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जरूरी है महंगाई को साधना

Last Updated- December 07, 2022 | 2:00 PM IST

मंगलवार को रिजर्व बैंक को अपनी मौद्रिक नीति की घोषणा करनी है, लेकिन कई अहम आर्थिक मानकों की हालत खस्ता है। इस वजह से बैंक के पास दो रास्ते हैं।


पहला रास्ता तो महंगाई को साधने के लिए आक्रामक रणनीति बनाने का है, जिसके तहत रेपो रेट और कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर) में इजाफा जारी रखा जाए। दूसरा रास्ता अर्थव्यवस्था को खुला छोड़ देने का है, ताकि वह इस मुसीबत से खुद ही निपट सके।

वैसे दुनिया भर में हुई हालिया घटनाओं को ध्यान में रखें, तो दूसरी राह ही जायज लगती है। इसमें काफी अहम घटना है, पिछले 10 दिनों में तेल की कीमतों में तेज गिरावट। इसकी वजह है, अमेरिका में कच्चे तेल की मांग में आई जबरदस्त कमी। साथ ही भारत, चीन और कई दूसरे एशियाई देशों में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेज इजाफा हुआ है। इसका असर भी कच्चे तेल की कम होती मांग पर पड़ी है।

अब जब दुनिया भर में कच्चे तेल के इस्तेमाल में भारी गिरावट आई है, तो स्थिर पूर्ति की स्थिति में कीमतों को गिरना ही था। हालांकि अब कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर आ चुका है, लेकिन यह कीमत भी काफी ज्यादा है। वैसे कच्चे तेल की कीमत में आई इस गिरावट से यह डर तो खत्म हो गया कि अब उसकी कीमत कभी कम नहीं होगी। अगर आंकड़ों की मानें तो मौद्रिक नीति में कड़ाई का मनचाहा ही असर पड़ा है। मुल्क के औद्योगिक विकास की रफ्तार काफी सुस्त पड़ चुकी है क्योंकि अब कर्जे काफी महंगे हो चुके हैं।

हालांकि, चिंता की बात है मई में मशीनरी और उपकरण सेक्टर की नकारात्मक विकास दर। इसका मतलब यह है कि अब निवेशक पैसा लगाने से डर रहे हैं। जहां तक वित्तीय बाजारों की बात है तो ऊंची ब्याज दरों ने तरलता के हाथ बांधे रखे हैं। ऐसी हालत में अगर ब्याज दरों को और बढ़ाया गया तो मंदी से उबरने की कोशिश को करारा झटका लगेगा। हालांकि कई ऐसे भी मुद्दे अब भी मौजूद हैं, जिनकी वजह से मुल्क को और भी ऊंची ब्याज दरों की जरूरत पड़ेगी।

माना कि कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी नीचे आ चुकी हैं, लेकिन अब भी वह घरेलू बाजार की कीमतों से काफी ज्यादा है। इसका मतलब यह हुआ कि आज भी महंगाई का पूरा असर अपने मुल्क में नहीं दिख रहा है। ऊपर से, इस बार मानसून ने भी इस बार हमारे मुल्क को प्यासा ही रखा है। अब तो इसका असर दालों, तिलहन और मोटे अनाज की कीमतों पर भी दिखाई देने लगा है। तरलता पर काबू करने में रिजर्व बैंक की कामयाबी की एक वजह विदेशी निवेशकों द्वारा तेजी से पैसा खींचना था। लेकिन सरकार के विश्वासमत हासिल करने के बाद अब यह ट्रेंड बदलना शुरू भी हो गया है।

अगर सरकार सुधारों की गाड़ी को पटरी पर ले आई तो मुल्क में तेजी से पैसा आएगा। इसलिए सीआरआर में इजाफे की जरूरत पड़ेगी, ताकि इसका असर कम रहे।  तो किस राह जाए रिजर्व बैंक? इसने जून में महंगाई को साधने को अपना पहला लक्ष्य बताया था। संतुलित रूप से सोचें तो उसे अपने इसी रुख पर कायम रहना चाहिए।

मतलब, उसे मौद्रिक नीति में तरलता पर लगाम को और कसनी चाहिए। इससे उसकी साख बरकरार रहेगी। सीआईआई और फिक्की का कहना है कि इस साल उद्योग जगत को भले ही मुनाफा कम हो, लेकिन विकास की गाड़ी आगे बढ़ती रहेगी। इसलिए अब अगर महंगाई बड़ा दुश्मन है, तो रिजर्व बैंक को उसे ही साधना चाहिए।

First Published - July 28, 2008 | 11:30 PM IST

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