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पश्चिम बंगाल में उद्योग बनाम राजनीति

Last Updated- December 07, 2022 | 7:45 PM IST

मंगलवार को एक दूसरे से न जुड़ी दो घटनाओं ने पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण की त्रासदी और मखौल की याद दिला दी है।


इनमें से एक थी बाटा साम्राज्य के प्रमुख थॉमस जे बाटा का निधन, जो 93 वर्ष के थे और दूसरी एक ऐसी घटना थी जो उस दिन की सुर्खियां बनी- टाटा मोटर्स की यह घोषणा कि वह सिंगुर को छोड़ सकती है। इन दोनों ही संगठनों का बंगाल में जो अनुभव रहा है, वह उन राजनीतिक विरोधाभासों की झलक देता है जिसकी वजह से बंगाल में औद्योगीकरण एक जटिल विषय बन जाता है।

थॉमस बाटा का इस राज्य के साथ जुड़ाव कम समय के लिए रहा, पर वह समय काफी महत्त्वपूर्ण है। अपने पिता से जो फुटवेयर साम्राज्य उन्हें मिला, भारत में उसका परिचालन कोलकाता के बाहरी इलाके से किया जाता था। बाटानगर का विशाल और फैला हुआ परिसर उन दिनों औद्योगीकरण की भव्यता का उदाहरण हुआ करता था जब बाजार में प्रतियोगिता काफी सीमित थी।

कुछ उसी तरह जैसे डनलप का शाहगंज कारखाना या फिर उत्तरी बंगाल में दूआर्स का चाय साम्राज्य। वाम मोर्चे की बंगाल पर पकड़ बनने से पहले की बात है कि उस समय बाटानगर की नए साल की पार्टियां इतनी भव्य हुआ करती थीं कि वे मौज मस्ती का एक बढ़िया जरिया तो होती ही थीं, साथ ही इन पार्टियों की लंबे समय तक चर्चाएं भी चलती रहती थीं।

वहीं कारोबार का जिक्र करें तो नॉटी बॉयज लेस, स्नीकर्स, केड्स और पाथ फाइंडर स्कूली जूतों की बिक्री सबसे अधिक होती थी। बाटानगर का सामाजिक जीवन तब ढलान की ओर जाने लगा जब विदेशी मुद्रा नियंत्रण से विदेशी प्रबंधक दूर होने लगे। पर बाटानगर को इससे भी अधिक नुकसान तब उठाना पड़ा जब लघु आकार के क्षेत्रों में फुटवेयर उत्पादन को आरक्षण दिया जाने लगा।

इसके साथ भी वही समस्या आई जो बंबई की कपड़ा मिलों को हुई थी। छोटे आकार की कारोबारी इकाइयों को उत्पादन के लिए आउटसोर्सिंग पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा था और इस वजह से उन्हें आर्थिक फायदे नहीं मिल पा रहे थे। इसके साथ ही तेजी से उग रहे आक्रामक कारोबारी यूनियनों का विरोध भी इन्हें झेलना पड़ा।

इसके अलावा 1960 के दशक के आखिर से ही लगातार इन्हें नक्सलवादी गतिविधियों का उग्र रवैया झेलना पड़ा, जो मूल रूप से कोलकाता के ही रहने वाले हैं। उन्हें पता होगा कि बाटानगर पर हमेशा से ही श्रमिकों की वजह से खासी परेशानी होती रही है, कई दफा यहां के प्रबंधन को घेराव का सामना करना पड़ा था।

श्रमिकों में जो गुस्सा था, उसे बाटा के शो रूम में आसानी से देखा जा सकता था जहां सेल्स कर्मचारी यूनियन संगठनों से प्रभावित होकर इस अनिच्छा से खड़े रहते थे कि ग्राहकों का आकर्षण लगातार खत्म होता जा रहा था। इस व्यवहार की वजह से ही कई ग्राहक चीनी जूता उत्पादकों की ओर रुख करने लगे।

