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व्यापार गोष्ठी: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाना जायज है?

Last Updated- December 07, 2022 | 4:40 AM IST

डूबते को दिया तिनके का सहारा


डूबते को तिनके का सहारा है यह। तेल कंपनियों को बचाना जरूरी था, इसलिए सरकार ने हिम्मत भरा कदम उठाकर तेल की कीमतों में वृध्दि की परंतु इस कदम से उसने जनता को महंगाई के सागर में डुबो दिया।

सरकारी खर्चों में कटौती, पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन, कार पूल, व्हीकल शेयर इत्यादि उपाय सुझाना आसान  है किन्तु व्यवहारिक जीवन में अधिकतम  40-50 दिनों से ज्यादा अपनाना संभव नहीं  है। – अरूणोंपुत्र हूली, जयपुर

बिल्कुल न्यायोचित कदम

सरकार द्वारा पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमत में बढ़ोतरी करना बिलकुल न्यायोचित कदम है। निस्संदेह इससे उन उपभोक्ताओं में थोड़ी कमी आएगी, जो ऊर्जा की बेतहाशा खपत करते हैं। हालांकि सरकार के  इस पहल से एक महत्वपूर्ण पहलू निकल कर सामने आया है, वह है वैकल्पिक ऊर्जा की ओर ध्यान देना।

यह एक तरह की चेतावनी भी है, किसी अगर हम लोग समय रहते नहीं चेते तो वह समय दूर नहीं जब पेट्रोलियम ऊर्जा के स्रोत  खत्म हो जाएंगे। लिहाजा हम लोगों को वैकल्पिक ऊर्जा पर अत्याधिक ध्यान देना चाहिए। मेरा सुक्षाव है कि उपभोक्ता को दिए जाने वाले रसोई गैस को उसके वास्तविक मूल्य पर ही बेचा जाना चाहिए। – सी. एस. बावेल, 102, सुधर्मा अपार्टमेंट, महावीर नगर, इंदौर, मध्य प्रदेश

थोड़ा सब्र तो रखना चाहिए था

ऐसा बिल्कुल ही नहीं है कि हमारी अर्थव्यवस्था यह वृध्दि अवशोषित न कर सके। पर थोड़े और सब्र की आवश्यकता थी-बस चार-पांच महीने। पेट्रोलियम पदार्थो में कुछ वृध्दि 2008-09 के लिए केवल 21000 करोड़ रुपये ही अर्जित कर पाएगी। पर यह इस समय अर्थव्यवस्था को गहरे और दीर्घकालीन चोट दे सकने में सक्षम है। – शिखा मिश्रा, काशीडीह, जमशेदपुर, झारखंड

आमजन को समझनी होगी मजबूरी

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, इसलिए सरकार को मजबूरन पेट्रोल-डीजल और घरेलू गैस की कीमत में बढ़ोतरी करनी पड़ी। इस बात को आमजन को भी समझना बेहद जरूरी है। मौजूदा परिस्थिति में हमलोगों को कदम से कदम मिला कर चलना होगा। – पूजा तारे, नयापुरा कोलारा रोड, भोपाल, मध्य प्रदेश

दाम बढाना साहसिक कदम

पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में वृध्दि का फैसला सरकार का एक साहसिक कदम माना जाना चाहिए, क्योंकि पेट्रोलियम कंपनियों के पास जब पैसा ही नहीं होगा, तो कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय बाजार से खरीदारी किस आधार पर करेगी। सही मात्रा में सप्लाई न हो पाने की वजह हमारे वाहन सड़कों पर कैसे चलेगें।

जब वाहन सड़क पर नहीं चल पाएंगे तो देश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतरने में देर नहीं लगेगी। इसलिए इस फैसले का विरोध न करके सच्चाई को समझना चाहिए। – रवि शिंदे, अध्यक्ष, मुंबई पेट्रोल पंप डीलर एसोसियशन, मुंबई

मूल्य वृध्दि नहीं, करों में कटौती हो

पेट्रोलियम कंपनियों को घाटे से बचाने के लिए सरकार को अपने करों में कमी करनी चाहिए थी।  पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से लगभग सभी तरह के किरायों में वृध्दि करना मजबूरी हो गई है। इसी मजबूरी के चलते किराये में दो दिन के अंदर 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। खाद्यानों की भी कीमतों में लगभग 15 फीसदी की वृध्दि हो गई है। – अशोक राजगुरु, अध्यक्ष, बांबे गुड्स ट्रांसपोर्टर्स एसोसियशन, मुंबई

