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बढ़ती कीमतों का है पूरा जोर, क्या भारतीय अर्थव्यवस्था भी बढ़ रही है मंदी और महंगाई की ओर

Last Updated- December 07, 2022 | 10:04 AM IST

गलत नीतियों ने निकाला तेल
 अरुण कुमार, प्रोफेसर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय


एक तरफ महंगाई है और दूसरी ओर वृद्धि और विकास दर है। अभी जिस तरह की वृद्धि हो रही है उसे स्टैगफ्लेशन की स्थिति नहीं कह सकते हैं।

स्टैगफ्लेशन वह स्थिति है जिसमें  वृद्धि बिल्कुल नहीं होती है और मुद्रास्फीति बढ़ती है। वृद्धि दर के बारे में सरकार तो कह रही है कि यह दर 7.5 से 8 फीसदी तक बनी रहेगी। यह दर भी कोई कम नहीं है। वर्ष 1991 के बाद अर्थव्यवस्था बिजनेस के चक्र की तरह चल रही है। कभी इसकी गति तेज हो जाती है और कभी धीमी पड़ जाती है। यह पूंजीवादी व्यवस्था का सामान्य रूप होता है।

1991 से 96 तक करीब 10 प्रतिशत मुद्रास्फीति की औसत वृद्धि दर थी। 1991 में जब नई आर्थिक नीति लागू की गई उस वक्त अगस्त में महंगाई की दर 16.5 प्रतिशत तक हो गई थी। महंगाई के बढ़ने क ीभी कई वजहें हैं। आज मुख्य मुद्दा यह है कि सरकार 6 महीने पहले तक अर्थव्यवस्था की चमक की दाद दे रही थी। इसके अलावा अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 9 प्रतिशत तक हो जाएगी और 11वीं योजना के दौरान यह 10 प्रतिशत तक हो जाएगी।

ऐसा क्या हुआ कि जनवरी में इस तरह की बात की जाती है और मार्च आते ही अर्थव्यवस्था की चमक धूमिल पड़ने लगी। ऐसा लगा की महंगाई की दर बढ़ने लगी है और अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर कम हो गई और एक तरह से संकट जैसी स्थिति पैदा हो गई। ऐसी स्थिति में क्यों आ गई यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। सरकार को सारी चीजें मालूम थी कि अर्थव्यवस्था में मंदी आ रही थी, महंगाई की दर बढ़ रही थी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ रहे थे और खाद्य उत्पादों के दाम में बढ़ोतरी हो रही थी।

सरकार ने इन चीजों को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने अपनी आर्थिक समीक्षा में भी इन चीजों का जिक्र नहीं किया और न ही बजट के दौरान इस बात पर कोई चर्चा की गई। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में भी कोई बात नहीं आई। सरकार को इसके लिए जो कदम उठाने चाहिए थे वह नहीं उठाया गया। दुनिया के बाजार में यह बात फैला दी गई थी कि भारत और चीन की अर्थव्यवस्था में इतनी वृद्धि होगी कि अमेरिका जैसे देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट के बावजूद दुनिया उस मंदी को झेल लेगी। लेकिन भारत और चीन की अर्थव्यवस्था भी अमेरिका की तर्ज पर मंदी की ओर बढ़ने लगी।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था का हिस्सा पुरी दुनिया में 22 प्रतिशत के करीब है जबकि भारत की अर्थव्यवस्था का हिस्सा तो महज 1.5 है जबकि चीन का 3 प्रतिशत है। इसलिए जब तक भारत और चीन की वृद्धि दर 5 प्रतिशत तक नहीं बढ़ता तब तक ये अमेरिका के 1 प्रतिशत मंदी की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकते। भारत में पिछले 6 सालों में जो वृद्धि दर बढ़ी है उसकी वजह यह है कि निवेश बढ़ा है। वर्ष 2000-02 में निवेश 25 प्रतिशत था जो अब बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई है। भारत में एक बड़ी खाई बन गई।

यहां के कॉरपोरेट सेक्टर की आमदनी में बेतहाशा इजाफा हुआ है। आम लोगों की आमदनी पर कोई फर्क नहीं बढ़ा। इस खाई के बनने से बचत दर और निवेश दर बढ़ा है। जब भी कोई बाधा आती है तो बचत दर,निवेश दर भी कम होगा और उसके साथ मंदी आ जाएगा है और बिजनेस साइकिल में यही होता है। सरकार का कहना है कि निवेश दर बढ़ रहा है और अर्थव्यवस्था में मंदी आ रही है तो उसका असर मंदी पर और भी ज्यादा पड़ेगा। मतलब यह कि ऐसी स्थिति में निवेश बढ़ने से मंदी बढ़ेगी।

