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कश्मीर को है एक गेम थ्योरी की जरूरत

Last Updated- December 07, 2022 | 5:05 PM IST

हम पिछले 60 सालों से कश्मीर की वजह से परेशान हैं। हकीकत तो यह है कि यह समस्या पैदा हुई है, उन केवल एक फीसदी कश्मीरी मुस्लिमों की वजह से जो खुद को हिंदुस्तानी नहीं, बल्कि कश्मीरी मानते हैं। इसमें पूरे सूबे के मुसलमान शामिल नहीं हैं।


कश्मीरी मुस्लिमों की कुल तादाद करीब 38 लाख है। इसका एक फीसदी होता है 38 हजार। भारत की कुल आबादी है 1.1 अरब। कश्मीर का कुल क्षेत्रफल है करीब 4550 वर्ग किलोमीटर, जबकि भारत का क्षेत्रफल है 29,73,990 वर्ग किलोमीटर। विंस्टन चर्चिल की नजर से देखें तो इतने थोड़े से लोग इतने बड़े तबके को इतनी बड़ी रकम के लिए बंधक बनाकर नहीं रख सकते।

इस समस्या के सभी कारणों के बारे में लोगों को पता ही है और साथ ही वे इसके हल के बारे में दिए गए मशहूर सुझावों को भी जानते हैं। इन सभी से हासिल कुछ भी नहीं हुआ। लेकिन जब सारी रणनीतियां जब नाकामयाब हो जाएं तो गेम थ्योरी का इस्तेमाल करने में क्या बुराई है। आखिर इसमें दूसरे सारे खिलाड़ियों की रणनीतियों का विश्लेषण किया जाता है।

साथ ही, इससे एक अलग तरह का हल निकालने में मदद मिलती है। हालांकि इसमें कुछ रिस्क हैं, लेकिन बिना जोखिम के तो कुछ भी हासिल नहीं हो पाता है। इस तर्ज पर इस लेख में मैं एक अलग तरह का हल पेश कर रहा हूं। पहली बात तो यह हमें समझनी चाहिए कि कश्मीर समस्या कोई तीन लोगों से जुड़ा हुआ मामला नहीं है, जिसमें एक पक्ष भारत है तो दूसरे और तीसरे पक्ष के रूप में पाकिस्तान और वे एक फीसदी कश्मीरी मुस्लिम हैं।

न ही यह एक ऐसा मामला है, जिसमें हुर्रियत, जेकेएलएफ और दूसरे छोटे-छोटे खिलाड़ी शामिल हैं। असल में यह दो पक्षों का एक ऐसा ‘खेल’ है, जिसमें एक पक्ष भारत है, तो दूसरा वे जो हमारे खिलाफ हैं। अगर कश्मीर समस्या हल हो गई तो इससे हमें ही फायदा होगा, जबकि ऐसा नहीं होने पर हमारे विरोधियों को फायदा होगा। इस लाइन पर यह ‘खेल’ पिछले 60 सालों से खेला जा रहा है।

अगर यह विवाद हल हो जाता है, तो इससे भारत को होने वाले फायदों के बारे में सभी जानते हैं। राजनीतिक तौर पर हम यह साबित कर देंगे कि ‘दो मजहब, दो मुल्क’ के सिध्दांत सिरे से ही गलत थे। यह काफी अहम है क्योंकि पाकिस्तान से लंबी दुश्मनी के बावजूद हमारे मुल्क में आज की तारीख में भी कम से कम 15 करोड़ मुस्लिम रहते हैं।

रणनीतिक तौर पर कश्मीर से पाकिस्तानी फौज को अपने कदम वापस खींचने पड़ेंगे। इस वजह चीन भी इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर पाएगा। सामाजिक रूप से इस्लाम का सूफी रूप हमारे समाज का हिस्सा बनेगा। हालांकि, इसे हासिल करने में काफी दिक्कतें आ सकती हैं। आर्थिक रूप से हमें कोई फायदा नहीं, बल्कि केवल नुकसान ही होगा।

दूसरी तरफ, अगर हमारे विरोधी जीतते हैं तो इससे वे दो हिस्सों में बंट जाएंगे, सरकार का हिस्सा रही पार्टियां और पार्टी कार्यकर्ता। सरकार का हिस्सा रही पार्टियों में नैशनल कॉफ्रेंस और पीडीपी हैं। पार्टी कार्यकर्ता तो वही हैं, जो बाकी जगहों पर होते हैं, भ्रष्ट। अगर भारत विरोधी तत्व इस खेल में विजयी होते हैं, तो इससे सबसे ज्यादा फायदा कभी सरकार का हिस्सा रहीं पार्टियों को ही होगा।