और भी चीजों के दाम बढ़ेंगे

विश्व तेल अर्थव्यवस्था के मद्देनजर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाकर सब्सिडी कम करना सरकार की मजबूरी है, नहीं तो भारतीय अर्थव्यवस्था असंतुलित हो जाएगी। हम गंदी राजनीतिक हरकतों से विदेशी पेट्रोल-डीजल पर निर्भर होते चले गए। बढ़ी हुई कीमत कई चीजों को प्रभावित करती है। सरकार को अन्य ऊर्जा स्रोतों की ओर भी ध्यान देना चाहिए। – राजेंद्र प्रसाद मधुबनी, व्याख्याता, वार्ड न.- 14 मधुबनी, बिहार

यह जायज नहीं

नहीं, यह जायज नहीं है। वर्तमान में मुद्रास्फीति की दर 8 फीसदी है। अब क्योंकि पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ गए हैं, इससे अन्य आवश्यक वस्तओं का ढुलाई खर्च भी बढ़ जाएगा। इस खर्च की भरपाई वस्तुओं की कीमत बढ़ाकर होगी।  – अनवर अंसारी, वाणिज्य निरीक्षक, उत्तर रेलवे, 140-सी, रेलवे कॉलोनी, अंबाला छावनी

वैकल्पिक ऊर्जा सहारा

पेट्रोलियम मूल्यों में वृध्दि कई दिनों से अपेक्षित थी। मूल्यवृध्दि की यह कवायद लगभग एक सप्ताह से चलती रही और आर्थिक विशेषज्ञ राजनैतिक कमेटी ने भी इसको स्वीकार कर लिया था। तभी जाकर सरकार ने तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की है। यह सभी को मालूम है कि पेट्रोल ऊर्जा का स्रोत काफी कम बचा है। ऐसी स्थिति में हमें वैकल्पिक ऊर्जा पर ध्यान देना चाहिए।  – सतीश कुमार शुक्ल, कॉटन एक्सचेंज, द्वितीय तल, कॉटन ग्रीन, मुंबई

उचित मरहम की जरूरत

तेल कंपनियां, सरकार एवं उपभोक्ता तीनों ही झुलस रहे हैं ऐसे में तीनों एक-दूसरे को मलहम लगाकर ही विकास जारी रख सकते हैं। अपने नुकसान का रोना छोड़कर कदम बढ़ाने होंगे। कीमत बढ़ाकर एवं टैक्स घटाकर सरकार ने दो कदम चल दिए हैं। अब तेल कंपनियों को भी तेल शुध्दिकरण प्रक्रिया (रिफाइनिंग लागत) कम वसूलनी चाहिए। – अनिता कासट, 373, विवेक विहार, सोडाला, जयपुर

सब्सिडी को भी खत्म किया जाए

तेल की सारी सब्सिडी समाप्त करके महंगाई को उच्चतम स्तर पर पहुंचने देना चाहिए, जिससे भारत जैसे कृषि प्रधान देश को उसकी कृषि की अधिकतम कीमत प्राप्त हो सकती है। सब्सिडी एक ऐसा लोभ है, जिसके लिए जनता अपने सालाना अतिरिक्त 2000 रुपये बचाने के लिए तेल कंपनियों को सालाना 2,00,000 करोड़ का नुकसान दे रही है। – विकास माहेश्वरी, डी. सी. सी. कॉलोनी, दिग्विजय ग्राम जामनगर (गुजरात)

कब तक उठाएगी सरकार यह घाटा

मेरे विचार से पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाना बिलकुल जायज है। कारण, आज वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ते-बढ़ते 125135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। सरकार और तेल कं पनियां कब तक सब्सिडी का घाटा उठाती रहेगी। रही बात आम आदमी की वह कैसे वहन करेगा तो आज देश में जो आदमी भी तेल का उपयोग करता है, उसकी आमदनी भी बढ़ी है (कुछ को छोड़कर)।  – रतनलाल अग्रवाल, निदेशक, आर. आर. अग्रवाल ज्वैलरी प्राइवेट लिमिटेड, कोलकाता

दूरदर्शी उपायों की दरकार

मेरी नजर में दूरगामी उपायों की जरूरत है, जैसे- टैक्स मूल्यों  को ठीक किया जाए, पेट्रोलियम पदार्थो पर लिए गए टैक्सों का उपयोग ऑयल एक्सप्लोरेशन के उपयोग में ही किया जाए, यूरोपियन और अमेरिका की  तर्ज पर पेट्रोल पर हमें भी मौजूदा पेट्रोल पर 5 फीसदी इथेनाल ब्लेडिग को बढ़ाकर कम से कम 15 फीसदी या इससे अधिक करना चाहिए। – सुरेंद्र सिंह कच्छ, स्वतंत्र पत्रकार, 9ए96 साकेत नगर, भोपाल, मध्य प्रदेश

