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जुगाड़ छोड़ना होगा! जापान के साथ मजबूत और गहरे व्यापारिक संबंध बनाने का आ गया है सही समय

बदलते वै​श्विक परिदृश्य में भारतीय कंपनियों के लिए इस वक्त यह आवश्यक है कि वे जापान के साथ संबद्धता को प्राथमिकता दें

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अजय शाह   
Last Updated- May 22, 2026 | 9:26 PM IST

भारतीय व्यापारिक अभिजात वर्ग की अंतरराष्ट्रीयकरण संबंधी रणनीति पारंपरिक रूप से अमेरिका पर केंद्रित रही है। दशकों तक यह एक तार्किक विकल्प था। अमेरिका ने दुनिया का सबसे गहरा पूंजी बाजार, सबसे उन्नत तकनीक और एक पूर्वानुमानयोग्य संस्थागत वातावरण प्रदान किया। अब यह परिदृश्य बदल गया है। अमेरिका में संस्थानों की गुणवत्ता में गिरावट आई है। भारत में निर्णयकर्ताओं को अब अपनी रणनीति पर सावधानीपूर्वक पुनर्विचार करना होगा। वैश्विक जुड़ाव के लिए एक विविधीकृत दृष्टिकोण अब एक जरूरत बन चुका है। स्थिरता की यह तलाश आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के परिपक्व लोकतंत्रों की ओर ध्यान आकर्षित करती है। इनमें भारतीय कंपनियों के लिए जापान को अधिक प्राथमिकता देना एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। 

अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसका नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 27.78 लाख करोड़ डॉलर है। जापान का नॉमिनल जीडीपी 4.11 लाख करोड़ डॉलर है। इस तरह जापान भी एक बड़ा देश है जिसके साथ भारतीय कंपनियां काफी कुछ कर सकती हैं। जापान के साथ हालिया दशकों के अपने अनुभव से जुड़े पूर्वाग्रह की समीक्षा करनी होगी।

1945 के बाद जापान ने बड़े पैमाने पर औद्योगिक नीति पर काम किया। अफसरशाहों ने सीधे ऋण देने और विजेता चुनने का प्रयास किया। सक्षम जापान द्वारा आरंभ में ऐसा आराम से किया गया। लेकिन 1980 के दशक के मध्य तक यह रुख अपनी सीमा पर पहुंच गया। संसाधनों के आवंटन पर सरकार का नियंत्रण वित्तीय व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप का समानार्थी हो गया। जापान में सरकार के ऐसे रुख के चलते बड़े पैमाने पर पूंजी का गलत आवंटन हुआ। जापान को कुछ दशक कमजोर वृद्धि का सामना करना पड़ा और वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया।

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अब हालात बदल गए हैं। जापानी नीति-निर्माताओं ने 1980 के दशक के मॉडल की सीमाओं को समझा और एक अधिक बाजारोन्मुखी, वैश्विक रूप से एकीकृत और वित्तीय रूप से परिष्कृत प्रणाली की ओर रुख किया। राज्य अब भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है लेकिन सिद्धांतों पर आधारित एक मजबूत संस्थागत ढांचा उभर आया है। जापान के पास अब पूरी तरह से खुला पूंजी खाता है और एक बड़े पैमाने पर परिवर्तनशील विनिमय दर तंत्र है जो बाहरी झटकों को सहन करता है। वित्त में उच्च आर्थिक स्वतंत्रता है, और वित्तीय विनियमन सक्षम है तथा विधि के शासन पर आधारित है।

‘गंवाए हुए दशकों’ के दौरान जापानी नीति-निर्माताओं ने धीरे-धीरे आधुनिक बाजार अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक संस्थागत क्षमता का निर्माण किया। निक्केई 225 सूचकांक इस प्रगति की झलक देता है। इक्विटी कीमतें बाजार के भविष्य के नकदी प्रवाह और संस्थागत गुणवत्ता के आकलन को दर्शाती हैं।

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निक्केई 225 ने 1989 के अंत में 38,915.87 का शिखर छुआ था। इसके बाद आई गिरावट और गंवाए हुए दशकों की निराशा का मतलब था कि सूचकांक 30 वर्षों से अधिक समय तक उस शिखर से नीचे ही रहा। 1989 का यह स्तर दोबारा 2024 में ही फिर से हासिल हो सका। उसके बाद, निक्केई 225 में 61.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वैश्विक और जापानी निवेशक जापानी अर्थव्यवस्था में एक नई संभावना देख रहे हैं जो दशकों तक अनुपस्थित थी। 

हमें जापान की जनसांख्यिकीय गिरावट को लेकर बहुत चिंतित नहीं होना चाहिए। भारत में अपेक्षित जननांकिकीय लाभ काम नहीं कर पाया। जनसंख्या आर्थिक वृद्धि की प्रक्रिया का केंद्रीय तत्व नहीं है। बड़े निकाय बनाने और भारी मूल्य उत्पन्न करने के लिए जरूरी कुल जनसंख्या बहुत कम होती है (अमेरिका के टेक उद्योग में सीधे तौर पर कार्यरत लोगों की संख्या बहुत कम है)। जापान के पास अपनी तकनीकी और व्यावसायिक सीमाओं को बनाए रखने के लिए आवश्यक संख्या की कोई कमी नहीं होगी।