बाटा पर संकटों के इतने बादल मंडराते रहने के बावजूद वह खुद को प्रतियोगिता में बनाए रख सकी और प्रबंधन कंपनी में जोश भरने के लिए समय समय पर नई योजनाएं सुझाता रहा। इनमें युवाओं के लिए फुटवेयर उत्पाद और कपड़ों का ब्रांड नॉर्थ स्टार कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। पर 80 के दशक के आखिर में मजदूरों की ओर से समस्याएं काफी बढ़ गईं और इससे बाटा को खासा नुकसान भी हुआ।

यही वह समय है जब लोकप्रिय और मुनाफा कमाने वाले क्षेत्रीय ब्रांडों जैसे खादिम्स, श्रीलेदर्स और लिबर्टी ने सोच समझकर कदम उठाया और सस्ते दामों पर उत्पादों को आउटसोर्स करने लगे। जब तक वाम दलों को यह एहसास होता कि श्रमिक संगठनों से उन्हें कोई फायदा नहीं हो रहा बल्कि वे उनके लिए परेशानियां ही खड़ी कर रहे हैं तब तक बाटानगर के लिए हालात काफी बिगड़ चुके थे।

कंपनी अपना मुख्यालय बदलकर गुड़गांव ले आई (हालांकि उसने कोलकाता को अपना पंजीकृत कार्यालय बनाए रखा) और वहां उसे वैश्विक बाजार से नवीनतम फैशनों के आयात की छूट थी। अचल संपत्ति के विकास के लिए बाटानगर अपने आप में एक बड़ा उदाहरण है।

ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम दलों ने 90 के दशक के मध्य में एक कठोर सबक सीखा था जब एकॉर समूह को ग्रेट ईस्टर्न होटल की बिक्री की जा रही थी और कांग्रेस समर्थित मजदूर यूनियनों ने इसे रुकवा दिया था। यह घटनाक्रम बसु और मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी जो उस समय पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास सगंठन के अध्यक्ष थे, के लिए शर्मिंदगी से भरा था।

दोनों ही ने यूरोप और अमेरिका में रोड शो का आयोजन कर निवेशकों को यह भरोसा दिलाया था कि मजदूर संगठनों पर उनका पूरा नियंत्रण है। जैसा कि ग्रेट ईस्टर्न घटनाक्रम से साफ पता चलता है कि बसु का ध्यान इस ओर नहीं गया था कि मार्क्सवादी पार्टियों के नियंत्रण वाली सीटू और एटू से क्रांतिकारी सदस्यों को कांग्रेस के नियंत्रण वाली इंटक में भेजा जा चुका है। और अब जरा ममता बनर्जी के बारे में बात करते हैं।

याद होगा कि मूल रूप वह कांग्रेस की ही कार्यकर्ता रही हैं। वह अपनी विरोधकारी नीतियों की बदौलत ही चर्चा में आई हैं। याद होगा कि अपनी पार्टी के लोगों पर पुलिस के आक्रमण को उन्होंने सुर्खियों में रहने के लिए खासतौर पर भुनाया था। पर उन्हें जो लोकप्रियता मिली है वह मूल रूप से वाम दलों के क्रांतिकारी एजेंडे को हथिया कर ही मिली है।

‘लोगों के लिए और लोगों के द्वारा’ अब उनका प्रमुख हथियार बन गया है। अगर बड़े परिदृश्य में देखें तो सिंगुर में वह जिस बात को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं वह पूरी तरह से तर्कहीन है। एक ऐसा राज्य जहां पहले से ही औद्योगीकरण का टोटा पड़ा हुआ है, वहां इस तरीके का विरोध कभी सही नहीं हो सकता।

जाहिर है कि जब राज्य में औद्योगीकरण का अकाल होगा तो वहां शिक्षित युवाओं को बेरोजगारी की समस्या तो झेलनी ही पड़ेगी। ऐसा माना जा रहा था कि बाटानगर को जिन प्रतिकूल वातावरण का सामना करना पड़ा था, टाटा मोटर्स की नैनो फैक्टरी उस जख्म पर कुछ मरहम लगाएगी। पर ममता बनर्जी ने दिखा दिया है कि वाम दल उन्हीं विरोधी नीतियों की कीमत चुका रहा है जिसकी शुरुआत उसने 31 साल पहले की थी।

First Published - September 3, 2008 | 11:08 PM IST

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