facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

जोखिम भरा है जल्दबाजी में जीत का ऐलान

Last Updated- December 11, 2022 | 1:57 PM IST

हमारे पास गर्व करने और जश्न मनाने के लिए भी बहुत कुछ है। मगर अभी भी तमाम ऐसी गड़बड़ियां हैं, जो हमें जीत की घोषणा में जल्दबाजी के जोखिमों का स्मरण कराती हैं 
राजनीतिक खेमों में प्रभुत्वशाली पक्ष इस उत्साह में है कि भारत आज जितना खुशहाल है, उतना इतिहास में कभी नहीं रहा। हमारी अर्थव्यवस्था इतना शानदार प्रदर्शन कर रही है कि हमने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में ब्रिटेन को भी पीछे छोड़ दिया है जिसने कभी हम पर राज किया था। हमारे बाजार गुलजार हैं। दुनिया की तमाम अन्य मुद्राओं की तुलना में रुपया कम ही कमजोर हो रहा है। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और इन्वेस्ट इंडिया सभी आर्थिक उत्कर्ष के महान दौर के प्रतीक हैं।
भले ही विश्व बैंक में बैठे कुछ नादान लोगों ने हमारी वृद्धि की दर को घटाकर 6.5 फीसदी कर दिया हो, लेकिन फिर भी यह दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज होगी। जब आ​र्थिक वृद्धि, बौद्धिक विचारों और नैतिकता का भयावह सूखा दौर चल रहा है, दुनिया को भारत रेगिस्तान में एक नखलिस्तान नजर आ रहा है। 
हमारे सशस्त्र बलों का भी पहले कभी इतनी तेज गति से आधुनिकीकरण नहीं हुआ, हमारे शत्रु हमें लेकर कभी इतने सावधान-सतर्क नहीं रहे और इस उछाल का प्रतिनिधित्व खेलों में हमारे अप्रत्याशित उभार में भी होता है। हम अतीत की तुलना में कहीं ज्यादा पदक जीत रहे हैं। भारतीय जड़ों से जुड़े तमाम लोग शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारी बन रहे हैं। दुनियाभर में भारत की धूम मची है। संक्षेप में कहें तो ‘बल्ले-बल्ले’ का नए सिरे से बदला हुआ यह मिजाज हमने पहले कभी नहीं देखा। परंतु यहां सर्किट-ब्रेकर लगाने की आवश्यकता है। 
ऊपर जिन ‘उपलब्धियों’ की चर्चा की गई है, मैंने उन्हें उद्धरण या सबसे खतरनाक विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ प्रस्तुत नहीं किया, क्योंकि इस सप्ताह का तर्क तथ्यों की पड़ताल से नहीं जुड़ा है। और न ही मैंने ‘नकारात्मकता की नवाबी गपशप’ को लेकर मूढ़ ठहराए जाने के डर से ऐसा किया। इसकी वजह यही है कि मेरी मंशा ही रंग में भंग डालने की है। बहरहाल, इन सभी कथित और वास्तविक उपलब्धियों को वास्तविकता एवं तथ्यों की कसौटी पर कसने से कहीं महत्त्वपूर्ण यह है कि हम अपनी व्यापक राष्ट्रीय सोच, पद्धति और शैली से जुड़े कुछ सबसे बड़े खतरों के प्रति स्वयं को सतर्क-सचेत करें। यहां मैं चार पर चर्चा करूंगा। 
 हम भारतीयों की मानसिकता की तुलना ‘बारात की घोड़ी’ से की जा सकती है, जिस घोड़ी पर सवार होकर दूल्हा विवाह के लिए पहुंचता है। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में घुड़चढ़ी की यह परंपरा है। आदत और प्रशिक्षण से यह हर 50 गज की दूरी पर रुक जाती है और बारातियों के नाचने-झूमने के बाद आगे बढ़ती है। असल में हम सुसंगत, स्व-पहल और स्व-प्रेरक कार्यों में विश्वास नहीं करते। सम्मानित अपवादों की बात अलग है। मुझे पता है कि इस बात को लेकर आप मुझ पर नजर टेढ़ी करेंगे। परंतु जरा हमारे उद्यमों-व्यवसायों और गतिविधियों की उत्पादकता दर पर गौर कर लीजिए। विशेष रूप से विनिर्माण के बारे में विचार कीजिए।
