facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

मुनाफे की चाभी है इंटरनेट टेलीफोनी

Last Updated- December 07, 2022 | 5:44 PM IST

अगर भारत सरकार ट्राई की सिफारिशों को मानकर इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को फोन सेवा मुहैया करवाने की इजाजत दे देती है, तो यह कोई जल्दबाजी में उठाया गया कदम नहीं होगा।


विश्लेषकों की मानें तो अमेरिका में 2010 तक कुल फोन उपभोक्ताओं में से 16 फीसदी के पास इंटरनेट टेलीफोनी की सुविधा मौजूद होगी। ऐसे में इस बात का कोई तुक नहीं है कि भारत एक ऐसी क्रांति से अछूता रहे, जिसकी वजह से लंबी दूरी के कॉलों की कीमत आज के न्यूनतम स्तर से भी काफी नीचे पहुंच सकती है।

ट्राई के मुताबिक इससे भी अहम बात यह है कि बेरोकटोक इंटरनेट टेलीफोनी की सुविधा तो टेलीकॉम कंपनियों को यूनिफाइड एक्सेस सर्विस (यूएएस) लाइसेंस के तहत 2006 में ही दे दी गई थी। लेकिन इसके बावजूद भी यह तरीका कंपनियों को नहीं भाया। उन्होंने इस सस्ते तरीके के मुकाबले फायदेमंद, पर महंगी पुरानी तकनीक को ही चुना।

ट्राई के इस सुझाव की वजह से तो हंगामा ही मच गया है। सेल्लुयर ऑपरेट्र्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने पूछा है कि क्या मुल्क में सचमुच सभी को समान मौके दिए जा रहे हैं? यह सवाल पांच साल पहले  रिलायंस के डब्ल्यूएलएल मामले में भी उठा था। यह साफ है तब कारोबार के समान मौके नहीं मुहैया करवाए गए थे और न ही आज मुहैया करवाए जा रहे हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों ने एक रुपये भी इंट्री फीस नहीं चुकाई है, लेकिन हरेक टेलीकॉम कंपनियों को यूएएस लाइसेंस की खातिर 1,651 करोड़ रुपये चुकाए हैं। लेकिन इस बार हकीकत थोड़ी जुदा सी है। पहली बात तो यह है कि यूएएस लाइसेंस की असल जान तो उसमें शामिल मोबाइल फोन सेवाएं हैं। किसी भी कंपनी को मोबाइल फोन सेवा देने के लिए यूएएस लाइसेंस की लेना पड़ेगा।

आज की तारीख में फिक्सड लाइन फोन उपभोक्ताओं की तादाद केवल 3.9 करोड़ है, जबकि मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की तादाद 28.6 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुकी है। दूसरी तरफ, जहां एक ओर फिक्सड फोन उपभोक्ताओं की तादाद तेजी से कम हो रही है, तो वहीं मोबाइल फोन की दुनिया से हर महीने 80 लाख नए लोग जुड़ रहे हैं।

दूसरे शब्दों में, इस लाइसेंस की असल जान तो इसके साथ मिलने वाला स्पेक्ट्रम है। इसी वजह से तो कुछ ऐसे नए मोबाइल फोन लाइसेंस की खातिर भी सरकार मोटी रकम मांग रही है, जिन्हें लेने के लिए कोई कंपनी तैयार नहीं है। अगर सरकार ट्राई की सिफारिशों को मान लेती भी है, तो इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां बहुत बड़े स्तर पर इंटरनेट टेलीफोनी को ऑफर कर सकेंगी, लेकिन उन्हें कोई स्पेक्ट्रम नहीं मिलेगा।

ऊपर से 40 लाख ब्रॉडबैंड यूजर्स वाले इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को यूएएस लाइसेंसों से लैस 32.5 करोड़ ग्राहकों वाली कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती पेश करने में लंबा वक्त लग जाएगा। यूएएस लाइसेंसशुदा कंपनियों और इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों के बीच यही इकलौता अंतर नहीं है।

इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां अपना नेटवर्क नहीं लगा सकतीं, उन्हें तो मौजूदा कंपनियों के नेटवर्क का ही इस्तेमाल करना पड़ेगा। साथ ही, कंप्यूटर के जरिये किसी मोबाइल या फिक्सड फोन पर कॉल करने के लिए उन्हें मौजूदा टेलीकॉम कंपनियों के साथ इंटरकनेक्ट समझौते भी करने ही पड़ेंगे।

First Published - August 20, 2008 | 12:13 AM IST

संबंधित पोस्ट