आसमान छूती महंगाई पर काबू पाने की कवायद तो अक्टूबर, 2004 से ही चल रही है, जब मौद्रिक नीति को सख्त बनाने की शुरुआत हुई थी।
फिर भी महंगाई है कि कुछ सुनने के लिए ही तैयार नहीं है। इसलिए तो मौद्रिक नीति को और भी सख्त बनाने की मांग की जा रही है। साथ ही, किसी और से पहले महंगाई के रावण को साधने पर भी बेहद जोर दिया जा रहा है। ऊपर से, रुपये की मजबूती पर भी लगाम कसने की बात चल रही है।
इसके अलावा, ब्याज दरों को भी बढाने की मांग की जा रही है। दरअसल, इस बात की चर्चा जोरों पर है कि ऊंची विकास दर के लिए महंगाई का कम रहना काफी जरूरी है। इसलिए तो ब्याज दरों पर को और बढ़ाने की बात चल रही है। असल में, कम ब्याज दर बचत को कम करने का काम करती है। इस वजह से मांग बढ़ती है और आखिरकार महंगाई भी बढ़ती है।
हालांकि, किसी ने भारत में ब्याज दरों और राष्ट्रीय बचत के बीच संबंधों पर ज्यादा विश्लेषण नहीं पढ़ा होगा। दूसरी तरफ, मुझे एक बैंक की अंदरुनी शोध रिपोर्ट की याद भी आ रही है, जिसमें यह कहा गया था कि बैंक में जमा पैसों का बाजार में चल रही ब्याज दरों से काफी कम वास्ता होता है। ऊंची विकास दर के लिए महंगाई दर का कम रहना सही है, यह कहना लंबे समय के लिए ठीक होगा।
लेकिन मौद्रिक नीति को सख्त करके हम अपनी अर्थव्यवस्था की विकास की दर ही कम करने का काम कर रहे हैं। खुद रिजर्व बैंक की मुद्रा एवं वित्त रिपोर्ट (2001-02) का कहना है कि, ‘सैक्रिफाइस रेश्यो या त्याग अनुपात से उत्पादन पर होने वाले उल्टे असर को मापा जाता है। मतलब, इससे देश में होने वाली कुल कमी को मापा जाता है। एक अनुमान के मुताबिक मुल्क में त्याग अनुपात अभी दो फीसदी का है।’
इसका मतलब यह है कि मुल्क में महंगाई की दर को एक फीसदी कम करने के लिए करीब एक लाख करोड़ के कुल उत्पादन को कम करना होता है। इस मतलब शायद महंगाई दर में केवल फीसदी की कम करने के लिए हमें 6000 रुपये प्रति माह की तनख्वाह वाले करीब 50 लाख नौकरियों की कुर्बानी देनी पडेग़ी। याद रखिए कि मुल्क की 75 फीसदी आबादी ऐसी है, जो दिन में दो डॉलर (करीब 90 रुपये) से भी कम कमाती है।
इस कैटेगरी में 3 से 4 सदस्यों वाले ऐसे परिवार शामिल हैं, जिनकी महीने की कमाई मुश्किल से 2500 से 3000 रुपये प्रति माह है। कभी-कभी मुझे काफी ताज्जुब होता है कि क्या पिरामिड के निचले स्तर पर रहने वाले इन लोगों के लिए महंगाई दर में 2 फीसदी की गिरावट ज्यादा मायने रखती है या फिर ऐसी नौकरी जो उनके वेतन को बढ़ाकर दुगना कर दे। हमें विकास की अहमियत को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जैसा कि मार्टिन वुल्फ ने चार जून को फाइनैंशियल टाइम्स में छपे अपने लेख में कहा है कि, यह सबकुछ तो नहीं, लेकिन सबकुछ की बुनियाद जरूर है। एक ऐसे वक्त में जब महंगाई को बढ़ाने वाली वजहें की लगाम थामने में मौद्रिक नीतियां नाकामयाब साबित हो रही हों और जब अर्थव्यवस्था पहले ही काफी मुसीबतों में घिरे होने की वजह से धीमी हो रही हो, तब ब्याज दरों को बढ़ाने की चाहत और ज्यादा कमाई देने वाली नौकरियों के सृजन के बीच एक तरह की तारतम्यता या बैलेंस को बनाने की जरूरत है।
