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खतरे की घंटी बनी महंगाई

Last Updated- December 07, 2022 | 12:04 AM IST

महंगाई की रफ्तार बढ़ती ही जा रही है। तीन मई को खत्म हफ्ते में थोक मूल्य सूचकांक पिछले साल के इसी हफ्ते के मुकाबले काफी ऊपर चढ़कर 7.83 फीसद के आंकड़े पर पहुंच गया।


इसके बाद सरकार के इन दावों पर सवाल उठने लाजिमी हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में महंगाई पर लगाम कसने के उपाय कारगर साबित होने लगे हैं। इससे पिछले हफ्ते में यही आंकड़ा 7.61 फीसद था। इसके ऊपर चढ़ने की एक वजह 5 मई 2007 को खत्म हफ्ते की महंगाई दर भी थी, जो काफी घट गई थी।

बहरहाल यह आंकडा खतरे की घंटी है और सरकार पर इससे दबाव बढना तय है। विपक्ष की ओर से भी और अपने ही खेमे यानी सहयोगी पाटियों की तरफ से भी। उम्मीद इसी बात की है कि सरकार इस दबाव से निपटने के लिए अल्पकालिक उपाय करेगी, जो आगे जाकर मुश्किल पैदा कर सकते हैं। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि थोक मूल्य सूचकांक की यह ऊंची दर उस तस्वीर से बिल्कुल जुदा है, जो इसके घटक दिखा रहे हैं।

मसलन खाद्य की कीमतों को ही लिया जाए, जिन्हें इस मुल्क में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की बडी वजह माना जा रहा है, उनमें पिछले कुछ हफ्तों से लगातार गिरावट आ रही है। चाय और कॉफी की कीमतें जरूर उछल रही हैं, लेकिन खाद्यान्नों और खाद्य तेलों के दाम काबू में दिख रहे हैं। हाल में महंगाई की उड़ान की बडी वजहों में शुमार धातु खनिजों और धातु उत्पादों के दाम भी नीचे आने के आसार दिख  रहे हैं।

यह बात दीगर है कि पिछले साल के मुकाबले उनकी कीमत में इजाफे की दर अब भी खासी ज्यादा है। पेट्रोलियम पदार्र्थों के दाम शायद ही हैरानी का सबब हों क्योंकि हालिया हफ्तों में उनके दाम बेहद तेजी से छलांग लगा रहे हैं और काबू में भी नहीं आ रहे। खास तौर पर नैफ्था, फर्नेस ऑयल और कुछ हद तक हल्के डीजल ऑयल के दाम पेशानी पर बल डालने वाले हैं।

इससे जाहिर है कि दूसरे कई मुल्कों की तरह यहां भी सरकार पेट्रोलियम पदार्थों के दाम पर लगाम लगाकर मुद्रास्फीति की दर को काबू करने की कोशिश कर रही है और नतीजतन वित्तीय घाटा और बढ़ रहा है। थोक मूल्य सूचकांक पर सबकी नजर है और उसकी चाल पर कुछ जिंसों का भी साफ असर पड रहा है। साथ ही यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या सूचकांक यह पता लगा पा रहा है कि मुश्किल कितनी बडी है।

सूचकांक में हाल के दिनों में इजाफा दर्ज कराने वाले खनिज समेत कुछ बेहद अहम जिंसों के लिए आंकड़े इकट्ठा करने की प्रणाली नाकाफी है और इस पर चिंता भी जताई जा रही है। कई अहम जिंसों की कीमतों का उतार-चढ़ाव लंबे अरसे तक दर्ज ही नहीं कराया जाता, जाहिर है, उनकी कीमत भी काफी समय तक स्थिर ही दिखती रहती है और सूचकांक पर उसका असर पड़ता है।

बाजार की चाल को ज्यादा सटीक तरीके से मापने पर सही कीमतों के मुताबिक काम किया जा सकेगा। इससे सूचकांक को तेज उछाल से बचाया जा सकेगा और नीति नियंताओं को भी महंगाई की चाल के बारे में पहले से ही अंदाजा हो जाएगा।

First Published - May 19, 2008 | 3:22 AM IST

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