इसकी वजह यह है कि मांग जितनी बढ़नी चाहिए उम्मीदों के मुताबिक उतनी नहीं बढ़ रही है और निवेश बढ़ रहा है। आप मशीन और प्लांट तो लगा रहे हैं और सामानों का उत्पादन कर रहे हैं लेकिन मांग उतनी नहीं है अर्थव्यवस्था में। ऐसे में निवेश का भी कोई फायदा नहीं होगा और अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ेगी।
(बातचीत : शिखा शालिनी)

मुश्किलों में एक हम ही नहीं तन्हा
धर्मकीर्ति जोशी, प्रमुख अर्थशास्त्री, क्रिसिल

भारत में महंगाई, विकास दर को प्रभावित कर रही है। लेकिन यहां हालात दूसरे मुल्कों की तुलना में कम खराब हैं। इस समय पूरी दुनिया में महंगाई की आग लगी हुई है। चाहे अपने पड़ोसी देशों की बात करें या फिर दुनिया के संपन्न देशों की, सभी जगहों पर महंगाई का बोलबाला है।

दुनिया भर में आवश्यक जिंसों की कीमतों में बहुत तेजी से इजाफा हुआ है। इसकी वजह से पूरी दुनिया में विकास की रफ्तार मंद पड़ गई है। और आने वाले कुछ दिनों में महंगाई की रफ्तार के थमने के आसार बिलकुल भी नजर नहीं आते। जहां तक भारत की बात है तो यहां भी ‘मंदी और महंगाई’ की स्थिति देखी जा सकती है। इसकी भी सीधी सी वजह है। महंगाई को काबू में करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने कर्ज की ब्याज दर बढ़ा दी है जिससे उद्योग जगत परेशान है।

जाहिर सी बात है जब उन्हें कर्ज के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ेंगे तो उनका विकास प्रभावित तो होगा ही। बात चाहे क्षमता विस्तार की हो या फिर दूसरी कंपनियों के अधिग्रहण की, महंगा कर्ज तो इस रास्ते में पड़ने वाली किसी बड़ी बाधा से कम नहीं है। इसकी मार से कंपनियां नौकरियों में कटौती कर रही हैं जिससे नौकरी पाए लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। दूसरी ओर इस स्थिति की कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है कि महंगाई दर के बढ़ने के साथ-साथ विकास दर भी बढ़ती जाए। वैसे इसमें रिजर्व बैंक और सरकार की भी अपनी मजबूरियां हैं।

और न चाहते हुए भी रिजर्व बैंक को हाल में कई बार कड़े कदम उठाने पड़े हैं जिससे उद्योग जगत का गणित बहुत गड़बड़ा गया है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने से कई चीजों की आपूर्ति प्रभावित हुई है जिसके चलते कई जिंसों की कीमतों में बहुत तेजी आई है। महंगाई केवल भारत की ही समस्या नहीं है बल्कि इस समय यह वैश्विक समस्या बन चुकी है।  दुनिया भर में खाद्यान्न, स्टील, सीमेंट समेत कई आवश्यक जिंसों की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। सभी जानते हैं कि महंगाई जिन वजहों से सबसे ज्यादा बढ़ रही है उनमें कच्चा तेल सबसे प्रमुख है।

अब जब तेल के दाम बढ़ेंगे तो ट्रांसपोर्ट पर आने वाली लागत का बढ़ना लाजिमी है। नतीजतन ज्यादातर आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में इजाफा होना तय है। आयात पर निर्भरता के चलते कच्चे तेल की कीमतों पर भारत का कोई जोर नहीं है । इसके अलावा भारत अपनी जरूरत का 50 फीसदी खाद्य तेल भी आयात ही करता है। यह तो गनीमत ही है कि इस साल खाद्यान्न उत्पादन अच्छा हुआ है, नहीं तो हालात और भी बदतर हो सकते थे।

दूसरे कई देशों के मुकाबले भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बहुत कम बढ़ोतरी की गई है और यदि इनकी कीमतों में और इजाफा किया गया होता तो महंगाई और ज्यादा बढ़ सकती थी। मुझे उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ कमी आएगी जिसके बाद महंगाई दर भी थोड़ा सुस्त पड़ेगी।

इस पूरे साल में तो महंगाई दर दो अंकों में ही बनी रहेगी। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा और मानसून मन मुताबिक रहा तो अगले साल मार्च तक यह घटकर 7 फीसदी तक पहुंच सकती है। और उसके बाद विकास की गाड़ी फिर से रफ्तार पकड़ने लगेगी। वहीं कुछ लोगों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतें जल्द ही 160 से 180 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी। तब यही होगा कि सारी कवायदें ध्वस्त हो जाएंगी और चीजों को पटरी पर लाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
(बातचीत : प्रणव सिरोही)

First Published - July 9, 2008 | 11:35 PM IST

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