और भयानक बना दिए गए हालात

अगर सरकार कंपनियों पर उपकार करना चाहती ही थी तो करों में कटौती करती। लेकिन सरकार ने वर्तमान परिस्थिति को और भयावह बना दिया है। अब महंगाई और बढ़ेगी और आम जनता पर बोझ भी। – रुचि गौर, ब्यूटीशियन, डेयरेक्टर लिप्सटिक ब्यूटी केयर, ए-180, शाहपुरा, भोपाल

भारी कर के बाद सब्सिडी बेमानी

लागत के जिस भाग का भार आज सीधे-सीधे जनता पर नहीं है, उसका मर्म और उसके दुष्परिणाम जो लोग जानते है, वे कीमतें बढ़ाने के विकल्प का ही समर्थन करेंगे। हां, इतना अवश्य है कि केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले भारी करों के बाद सब्सिडी देने की व्यवस्था बेमानी है। राजस्व उगाही के वैकल्पिक मार्ग खोज कर पेट्रोलियम पदार्थो को सभी तरह के करों से मुक्त कर जितनी भी आवश्यकता हो उतने दाम तत्काल बढ़ा देना चाहिए। – डॉ. जी. एल. पुणताम्बेकर, रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश

मजबूरी तो है पर उचित नहीं

कीमतें बढ़ाना सरकार की मजबूरी हो सकती है लेकिन उचित तो किसी भी सूरत में नहीं है। वैसे भी तेजी से बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना बेहाल कर दिया है। सरकार सेवाकर एवं आयकर में शिक्षा उपकर से भारी भरकम आय प्राप्त कर रही हैं। इसके एक भाग का उपयोग किया जा सकता है। सरकार को उत्पाद शुल्क एवं वैट में कमी करना चाहिए।  – डॉ. अरविंद जैन, प्राचार्य, सर हरीसिंह गौर महाविद्यालय, सागर

हाय-तौबा मचाने पहले मजबूरी देखें


मूल्य वृध्दि कमोबेश जायज है। जनता व विपक्ष को हायतौबा मचाने से पूर्व सरकार की मजबूरी व सीमित ऊर्जा संसाधन को भी समझना चाहिए। जिस तरह बाढ़ के बढ़ते जलस्तर को अनदेखा करना घातक होता है, उसी तरह तेल कंपनियों को लगातार घाटे में डालना, देश की आर्थिक संप्रभुता के साथ खिलवाड़ होगा। – हर्षवर्ध्दन कुमार, डी-5556, द्वितीय तल, गांधी विहार, नई दिल्ली

तेल पर करों को कम करे सरकार


महंगाई दर से आम आदमी की कमर टूटती जा रही है, वैसे में कीमतों में वृध्दि करना किसी भी तरीके से न्यायोचित नहीं है। केंद्र सरकार को चाहिए कि तेल पर (खासतौर से पेट्रोल) पर लगाए जाने वाले करों को कम करे। इसमें कोई शक नहीं कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृध्दि से महंगाई और बढ़ेगी और स्थिति भयावह होती जाएगी। – प्रवीर राय, आईटी प्रोफेशनल, लखनऊ

समस्या का स्थायी हल नहीं


कड़वा सत्य यह है कि इसका कोई और ठोस विकल्प भी नहीं है। लेकिन अभी तक ढंग की तेल नीति भी नहीं बनाई गई है। बस एक ही नीति िहै- आयात करो, दाम बढ़ाओ और छुट्टी पाओ। इस समस्या का समाधान है राशनिंग, वर्गीकरण, खपत घटाना और भण्डारण क्षमता में भारी वृध्दि करना। पेट्रो पदार्थों को प्रीमियम व साधारण वर्गों में बांटा जा सकता है। – कपिल अग्रवाल, पूर्व वरिष्ठ उस संपादक, दैनिक जागरण, 1915 थापर नगर, मेरठ

कदम उठाने से पहले देखे जाएं आंकड़े

कोई भी कदम उठाने से पहले उन आंकड़ों पर गंभीरता से नजर डालना चाहिए जो दर्शाते हैं कि हमारे यहां आधे से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। महंगाई ने वैसे ही कमर तोड़ दी है।  – मनोज कुमार ‘बजेवा’, शोधार्थी एवं प्राध्यापक, पत्रकारिता विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार

