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महंगाई को नए सूचकांक की जरूरत

Last Updated- December 07, 2022 | 5:41 PM IST

पिछले हफ्ते जारी हुए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक महंगाई का ग्राफ 12.44 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच चुका है।


ये ऐसे आंकड़े हैं, जिनकी कई लोगों के मुताबिक सच्चाई इसे मापने में इस्तेमाल होने वाले गलत तरीकों पर निर्भर करती है। ये बड़े अहम सवाल हैं कि क्या ये आंकड़े सही तरीके से जुटाए जाते हैं?

क्या इनका विश्लेषण कर उनसे एक ऐसा सूचकांक बनाने के लिए बेहतरीन विश्लेषकों का सहारा लिया जाता है, जो बाजार के खिलाड़ियों और नीति-निर्धारकों के कदमों को तय करता है। महंगाई के बढ़ते ही जाने से इस बात को बल मिल रहा है कि थोक मूल्य सूचकांक को बनाने में कहीं न कहीं खामी जरूर है। इसी वजह से तो असल तस्वीर लोगों के सामने आ नहीं पा रही है।

यह असल तस्वीर या आंकड़े सूचकांक के आंकड़े से ऊपर और नीचे, दोनों हो सकते हैं। खाद्यान्न की कीमतों में पिछले कुछ दिनों के भीतर काफी चढ़ाव आया है, लेकिन इसका असल प्रभाव सूचकांक में काफी देर के बाद नजर आया। इसी वजह से तो इस सूचकांक में इतना जबरदस्त उछाल आया है।

सूचकांक का असल मकसद तो बाजार की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव को सही तरीके से दिखाना का होता है, लेकिन आज के सूचकांक में ऐसा कहां होता है। दूसरी भी कई दिक्कतें हैं इसके साथ। मुद्दे की बात यह है कि अगर थोक मूल्य सूचकांक असल कीमतों को दिखाने में नाकामयाब हो रहा है, तो इसे दूसरे बेहतर सूचकांक से बदलने की जरूरत है।

कुछ साल पहले सरकार ने थोक मूल्य सूचकांक की जगह उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) को लाने की कोशिश की थी, जिसके महंगाई का स्तर मापने के मामले में कई फायदे थे। इस बारे में सबसे अच्छा तरीका तो जीडीपी के आधार पर महंगाई को मापना का है। इसमें जीडीपी को स्थायी मूल्य से चालू मूल्य में बदल दिया जाता है।

इसमें जीडीपी के आधार पर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को मापा जाता है, इसलिए पूरे अर्थव्यवस्था में कीमतों में आए उतार-चढ़ाव को मापता है। बदकिस्मती से इस तरीके से महंगाई मापने में समय बहुत ज्यादा लग जाता है। वहीं पीपीआई की मदद से थोक मूल्य सूचकांक के तेज उतार चढ़ाव और अवधि के बीच संतुलन बिठाया जा सकता है।

इसमें जीडीपी के आधार पर भी कुछ सेवाओं और वस्तुओं की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव को मापा जा सकता है। चूंकि यह बाजार पर निर्भर नहीं होता है, इसलिए इसमें कई सेवाओं और वस्तुओं को भी शामिल किया जा सकता है, जिनका सौदा थोक बाजार में नहीं होता। इसमें कीमतों के बारे जानकारी सीधे उत्पादक और सेवा प्रदाताओं से मिलती है।

भारत जैसे मुल्क में जहां सेवाएं अर्थव्यवस्था में इतना बड़ा स्थान रखती हैं, इस तरीके से काफी फायदा मिलता। बदकिस्मती से इस बारे में कोशिशें रंग नहीं ला पाईं। जीडीपी के आकलन के लिए तो बेस इयर को बदलकर 1999-2000 कर दिया गया है, लेकिन थोक मूल्य सूचकांक और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के लिए आज भी 1993-94 को बतौर बेस इयर इस्तेमाल किया जाता है।

तब से लेकर आज तक भारतीय अर्थव्यवस्था काफी हद तक बदल चुकी है, लेकिन आज भी बतौर बेस इयर मुल्क के दो बेहद अहम सूचकांक में उसी साल का इस्तेमाल किया जाता है। नीति-निर्धारकों को अच्छे आंकड़ों की जरूरत है। इसलिए इस मुद्दे में बदलाव की जरूरत है।

First Published - August 19, 2008 | 12:51 AM IST

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