 हम अधिकांशतः यही सोचते हैं कि हम हम दूसरे व्यक्ति का काम उससे बेहतर करने की स्थिति में हैं। क्या हम सभी यह नहीं मानते कि भारतीय क्रिकेट टीम के कोच या चयनकर्ताओं की भूमिका हम बेहतर निभा सकते हैं? किसी भी पारिवारिक जमावड़े में कोई भी आपकी बीमारी के उपचार का नुस्खा बताने लग जाएगा। निश्चित रूप से उनके पास कोई चिकित्सा शिक्षा नहीं होती। असली डॉक्टर आपको पार्टियों में सलाह नहीं देते और वह भी मुफ्त में तो कतई नहीं। हालांकि काबिल डॉक्टरों में आपको दस ऐसे मिल जाएंगे जो यह मानते होंगे कि वही बेहतर हैं।
सेना सोचती है कि वह पुलिस का काम बेहतर कर सकती है तो पुलिस सेना का। वहीं अफसरशाह यही मानते हैं कि वे हर किसी की जिम्मेदारी बेहतरीन ढंग से निभा सकते हैं। यदि आपने मेरी तरह मीडिया कंपनी में समय बिताया होता तो जानते कि पत्रकार यही मानते हैं कि यदि वे बिक्री और विपणन का काम संभालते तो कंपनी के मुनाफे की तस्वीर कहीं बेहतर होती। बिक्री और विपणन की जिम्मेदारी संभालने वालों की यही राय संपादकीय विभाग के बारे में होती कि यदि वे उसे संभाल रहे होते तो स्थिति ज्यादा बेहतर होती।
 हम भारतीयों में दूसरों की पराजय को चुराने का अद्भुत गुण है। वर्षों तक आर्थिक सुधारों को लेकर डर का माहौल कायम रहा। क्या आपने (जोसेफ) स्टिगलिट्ज (यह मैंने दिवंगत ज्योति बसु के साथ साक्षात्कार में उनसे सुना था) या (थॉमस) पिकेटी को नहीं पढ़ा? इसकी तथ्यपरक पड़ताल करेंगे तो शायद अलग तस्वीर मिले, लेकिन लब्बोलुआब यही दर्शाता है कि हमने एक अमेरिकी और एक फ्रांसीसी की किताबों को मुख्यतः पढ़े बिना ही उनकी शिकायतों को उधार ले लिया। यह दूसरों की हार का आलिंगन करने जैसा है।
 अब चौथे पहलू की चर्चा करते हैं, जो सबसे महत्वपूर्ण है। यह विजय की घोषणा में जल्दबाजी करने वाला आत्मघाती मोह है। अब कुछ इसी तरह का माहौल बन रहा है। इंदिरा गांधी के दौर में ऐसा कई बार हुआ। यहां तक कि तब भी जब हमारे इकलौते वायुसेना पायलट से एस्ट्रॉनॉट बने शख्स एक सोवियत अभियान पर सवार हो लिए। राजीव गांधी के समय ‘मेरा भारत महान’ और दुनिया भर में भारतीय उत्सवों की परंपरा चली। वाजपेयी के दौर में ‘भारत उदय’ तो संप्रग के समय 2007 मे दावोस में ‘इंडिया एव्रीवेर’ के रूप में स्वयंभू विजय के उदाहरण दिखे। अब हम उन्माद की दोहरी खुराक के दम पर उसी तरह के दौर में दाखिल हो गए हैं। 
अच्छे-भले भारतीयों द्वारा राष्ट्रजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विजय का ऐलान किया जा रहा है। इनमें हमारे बेहतर होते हवाई अड्डों से लेकर बैंकिंग, इंटरनेट की गुणवत्ता, मुद्रा की मजबूती, टीकाकरण के आंकड़ों से लेकर घरेलू सैन्य हेलीकॉप्टर और नई सुपर-फास्ट ट्रेन तक शामिल हैं। 