पुरस्कृत पत्र

यह अदूरदर्शिता का परिणाम है

सरकार द्वारा पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की कीमत बढ़ाना जायज नहीं है, क्योंकि सरकार ने समय रहते ऐसे कदम नहीं उठाए जिससे इस समस्या को रोका जा सके। सरकार सबसे ज्यादा राजस्व तेल की बिक्री से प्राप्त करती है। तेलों पर लगने वाले बिक्री कर को सरकार द्वारा समय के साथ कम करने के विकल्प पर ध्यान नहीं दिया गया।

सरकार ने सोचा था कि वह स्थितियों से निपटने के लिए सक्षम है, पर चूंकि तेल की कीमत अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर निर्भर करती है, इस वजह से सरकार इस समस्या से निपटने में पूरी तरह नाकाम रही। बढ़ती महंगाई दर से आम आदमी का जीना मुहाल होता जा रहा है। इस तरह की स्थितियां सरकार की अदूरदर्शी नीति और नाकारेपन को ही दर्शाता है। ऐसे में सरकार तेल के दाम बढ़ाएगी नहीं तो और क्या करेगी। – प्रशांत वर्मा, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

सर्वश्रेष्ठ पत्र

जले पर नमक छिड़का सरकार ने

पहले से ही आटे-दाल की महंगाई से त्रस्त जनमानस पर पेट्रोल-डीजल व रसोई गैस की बढ़ी कीमत जले पर नमक छिड़कने के समान है। कहा जा रहा है कि सरकार भारी आर्थिक दबाव में है तो फिर जनता पर बोझ डालने की बजाए राजनीतिक-प्रशासनिक खर्च में कटौती क्यों नहीं करती? ‘

लोक कल्याणकारी राज्य’ में उस कॉमन मैन, जिनकी हालत पहले से पतली है, उसका क्या होगा? क्या सरकार ने सोचा है कि मूल्य वृध्दि का प्रभाव सर्वत्र पड़ेगा। रसोई से लेकर बाजार तक का बजट गड़बड़ाएगा।  – सुशीला देवी, सृष्टि रूपा भवन, सरस्वती लेन, पूर्वी लोहानीपुर, पटना

मध्यम वर्ग का  निकाला दिवाला

तेल के खेल में सरकार ने मध्यम वर्ग का दिवाला निकाल दिया है। माना कि वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ रही थी पर सरकार उत्पाद शुल्क घटाकर काफी कुछ राहत दे सकती थी। कीमत भी एक साथ इतनी ज्यादा बढ़ाई गई है कि हर चीज मंहगी होने लगी है।

भाड़ा बढ़ गया और इसके चलते अनाज फिर मंहगा होने लगा है। आखिर गरीब कब तक पिसेगा। मायावती का शुक्रिया कि उन्होंने अपने स्तर पर रसोई गैस पर वैट खत्म कर के और पेट्रोल और डीजल पर कर घटाकर जनता को काफी राहत दी है।  – सिराज मेंहदी , पूर्व सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश

आम आदमी तो लुट ही गया

जिस तरह वैश्विक बाजार में दिनों-दिन कच्चे तेल की कीमत में आग लगती जा रही है, वैसे में भारत सरकार द्वारा यह कदम उठाया जाना बेहद जरूरी था। हालांकि देश की जो मौजूदा स्थिति बनी हुई है, उसमें आम आदमी आपने आप को लुटा हुआ महसूस कर रहा है।

एक तो देश में मुद्रास्फीति की दर 8 फीसदी के आंकड़े को भी पार कर गई है। दूसरे, केंद्र सरकार ने कर्ज माफी की राशि को बढ़ाकर 71,000 करोड़ रुपये कर दिया है। निस्संदेह ऐसे में कहीं न कहीं बोझ आम आदमी पर भी पड़ेगा। – मीरा सिंह रावत, छात्रा, पत्रकारिता और जनसंपर्क, लखनऊ

पानी सिर से गुजरा तो जागे

लोक कल्याणकारी राज्य मे अगर जनता चुनी हुई सरकार से सब्सिडी की अपेक्षा रखती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। तेल की कीमत अचानक इतना बढ़ जाने पर जनता का रोष जायज है। दरअसल, चुनाव के साल सरकार पहले तो कीमतें बढ़ाने से कतराती रही और पानी सर से ऊपर निकल गया तो एक साथ इतना बोझ लाद दिया गया है।

बेहतर यह होता कि सरकार पहले करों की दर में सुधार कर लेती फिर कीमतों को बढ़ाती तब शायद उसे जनता के इतने रोष का सामना न करना पड़ता। राज्यों में अभी भी कर दरें तर्कसंगत नही हैं।  – रोली सिंह , एम बी ए, निदेशक एंपायर प्लाईवुड, लखनऊ

