क्या आपने कभी किसी ऐसी जड़ी-बूटी के बारे में सुना है, जिसे खाने से गर्भवती महिला केवल बेटे को ही जन्म देती है?
हो सकता है, ऐसी जड़ी-बूटियां होंगी या नहीं भी होंगी। लेकिन किसी न किसी रूप में इन जड़ी-बूटियों की तलाश हमेशा चलती रहती है। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के एक गांव की एक महिला ने हमेशा बेटों को जन्म देने का राज मुझे बताया था।
उसके मुताबिक जड़ी-बूटियों के बारे में काफी जानकारी रखने वाले उसके ससुर ने ऐसा काढ़ा बनाया था, जिसे पीने से केवल बेटे ही पैदा होते हैं। वह और उसकी ननद, दोनों ने उस काढ़े को पिया था और दोनों ने बेटों को जन्म दिया।
बेटा पैदा करने की लालसा आज की तारीख में मुल्क के हर सूबे की आबादी के लैंगिक अनुपात को दीमक की तरह चाट रही है। बेटे की गारंटी देने वाली हिन्दुस्तानी जड़ी-बूटियों की चर्चा तो लेबनानी लेखक अमीन मॉलाफ ने कुछ समय पहले अपने साइंस फिक्शन नॉवेल ‘द सेंचुरी आफ्टर बीटराइस’ में भी की थी।
यह किताब भविष्य की एक महिला पत्रकार की भारत और अफ्रीका में पाए जाने वाले एक खास बूटी की खोज की दास्तां है, जिसे खाने से बेटा ही होता है। इसी खोज में वह गुजरात के एक ऐसे गांव में पहुंचती है, जहां बेटियां नहीं पैदा होतीं। साथ ही, उसका सामना होता एक ऐसे दवा उद्योग से जो इस दवा को संतानोत्पत्ति की क्षमता बढ़ाने वाली दवा के नाम पर बेचती है।
सच में, फिक्शन की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन उस नॉवेल में सबसे बड़ा सवाल अपनी गर्भवती बेटी, बीटराइस से पूछती है कि, ‘क्या यह युग धरती पर पैदा होने के लिए सही है?’ दरअसल, उसकी बेटी की भी यही इच्छा होती है कि वह एक बेटे को जन्म दे। बीटराइस की इस चाहत के पीछे वजह यह थी कि बेटियों की तादाद कम होने से वे एक तरह से मुसीबत बन चुकी थीं। लोग-बाग उन्हें हासिल करने को बेताब थे और इसके लिए कुछ भी कर सकते थे।
इस तरह की अंधकारमय हालत में दक्षिण कोरिया जैसे मुल्क आशा की किरण के रूप में सामने आए हैं। दक्षिण कोरिया में भी एक दौर में बेटों की चाहत में लोग-बाग कुछ भी करने को तैयार रहा करते थे। लेकिन आज की तारीख में यहां हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। आज वहां बेटे और बेटियों को एक ही निगाह से देखा जाता है।
इस बारे में विश्व बैंक की एक टीम ने पिछले साल एक अध्ययन किया था। इस दो सदस्यीय टीम में शामिल वोजिंग चुंग और मोनिका दास गुप्ता ने इस बात की जांच की थी कि दक्षिण कोरिया में बेटों की चाहत क्यों कम होती जा रही? उनके मुताबिक इस मामले में विकास और सार्वजनिक नीतियां भारत और चीन के लिए आंखे खोल देने वाला अनुभव रहेगा।
इन दोनों ने 1993 और 2003 में 6500 से भी ज्यादा महिलाओं के बीच सर्वे किया। उन्होंने पाया इन दस सालों के दौरान बेटों की चाहत रखने वाली औरत की तादाद घटकर आधी रह गई है। ऐसा तब हो रहा है, जब सरकार लड़कियां के माता-पिताओं को कोई खास सुविधाएं नहीं मुहैया करा रही है। इन दोनों के मुताबिक उन्हें भारत में इस मामले में खासी उम्मीद दिखाई देती है।
अपने मुल्क में राज्य सरकारें और केंद्र सरकार लड़कियों के माता-पिताओं को काफी सुविधाएं मुहैया कराने में लगी हुई हैं। साथ ही, कुछ जिलों के कलेक्टर भी जन्म पूर्व लिंग परीक्षण रोधी कानून के तहत इस गोरखधंधे खिलाफ सख्त कदम उठाने में लगे हुए हैं। मिसाल के तौर मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले की कलेक्टर एम. गीता को ही ले लीजिए।
जब उन्हें यह पता लगा कि जिले की कई क्लिनिकों में फार्म एफ ठीक तरीके से नहीं भरा जाता तो उन्होंने उन क्लिनिकों को अल्ट्रा साउंड मशीनों के साथ ही सील कर दिया। दरअसल, अल्ट्रा साउंड मशीनों से जांच करने वालों को फार्म एफ भरना जरूरी होता, ताकि यह पता लग सके कि किसने, किस डॉक्टर के कहने पर और किस मर्ज के इलाज के लिए यह टेस्ट कराया था।
तीन साल पहले जब शिवपुरी जिले का कार्यभार उन्होंने संभाला था, तो भी उन्होंने जन्म पूर्व लिंग परीक्षण के खिलाफ अपनी यह जंग जारी रखी। यहां भी उन्होंने क्लिनिकों पर सीलबंद ताला जड़ दिया। इस वजह जिले के पूरे के पूरे डॉक्टर समाज ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल डाला था। इस जंग में पेशे से वकील और दिल से समाजसेवी आशा सिंह ने भी आवाज बुलंद कर ली है।
एनजीओ प्रतिज्ञा के लिए काम करने वाली आशा सिंह ने मुरैना के सील क्लिनिकों को फिर से खोले जाने के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने ग्वालियर के सभी नौ जन्म पूर्व लिंग परीक्षण करने वाले केंद्रों को इस मामले से जोड़ दिया है। खुद सिंह को पिछले हफ्ते जन्म पूर्व लिंग परीक्षण कराने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित की गई कमिटी का मेहमान सदस्य बनाया है।
मालॉफ की किताब में जब सरकार दवाओं के जरिये केवल बेटों के जन्म देने को बढ़ावा देने का फैसला करती है, तो आम लोग इसे अपने अस्तित्व पर हमला मानते हैं और सरकार के खिलाफ क्रांति का ऐलान कर देते हैं। लेकिन शायद हमारे मुल्क में जातिगत भावनाएं इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं सताती। शायद पितृसत्तात्मक भावना हमारे दिमागों में इतने अंदर तक पहुंच चुकी हैं कि अब खुद को बचाने के जज्बात भी हमारे दिलों में पैदा नहीं हो पा रहे।