हम जल्दबाजी में जीत की घोषणा करने वाले अपने उसी पसंदीदा जाल की ओर वापस जा रहे हैं। मध्यकालीन युद्धों में जीत से लेकर कोहली से पूर्व वाले दौर में क्रिकेट मैचों में लक्ष्य का पीछा करना, आर्थिक वृद्धि के बाद मंदी से लेकर हॉकी मैचों के अंतिम पड़ाव पर लड़खड़ाकर हार जाने का हमारा त्रासद निरंतरता वाला खासा लंबा रिकॉर्ड रहा है।
वर्तमान माहौल का मामला कुछ अलग किस्म का है। यह अत्यंत लोकप्रिय, वैचारिक व्यवस्था-वितरण है।  यहां ‘बल्ले-बल्ले’ का माहौल बनाना ही समूची कैबिनेट का प्रमुख नीतिगत उद्देश्य बन गया है, जहां चेताने के लिए कोई बचा ही नहीं। माहौल कुछ ऐसा है कि राष्ट्रमंडल खेलों की किसी भी स्पर्धा में मिले कांस्य पदक का भी जश्न इस प्रकार मनाया जा रहा है कि ऐसी कोई राष्ट्रीय उपलब्धि पहले हासिल न हुई हो। जबकि हमने पहले भी राष्ट्रमंडल खेलों में तमाम पदक जीते हैं।
उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि राष्ट्रमंडल खेल अंतरराष्ट्रीय स्तर बहुत उल्लेखनीय स्पर्धा नहीं। ट्रैक ऐंड फील्ड से लेकर तमाम अन्य श्रेणियों में ऑस्ट्रेलिया, इंगलैंड, न्यूजीलैंड और यहां तक कि कैरेबियन द्वीपों जैसी खेल महाशक्तियां राष्ट्रमंडल खेलों में अपने आला खिलाड़ियां नहीं भेजतीं। यहां कोई उसेन बोल्ट नहीं होता। फिर मुक्केबाजी, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, भारोत्तोलन जैसे जिन खेलों में हम सबसे अधिक पदक जीतते हैं, उनमें महारत रखने वाले देश तो राष्ट्रमंडल का हिस्सा ही नहीं। वास्तव में एशियाड की चुनौती कहीं ज्यादा कड़ी होती है। 
बिना सोचे-समझे खेल में गौरव का समय से पहले जश्न मनाना तो एक व्यापक बीमारी का रूपक मात्र है। हम अपनी 6.5 से 7 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि पर भी शायद आह्लादित होंगे, क्योंकि यह विश्व में सबसे बेहतरीन है, लेकिन यदि पांच वर्षों का औसत निकालें तो यह करीब 3.5 प्रतिशत रह जाती है। 
आप लॉकडाउन वाले वर्षों को दोष दे सकते हैं, लेकिन वृद्धि तो उससे पहले भी 5 प्रतिशत से नीचे गोता लगा चुकी है। अभी बहुत काम करना है, न कि पहले से ही जीत को घोषणा करनी है।  रोजगार, चालू खाता घाटा, ग्रामीण स्थिति और कृषि उत्पादकता सभी गहरे संकट में हैं। अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है और महामारी को समाप्त हुए एक वर्ष बाद भी सरकार इस योजना को वापस लेने की इच्छुक नहीं।
बड़ी सक्षमता के साथ इतनी मात्रा में मुफ्त अनाज बांटा जा रहा है। इसके बावजूद मनरेगा के तहत काम की मांग अभी भी अपने चरम पर है। चीन के दुस्साहस और पश्चिम को लेकर बदल रहे समीकरणों के चलते बाहरी मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक हो गई है। 
काफी कुछ अच्छा हुआ है। गर्व करने और जश्न मनाने के लिए भी बहुत कुछ है। मगर अभी भी बहुत कुछ गड़बड़ है, जो हमें जीत की घोषणा में जल्दबाजी के जोखिमों-खतरों को स्मरण कराती हैं। यानी खुद को आईना दिखाना रंग में भंग डालना नहीं है। 

First Published - October 9, 2022 | 10:21 PM IST

संबंधित पोस्ट