। यह आईपीईएफ के लिए भी आदर्श आधार या कहें कि ढांचा बन सकता है। यूएसएमसीए में डिजिटल व्यापार और पर्यावरणीय मानकों को तो सीपीटीपीपी के प्रावधानों से भी अधिक सख्त माना जाता है। 

आईपीईएफ में व्यापार सहूलियत घटक एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपीईसी-एपेक) से लिए जा सकते हैं। भारत को छोड़कर आईपीईएफ के सभी सदस्य एपेक के भी सदस्य हैं। वियतनाम जैसे देश जो आरसेप, सीपीटीपीपी और एपेक के सदस्य हैं, उन्होंने अतीत में आवश्यक घरेलू सुधारों के मोर्चे पर संघर्ष की राह में अपनी एफटीए सदस्यता का ही उपयोग किया। वियतनाम के अधिकांश एफटीए एपेक सदस्य देशों के साथ हैं। दिलचस्प बात यही है कि डब्ल्यूटीओ++ से लेकर टीपीपी से अमेरिका के पीछे हटने के बाद सीपीटीपीपी जैसे ऊंचे मसलों पर सहमति एपेक, 2017 के उसी सम्मेलन में बनी, जब उसकी अध्यक्षता वियतनाम के पास थी। ऐसे में भारत को आरसेप और सीपीटीपीपी जैसे व्यापक क्षेत्रीय व्यापार समझौतों की सदस्यता लेने में अपनी शिथिलता के साथ ही एपेक जैसे क्षेत्रीय व्यापार मंच को लेकर अपनी हिचक तोड़ने की आवश्यकता है। 

इस समय यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते को लेकर भारत की वार्ता अग्रिम अवस्था में है और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत का व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए) बस निर्णायक पड़ाव पर है। ये रुझान इस संदर्भ में उम्मीदें जगाने वाले हैं। आधुनिक एफटीए विशेषकर श्रम एवं पर्यावरण-संबंधी प्रतिबद्धताओं के मामलों से जुड़ी व्यापार वार्ताओं में यूरोपीय संघ वैश्विक स्तर पर अग्रणी है। वहीं ऑस्ट्रेलिया एपेक का संस्थापक एवं प्रमुख सदस्य देश है। अपने नरम नियमनों और गैर-बाध्यकारी/स्वैच्छिक ढांचों के बावजूद सीमा-पार आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए नियामकीय सुगमता और व्यापार एवं निवेश सहूलियत में योगदान के लिए उसे स्वीकार्यता भी मिली है। इन पक्षों के साथ समय पर एफटीए को अंतिम रूप देने में भारत की क्षमताएं न केवल आवश्यक घरेलू नीतियों और प्रशुल्क सुधारों के लिए आधार तैयार करेंगी, बल्कि इससे वैश्विक स्तर पर भी आईपीईएफ में भारत की अपेक्षित भूमिका को लेकर उसकी क्षमताओं एवं तत्परता से जुड़ा उचित संदेश भी जाएगा। अगले माह यूरोपीय संघ के साथ भारत की एफटीए वार्ता होने की उम्मीद है। इस अवसर पर भारत को ऐसे संकेत-साक्ष्य देने चाहिए कि उसमें न केवल एफटीए के मोर्चे पर उड़ान भरने, बल्कि आवश्यक घरेलू नीति और प्रशुल्क सुधारों की भी इच्छाशक्ति है। 

(लेखिका एसआईएस, जेएनयू में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं। यहां व्यक्त विचार निजी हैं।)

First Published - September 15, 2022 | 9:45 PM IST

संबंधित पोस्ट