जापान बौद्धिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। बात चाहे ऑटोमोबाइल डिजाइन की हो, उन्नत सामग्री की या सेमीकंडक्टर उद्योग की। जापान की क्षमताएं शीर्ष स्तर की हैं। बीते दो दशक में जापान में शोध करने वाले व्यक्तियों को 14 स्टेम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) नोबेल पुरस्कार मिले। अब जापानी रक्षा शोध एवं विकास में तेजी आई है जो चीनी खतरे से निपटने के लिए जापान के नए प्रयास को दर्शाती है। समय के साथ यह विश्वविद्यालयों और उच्च-तकनीकी कंपनियों में नई ताकतें पैदा करेगा जो नागरिक इस्तेमाल तक फैलेंगी।

आपूर्ति श्रृंखलाएं केवल लागत के बारे में नहीं हैं। वे भरोसे के बारे में भी हैं। 

जापान और भारत वैश्विक मुद्दों की एक विस्तृत श्रृंखला पर समान दृष्टिकोण रखते हैं। इस सामंजस्य में चीनी आक्रामकता और अमेरिका की अप्रत्याशितता को लेकर साझा चिंता शामिल है। भारत की सफलता के प्रति जापान की प्रतिबद्धता इजरायल, दक्षिण कोरिया या ताइवान में पाई जाने वाली प्रतिबद्धता के समान है। यह साझा रणनीतिक हित भारतीय कंपनियों के लिए जापानी साझेदारों के साथ गहरे, दीर्घकालिक संबंध बनाने को सुरक्षित बनाता है।

दुनिया भर की असंख्य कंपनियां और सरकारें चीन से अपने संबंधों को कम करने की कोशिश कर रही हैं। जापान के साथ अधिक काम करने में सभी प्रसन्न हैं क्योंकि जापान एक देश के रूप में भरोसेमंद है। भारतीय कंपनियों के लिए जापान के साथ पारंपरिक रणनीतियों के आधार पर काम करते हुए अभी बहुत कुछ करना शेष है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में दोनों ने अच्छा सहयोग दिखाया है। जापानी दिग्गज कंपनियों के कामकाज में व्यापार मॉडल को एकीकृत करना, और भारत में उत्पादन कर विश्व बाजार के लिए बेचना शामिल रहा है। लेकिन हाल के वर्षों की व्यावसायिक गतिविधियों में कई अन्य रास्ते भी दिखाई देते हैं।

जापानी पूंजी का उपयोग कर ऋणशोधन अक्षमता और दिवालिया संहिता (निप्पॉन स्टील और एएम/एनएस) के माध्यम से संकटग्रस्त भारी उद्योग का अधिग्रहण, पूंजी-गहन तकनीकी निवेश (एनटीटी समूह के हाइपरस्केल डेटा केंद्र), और संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से गहन-तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करना (रेनेसास और सीजी पॉवर सेमीकंडक्टर में)। जापानी वित्तीय संस्थान जैसे एमयूएफजी घरेलू भारतीय ऋण बाजारों में सक्रिय रूप से पूंजी लगा रहे हैं। जापान के रणनीति की नई अवधारणा यह है कि जापानी दीर्घकालिक पूंजी और उन्नत बौद्धिक संपत्तियों को भारतीय पैमाने के साथ मिलाकर विश्व बाजार में बेचा जाए। इसमें जापानी बाजार भी शामिल हैं।

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इसे अपनाने में समय, प्रयास और मानसिकता में बदलाव लगेगा। भाषा की बाधा अब कम महत्त्वपूर्ण हो गई है क्योंकि जापानी व्यापारिक अभिजात वर्ग अब कुछ अंग्रेजी बोलता है। हालांकि,व्यवसाय करने के तरीकों में गहरे सांस्कृतिक अंतर हैं। जापान में संबंध दीर्घकालिक विश्वास और धैर्य पर आधारित होते हैं। 

भारतीय व्यावसायिक संस्कृति का हिस्सा बनने वाला कम नैतिक ‘जुगाड़’ जो त्वरित और अनैतिक तरीके से भी जीत हासिल करने का लक्ष्य रखता है, वहां अच्छी तरह काम नहीं करेगा। भारतीय कंपनियों को जापानी व्यापार जगत के साथ जुड़ना सीखने के लिए समय और प्रयास लगाना होगा।अमेरिका में कठिनाइयां और संशोधनवादी शक्तियों द्वारा उत्पन्न जोखिम एक रणनीतिक प्रतिक्रिया की मांग करते हैं। भारतीय कंपनियों को अपनी अंतरराष्ट्रीय कड़ियों को अमेरिका के अलावा अन्य उन्नत पश्चिमी लोकतंत्रों में विविधीकृत करना चाहिए। जापान को प्राथमिकता देना इस नई वास्तविकता का एक तार्किक उत्तर है।

(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)

First Published : May 22, 2026 | 9:26 PM IST