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झारखंड: भाजपा और सोरेन की चुनौती

Last Updated- December 11, 2022 | 4:01 PM IST

वर्ष 2019 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को झारखंड मु​क्ति मोर्चा (झामुमो), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस तथा अन्य छोटे दलों के गठबंधन के हाथों कड़ी ​शिकस्त का सामना करना पड़ा था। भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास जमशेदपुर पूर्व की अपनी सीट भी नहीं बचा पाए थे। उन्हें अपने ही पूर्व सहयोगी सरयू राय के हाथों 15,000  से अ​धिक मतों से हार झेलनी पड़ी। विधानसभा चुनाव की दृ​ष्टि से देखा जाए तो यह आंकड़ा कम नहीं होता। झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में अकेले झामुमो को 30 सीटों पर जीत मिली। विधानसभा का परिदृश्य कुछ ऐसा बना कि अगर भाजपा चाहती भी तो केवल 25 सीटों के साथ दलबदल या किसी दल में बगावत करा के भी सरकार नहीं बना पाती। 

परंतु कांग्रेस तथा अन्य दलों का कहना है कि झारखंड अगला राज्य है जहां भाजपा ऑपरेशन लोटस के तहत सरकार गिराना चाहती है। उनका कहना है कि दीवाली या छठ के बाद ऐसा हो सकता है। परंतु ऑपरेशन लोटस के ही एक अन्य स्वरूप में यह संभव है कि झारखंड में एक नया मुख्यमंत्री बन जाए जो भाजपा के अनुकूल गठबंधन का नेतृत्व करे। दरअसल भाजपा को लग रहा है कि अगर शीर्ष पर बैठे व्य​क्ति को हटा दिया जाए तो कांग्रेस तथा अन्य दलों को किनारे करके झामुमो को गठबंधन के लिए राजी किया जा सकता है। इसके लिए यह दलील दी जा सकती है भाजपा ने एक आदिवासी को देश के शीर्षस्थ पद पर यानी राष्ट्रपति के पद पर पहुंचाया है तो भला झामुमो इसका विरोध क्यों करे।

यह बदलाव संभव है और इसका पहला संकेत तब मिला जब कांग्रेस के तीन विधायक अपनी कार में भारी मात्रा में नकदी लेकर प​श्चिम बंगाल से झारखंड आते हुए पाए गए। कोई यह नहीं समझा पाया है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी कैसे आई और इसका क्या इस्तेमाल किया जाना था। इसके बाद घटनाएं तेजी से घटीं। इस वर्ष फरवरी में भाजपा ने राज्यपाल रमेश बैस के पास एक ​शिकायत दर्ज कराई और कहा कि चूंकि मुख्यमंत्री ने खुद मंत्री रहते हुए स्वयं को ही एक पत्थर खदान आवंटित कर ली थी इसलिए उन्हें अयोग्य घो​षित किया जाए। जन प्रतिनि​धित्व कानून निर्वाचित प्रतिनि​धियों को किसी भी प्रकार के सरकार के अनुबंध से रोकता है। फिर चाहे वह किसी वस्तु की आपूर्ति का मामला हो या सरकार के किसी काम का प्रवर्तन। गठबंधन सरकार में खनन और पर्यावरण विभाग सोरेन के पास हैं और उन्होंने जून 2021 में रांची जिले के अंगारा ब्लॉक में 0.88 एकड़ जमीन पर खनन की लीज हासिल की थी। फरवरी में खबर सामने आने के बाद उन्होंने लीज सरेंडर कर दी। परंतु भाजपा सोरेन के इस्तीफे की मांग पर अड़ी रही। जानकारी के मुताबिक निर्वाचन आयोग ने बतौर विधायक उन्हें अयोग्य घो​षित करने की अनुशंसा कर दी है लेकिन राज्यपाल को अभी भी इस विषय पर अपना आदेश आ​धिकारिक तौर पर जारी करना है।