बकौल विश्लेषक

कल के संकट से लापरवाह सरकार जी रही बस आज में
अरुण कुमार, प्रोफेसर, अर्थशास्त्र, जेएनयू

सरकार द्वारा उठाया गया कदम किसी भी नजरिए से जायज नहीं है। जो यह कहा जा रहा है कि तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है, वास्तव में वह एक ‘नोशनल’ यानी अनुमानित घाटा है। सरकार की नीतियां शुरू से ही गलत रही हैं। वे केवल वर्तमान को ध्यान में रखकर ही नीतियों का कार्यान्वयन करती है।

क्योंकि पेट्रोलियम प्रोडक्टों की कीमतों में बढ़ोतरी हो चुकी है, इससे ‘इंफ्लेशनरी एक्सपेक्टेशन’ बहुत ज्यादा बढ़ने की आशंका है। मसलन अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होगा। पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की कीमत कई चीजों पर निर्भर करती है। उदाहरणस्वरूप राज्य सरकार द्वारा बिक्री कर, केंद्र सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क और बाहर से जो सामान आता है उसपर लगाए जाने वाले सीमा शुल्क से कीमतें बढ़ती हैं।

यहां एक बात नहीं समझ में नहीं आती कि सरकार एक तरफ तो कंपनियों से टैक्स वसूल कर रही है और दूसरी ओर यह कह रही है कि कंपनियों को घाटा हो रहा है। सरकार को ऐसे में चाहिए था कि तेल कंपनियों के उत्पाद शुल्क और बिक्री कर में कटौती करने के साथ ही कच्चे तेल की सीमा शुल्क पर में भी कटौती कर देती। निश्चय ही इससे कंपनियों को घाटा नहीं होता।

बहरहाल, सरकार को चाहिए कि वे ऐसी नीतियों का कार्यान्वयन करें जिससे लंबे समय के लिए समस्या का समाधान हो सके। सरकार को चाहिए कि वे उन कंपनियों पर अत्याधिक टैक्स लगाएं जो ऊर्जा की अधिक खपत करते हों। हमें पेट्रोलियम ऊर्जा से सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

बातचीत: पवन कुमार सिन्हा

मोटा वेतन भी चाहिए और सारी चीजें सस्ती भी !
प्रोफेसर ए. के. श्रीवास्तव, सांख्यिकी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय

दरअसल इस बढ़त से सारी परेशानी मध्यम वर्ग को हो रही है, जो एक तरफ मोटा वेतन चाहता है, तो दूसरी ओर हर चीज सस्ती। इसे मानना होगा कि मनमोहन सरकार के दौरान देश की अच्छी प्रगति हुई है। तेल की कीमत भी तब बढ़ाई गई, जब पानी सर से ऊपर निकल गया था।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने ही बयान किया था कि कुछ तो मजबूरियां रही होंगी यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। यह कदम भी बड़ी मजबूरी में चुनाव के साल में उठाया गया है, इसे उपभोक्ताओं को समझना होगा। सरकार एक ऐसे उत्पाद पर नियंत्रण रख रही है, जो कि विश्व बाजार से संचालित हो रहा है। तेल की असली कीमत विश्व बाजार में निर्धारित हो रही है न कि भारत में। ऐसे में सरकार को एक बार कड़ा कदम उठाकर इसे नियंत्रण से मुक्त कर देना चाहिए।

हां, सरकार इस पर शुल्क लगा सकती है वह भी वर्तमान से काफी कम। इसको करने के लिए मजबूत इच्छा शक्ति की जरूरत है जो कि इस गठबंधन सरकार के पास नहीं है। तेल ही क्यों और भी कई चीजें हैं, जिनको सरकारी नियंत्रण से बाहर करने की जरूरत है। गेहूं खरीदने को कई कंपनियां 1000 रुपये से ज्यादा देने को तैयार थीं पर सरकार ने उन्हें इजाजत ही नहीं दी।

आखिर किसान को भी उपज पर लाभ लेने का पूरा हक है। कीमत बढ़ाने पर मध्य वर्ग का हाय तौबा मचाना तो सरासर गलत है। सरकारी बाबू छठे वेतन आयोग से 30000 रुपए के मोटे वेतन की सिफारिश की अपेक्षा रखता है मगर तेल और गेहूं उसे आज से 5 साल पहले के दाम पर ही चाहिए। एक बार सरकार को कड़ा कदम उठाकर तेल को नियंत्रण मुक्त कर देना चाहिए, यह बेहतर ही होगा।

बातचीत: सिध्दार्थ कलहंस


…और यह है अगला मुद्दा

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First Published - June 8, 2008 | 11:41 PM IST

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