जहां तक हमारी राजनैतिक प्राथमिकताओं और प्रशासन की बात है, मैं मिसाल के तौर पर राजस्थान के गुर्जर आंदोलन की बात छेड़ना चाहूंगा। इसकी वजह से हफ्तों दिल्ली और मुंबई के बीच सड़क और रेल यातायात बाधित रहा और कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। यह अपने-आप में काफी अजीब बात है क्योंकि यहां लोग-बाग खुद को ‘पिछड़ा’ साबित करने के लिए मरने-मारने पर उतारू हैं।
यह इस बात का भी नमूना है कि कैसे जाति पर आधारित राजनीति हमारे मूल्यों को खोखला करने में जुटी हुई है। अगर हम जाति और धर्म के नाम पर दिए जाने वाले खास आरक्षण की भी बात करें, तो यह निचले हिस्से की तरफ जाने की होड़ को ही हवा देते हैं। इसमें लोगों में नफरत फैलती है और लोग-बाग खुद को दूसरों से अलग साबित करने लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। हालांकि, इसमें फायदा भी उन वर्गों के इने-गिने लोगों को ही मिलते हैं।
ऊपर से जातियों को अलग करने से कई अलग-अलग जातियों को एक साथ मिलकर देखने से एक अलग मुसीबत पैदा हो जाती है। असल में हर जाति या समुदाय दूसरे से काफी हद तक अलग होता है। अगर इस हिस्से से देखें तो असम में बंगालियों के खिलाफ ‘अमरा बंगाली’ अभियान, महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों का विरोध और नरेंद्र मोदी का गुजरात से मिले टैक्स को गुजरात में ही खर्च करने की हालिया मांग जाति गत राजनीति के ही कुछ नमूने हैं, जिनमें आरक्षण घी का काम करती है।
हमारे संविधान को बनाने वालों ने ही काफी सोच-समझ कर जातिगत आरक्षण को केवल 10 सालों के लिए लागू करने की बात की थी। यह इस बात के लिए सही समय है, जब हमें शिक्षा और नौकरी में आरक्षण जाति या धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर दी जानी चाहिए। लेकिन यह अपने देश पर राज करने वाली एक ऐसी सरकार के लिए कुछ ज्यादा ही बड़ी मांग हो जाएगी, जो 1990 के दशक में किए सुधारों या उन सुधारों की वजह आए विकास और अमीरी का श्रेय भी नहीं लेना चाहती।
एक ऐसी सरकार जो परमाणु डील को मुल्क के भविष्य के लिए बहुत अहम बता रही है, लेकिन उस अमली जामा पहनाने में शिद्दत नहीं दिखाना चाहती। गुर्जर आंदोलन की कामयाबी से लोगों को इस बात का भरोसा जरूर हो जाएगा कि हिंसा अपना कमाल जरूर दिखाती है। उन्हें इस बात का इल्म जरूर हो जाएगी कि अर्थव्यवस्था को बंदी बनाकर अपने छोटे-छोटे मंसूबों को पूरा कर सकते हैं। मैं फिर वहीं खड़ा हूं, जहां से मैंने शुरुआत की थी। क्या अंदोलन या वामदलों के बंद कोई समस्या हल होती है?
उनसे और कुछ नहीं, बल्कि महंगाई की आग को ही हवा मिलती है। ऊपर से, निवेशों को लुभाने के लिए ‘अतुल्य भारत’ के लिए वह शायद चेहरे बन सकते हैं। हालांकि, इस महंगाई का एक खुशनुमा पहलू भी है। बुआई का मौसम आ गया है और खेती के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं।
हम भले ही जॉर्ज बुश को कितनी भी गालियां दे दें, लेकिन हकीकत तो यही है कि खेतिहर मजदूरों की कमी यही बताती है कि उन्हें ज्यादा कमाई वाली दूसरी नौकरियां मिल रही हैं। महंगाई अगर गरीबों की कमाई बढ़ने की वजह से आई है, तो हमें इसका रंज नहीं होना चाहिए।