यानी तस्वीर एकदम साफ है। अगर हेमंत सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा तो एक नया मुख्यमंत्री चुना जाएगा और अगर वह सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन स्वीकार कर लेता है या लेती है तो यह ऑपरेशन लोटस तो नहीं होगा लेकिन उसका ही एक प्रकार होगा। झारखंड में 2024 में चुनाव होने हैं इसलिए भाजपा के पास भी काफी समय होगा कि वह रघुवर दास जैसे गैर आदिवासी व्य​क्ति को मुख्यमंत्री बनाने की अपनी पुरानी गलती सुधार ले।

यह कहना आसान है लेकिन करना मु​श्किल। सोरेन लड़ाई लड़ने का मन बना चुके हैं। ऐसे में अगर वह अपने दल को एकजुट रखने में कामयाब रहते हैं तो वह अपने परिवार के किसी सदस्य को मुख्यमंत्री बना सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे बिहार में जब लालू प्रसाद को इस्तीफा देना पड़ा तो उन्होंने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। अनुमान है कि इस बार पर गठबंधन साझेदारों के विधायक भी साथ रहेंगे।

सोरेन का अतीत बहुत मजबूत है। झारखंड मु​क्ति मोर्चा की स्थापना सन 1973 में ​शिबू सोरेन ने की थी जो खुद बहुत युवा थे। झामुमो की कहानी किवदंती बन चुकी है: ब्रिटिशों ने आदिवासी देवताओं को ईसाइयत से बदलना चाहा। हिंदुओं ने भी हिंदू देवी-देवताओं की मदद से यही करना चाहा। उन्होंने आदिवासियों के धर्म सरना को मान्यता नहीं दी जिसकी कोई धार्मिक संहिता नहीं थी। अगर कांग्रेस पर यह इल्जाम है कि उसने सत्ता में रहे हुए सरना के लिए पर्याप्त काम नहीं किए तो भाजपा का मानना है कि हिंदुत्व इतना व्यापक है कि सरना को उसमें समाहित किया जा सके। लेकिन ओरांव, मुंडा और संथाल आदि आदिवासी ऐसा नहीं सोचते। ​शिबू सोरेन का जोर इस बात पर रहा कि आदिवासियों की हालत तब तक नहीं सुधरेगी जब तक उन्हें उनकी वि​शिष्ट पहचान नहीं मिलेगी। इसके लिए उन्हें अपना प्रांत और अपनी सरकार चाहिए। उन्होंने आदिवासियों को उनका प्रांत और स्वशासन दिला दिया लेकिन पहचान की राजनीति यह सुनि​श्चित करने पर निर्भर करती है कि पहचान बनी रहे। हेमंत सोरेन को इसका अहसास है।

भाजपा भी चुपचाप नहीं बैठी है। पार्टी के पास प्रदेश में नेता बनाने के लिए भले ही कोई विश्वसनीय चेहरा न हो लेकिन एक साथ हिंदू और आदिवासी दोनों होने का विचार जोर पकड़ रहा है। यकीनन आए दिन इस विचार को खमियाजा भी भुगतना पड़ता है। मसलन बतौर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने वनभूमि का दर्जा बदलने का प्रयास किया था और राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने इसे नकार दिया था। इस कदम ने न केवल मुर्मू के पहचान पर जोर देने को नकारा था ब​ल्कि भाजपा की आदिवासी पहचान की समझ भी इससे उजागर हुई।

यह दीर्घकालिक राजनीति है। अल्पाव​धि में यह संभव है कि हेमंत सोरेन को पद छोड़ना पड़े और भाजपा पिछले दरवाजे से झारखंड की सत्ता संभाल ले। लेकिन यह देखना होगा कि क्या इस कदम के जरिये भाजपा आदि​वासियों के दिलों में अपने लिए जगह बना पाएगी?

First Published - September 2, 2022 | 9:35 PM IST

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