हालांकि, पार्टी कार्यकर्ताओं को भी फायदा होगा, लेकिन इन पार्टियों से काफी कम। अक्सर यह भी कहा जाता है कि 60 सालों के बाद आज इस खेल में दांव पर कुछ भी नहीं रह गया है। इसका मतलब यह हुआ कि इस मामले का ऐसा हल नहीं निकल सकता जो सबको मंजूर हो। ऐसा इसलिए क्योंकि इस बारे में एक भी पूरी तरह से जबरदस्त रणनीति नहीं है और न ही इसका कोई नतीजा निकल सकता है। अगर जॉन नैश के शब्दों में कहें तो किसी भी समाधान के लिए समस्या का होना जरूरी है।

साथ ही, जिस खेल में दांव पर कुछ भी नहीं लगा होता, उसमें किसी तरह की कोई प्रतिस्पध्र्दा नहीं होती है। इसलिए कश्मीर के इस ‘खेल’ में प्रतिस्पध्र्दा और सहयोग का होना बेहद जरूरी है। हम इस बात को कश्मीर में साफ तौर पर देख सकते हैं। यहां दोनों पक्षों के कई मकसद एक दूसरे मेल खाते हैं, तो कई एक-दूसरे सख्त खिलाफ हैं। साथ ही, दोनों पक्षों के दिल में धोखे का डर भी है। आखिर दोनों पक्ष धोखा खा भी तो चुके हैं।

गेम थ्योरी से परिचित लोगों को इसका इस्तेमाल मशहूर ‘बैटल ऑफ दी सेक्सेज’ में याद होगा, जिसमें एक शादीशुदा जोड़ा बाहर घूमने जाना चाहता है। पति क्रिकेट मैच देखने जाना चाहता है, तो पत्नी की इच्छा भजन सम्मेलन में जाने की है। दोनों साथ भी रहना चाहते हैं, इसलिए दोनों कोई एक ही जगह जा सकते हैं। यही कश्मीर में भी हो रहा है। इस खेल में हर खिलाड़ी के सामने दो रणनीतियां हैं, या तो वे एक दूसरे से बातचीत कर सकते हैं या फिर भी वे चुपचाप रह सकते हैं।

अक्सर माना जाता है कि चुपचाप रहने से अच्छा बातचीत करना होता है। इसलिए कश्मीर मुद्दे पर भी बातचीत पर जोर दिया जाता है, लेकिन कुछ मामलों में चुपचाप रहना ज्यादा अच्छा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप बात नहीं करते तो कोई आपको धमकी भी नहीं दे सकता है। चीन ने अराजक तत्वों के खिलाफ इसी नीति को अपनाया है। यहां तक कि अमेरिका और ब्रिटेन ने भी आतंकवादी तत्वों के खिलाफ यही रणनीति अपना रखी है। यकीन मानिये, यह नीति जबरदस्त तरीके से काम करती है।

भारत के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि उदारवादियों की आवाज को दरकिनार करते हुए कभी सरकार का हिस्सा रहीं कश्मीरी पार्टियों से सारे संबंध खत्म कर लेने चाहिए। साथ ही, घाटी को भेजी जा रही सारी मदद इसी वक्त खत्म कर देने चाहिए क्योंकि इसे जनता का भला होने के बजाए उन पार्टियों की जेबें गरम होती हैं। इस मदद के बूते पर तो वे इस खेल में बनी हुई हैं। लेकिन अगर खेल में एक पक्ष खेल से अलग हो जाता है, तो दूसरे पक्ष के विलेन खुद ब खुद हार जाते हैं।

बच्चे भी जब क्रिकेट में लड़ते हैं तो अक्सर जिस बच्चे के हाथ में गेंद होती है, तो वह खेल छोड़ भाग जाता है। अंत में इससे सबका भला होता है क्योंकि इससे बातचीत की गुंजाइश बढ़ जाती है और एक निश्चित हल निकल जाता है। कश्मीर में भी यही करने की जरूरत है। कुछ लोगों की नजर में यह बचकानी बात होगी। माना, लेकिन वोहरा साहब, जब कोई दूसरी रणनीतियां रंग नहीं ला रही हैं, तो इसे आजमाने में क्या बुराई है? आखिर बिना जोखिम तो कुछ भी हासिल नहीं होता।

First Published - August 18, 2008 | 2:49 AM IST

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