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कहीं भारी न पड़ जाए आईपीएल का बुलबुला

Last Updated- December 11, 2022 | 6:10 PM IST

गत सप्ताह इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के प्रसारण अधिकारों की बहुप्रतीक्षित नीलामी हुई। उसमें डिज्नी-स्टार ने जहां टीवी अधिकार हासिल किए, वहीं वायकॉम-18 की झोली में डिजिटल अधिकार आए। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को मीडिया अधिकारों की इस बिक्री के जरिये 48,000 करोड़ रुपये (तकरीबन 6.2 अरब डॉलर) की कमाई हुई। यह राशि वर्ष 2017 में मिली रकम से तिगुनी अधिक है। अब इसकी खूब वाहवाही हो रही है कि कैसे प्रति मैच के आधार पर आईपीएल अमेरिकन नैशनल फुटबॉल लीग (एनएफएल) के बाद दुनिया का दूसरा सबसे मूल्यवान खेल आयोजन बन गया है। आर्थिक पैमाने पर एनएफएल दुनिया की सबसे बेशकीमती खेल स्पर्धा है।
यह असल में जश्न मनाने का नहीं, बल्कि चिंता का विषय है। एनएफएल का आयोजन उस बाजार में होता है, जिसके राजस्व का आकार 700 अरब डॉलर से अधिक का है, जो भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग से करीब-करीब 36 गुना अधिक है। उस बाजार का सांचा-ढांचा, मुद्रा और क्रय शक्ति कहीं ऊंची है। आज एक डॉलर की हैसियत करीब 78 रुपये है। यदि आईपीएल अमेरिकी एनएफएल के बाद दूसरे पायदान पर है तो भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग भी राजस्व आकार एवं मुनाफे के पैमाने पर अमेरिकी बाजार के करीब होना चाहिए। ऐसा कतई नहीं है।  
यही कारण है कि आईपीएल की आर्थिकी का कोई तुक नहीं। पिछले आईपीएल की बात करें, जिसके लिए डिज्नी ने टीवी और डिजिटल अधिकारों के लिए 16,000 करोड़ रुपये अदा किए, उसमें यदि निर्माण, वितरण एवं विपणन लागतों को जोड़ लिया जाए तो प्रसारक ने बहुत मामूली सा मुनाफा अर्जित किया। यदि सभी लागत को जोड़ लिया जाए तो इस बार यह लागत बढ़कर 55,000 करोड़ रुपये (सात अरब डॉलर) या उससे अधिक का आंकड़ा पार कर सकती है। भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार में भारी हिस्सेदारी रखने वाले टीवी, फिल्म और ओटीटी का सब​स्क्रिप्शन एवं विज्ञापन राजस्व ही 22 अरब डॉलर से अधिक है।
आप यह तर्क दे सकते हैं कि अधिकार अलग-अलग फर्म को पांच वर्षों की अवधि के लिए दिए गए हैं तो उससे दांव भी ऊंचा लगेगा। ऐसा नहीं होगा। मीडिया पार्टनर्स एशिया के कार्यकारी निदेशक एवं सह-संस्थापक विवेक कूटो इसे समझाते हैं, ‘पिछले पांच वर्षों का समग्र आकलन करें तो आईपीएल की 70 प्रतिशत झोली टीवी और करीब 30 प्रतिशत डिजिटल से भरी। आईपीएल के टीवी अधिकारों के माध्यम से डिज्नी को मूल्यवान विज्ञापनदाताओं का साथ मिला रहेगा, लेकिन पहली बार इन विज्ञापनों की वैल्यू दबाव में होगी। अमूमन ये विज्ञापन टीवी और डिजिटल पैकेज के बंडल (साथ में) में बेचे जाते हैं। अब यह दो सेल्स टीमों-डिज्नी एवं वायकॉम18-के बीच बंट जाएंगे, जिनके लिए बाजार में तगड़ी प्रतिस्पर्धा होगी।’
यह भी उल्लेखनीय है कि देश में टीवी की पहुंच करीब 90 करोड़ भारतीयों तक है, जो देश में सबसे बड़ा वीडियो फॉर्मेट भी है। वहीं 46 करोड़ की पहुंच के साथ डिजिटल इस मामले में दूसरे पायदान पर आता है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा टेलीविजन बाजार में मूल्य नियंत्रण के चलते पिछले दो वर्षों से टीवी में ग्राहक राजस्व बहुत दबाव में है। वहीं डिजिटल में सब​स्क्रिप्शन राजस्व 5,000 करोड़ रुपये से अधिक है। इसका बहुत बड़ा हिस्सा ओटीटी का है, जो मौलिक सामग्री (ओरिजिनल कंटेंट) पर बड़ी राशि खर्च करता है। कूटो कहते हैं, ‘भारत में स्ट्रीमिंग बहुत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन कम एआरपीयू (प्रति ग्राहक औसत राजस्व) निवेशकों को परेशान कर रहा है। इसके बावजूद नियंत्रित चीन के बाद यही आकार के लिहाज से आज दुनिया में सबसे बड़े अवसर एवं संभावनाओं का बाजार है।’ वह अपनी बात को विस्तार देकर कहते हैं, ‘आईपीएल को बढ़िया से भुनाने के लिए आदर्श स्थिति यही होती कि टीवी-डिजिटल अधिकार एक ही पक्ष के पास होते, परंतु लागत मुद्रास्फीति को देखते हुए ऐसी रणनीति से बचना पड़ा। आज आप भारत में वीडियो को केवल पारंपरिक टीवी के भरोसे ही परिभाषित नहीं कर सकते। डिजिटल स्ट्रीमिंग वीडियो की वृद्धि पहले से ही बहुत तेज है और भविष्य में उसकी अहम हिस्सेदारी रहेगी।’
कूटो का रुख सही है। चाहे समाचार हो, मनोरंजन या खेल, दोनों प्रारूपों की जुगलबंदी ही जोरदार रहती है। उदाहरण के रूप में सोनी लिव को ही लें, जो देश में भुगतान-आधारित दूसरा सबसे बड़ा ओटीटी है। जहां मौलिक सामग्री और फिल्में ओटीटी का सब​स्क्रिप्शन बढ़ाती हैं, लेकिन उनके करीब 40 प्रतिशत दर्शक टीवी से जुड़े होते हैं। पिछली बार डिज्नी ने टीवी और डिजिटल दोनों अधिकार अपने नाम किए थे। इन दोनों श्रेणियों को अलग कर दिया जाए तो इस सौदे का कोई अर्थ नहीं रह जाता। कुल मिलाकर आईपीएल की कीमत बहुत ज्यादा हो गई है। जहां कंटेंट की लागत आसमान छू रही है, वहीं विज्ञापन एवं सब​स्क्रिप्शन राजस्व में उस अनुपात में तेजी नहीं आ रही। वर्ष 2021 के अंत के रुझान ने यही दर्शाया कि राजस्व के मामले में भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग 2018 के स्तर पर पहुंच गया। फिक्की-ईवाई के अनुसार समूचा क्षेत्र 13 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से आगे बढ़ेगा। दूसरी ओर ओटीटी, फिल्म और टीवी में कंटेंट तैयार करने की लागत 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है। तब आखिर राजस्व आएगा कहां से?
इस परिप्रेक्ष्य में अमेरिकी मनोरंजन व्यवसाय के नए अगुआ नेटफ्लिक्स पर नजर डालें। उसने 2017 में स्ट्रीमिंग आरंभ की। वर्ष 2013 में उसने मौलिक सामग्री 8 से 12 डॉलर प्रतिमाह की दर पर पेश करना शुरू किया। इसने बाजार में हलचल मचा दी और वैश्विक मीडिया इकोसिस्टम का खाका नए सिरे से खिंचा। जल्द ही उसने अपनी सामग्री की रफ्तार बढ़ा दी। मीडिया और उससे बाहर की तमाम कंपनियां-ऐपल, डिज्नी, मेटा, पैरामाउंट और गूगल आदि भी इस खेल में उतर गईं। इससे उपभोक्ताओं की तो चांदी हो गई, लेकिन यह कारोबार के लिए बुरा साबित हुआ, क्योंकि उसकी लागत लगातार बढ़ती गई। वर्ष 2021 में ऑस्कर के लिए 27 नामांकन और ‘मनी हाईस्ट’ एवं ‘स्क्विड गेम’ जैसे कीर्तिमान कायम करने वाले कार्यक्रमों के बावजूद 2022 की पहली छमाही में नेटफ्लिक्स ने 2,00,000 सबस्क्राइबर गंवा दिए। वर्ष 2019 में उसका जो बाजार पूंजीकरण 142 अरब डॉलर था वह गत सप्ताह घटकर 80 अरब डॉलर के करीब रह गया।
भले ही दर्शकों की संख्या और वृद्धि की संभावनाओं के लिहाज से भारत एक आकर्षक मीडिया बाजार हो, लेकिन प्रति ग्राहक वैल्यू और कमाई के पैमाने पर यह हमेशा निवेशकों को निराश करता आया है। ऐसे में चाहे फिल्म हो, मौलिक शो हों या खेल स्पर्धाएं, उनकी आसमान छूती कीमतें जश्न का नहीं, बल्कि चिंता का विषय होनी चाहिए। ऐसे में जो कंपनियां आईपीएल के मीडिया अधिकारों को हासिल करने से वंचित रह गईं, वे आने वाले वर्षों में कहीं ज्यादा लाभ अर्जित करेंगी।

First Published - June 20, 2022 | 12:56 AM IST

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