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मनोरंजन जगत में आ रहे खतरों के खिलाड़ी

Last Updated- December 07, 2022 | 6:03 PM IST

हिंदी मनोरंजन चैनलों की फौज में कलर्स ने बड़े दमदार तरीके से कदम रखा है और आते ही वह तीसरे पायदान पर कब्जा जमाने में सफल रहा है।


भले ही एनडीटीवी इमैजिन और 9एक्स इस श्रेणी में कुछ बड़े नाम हैं लेकिन कलर्स ने लॉन्च के दूसरे हफ्ते में 116 अंकों की रेटिंग हासिल की है जो शुरुआत में ही किसी की झोली में नहीं जा पाई थी। हालांकि अभी तो सिर्फ पर्दा उठा है और पूरा ड्रामा खत्म होने में अभी समय लगेगा।

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि तीसरे पायदान के लिए जंग इतनी आसानी से खत्म नहीं होगी। कलर्स ने दमदार तरीके से कदम तो रखा है पर एक बात जो उसके पक्ष में नहीं जाती, वह यह है कि अब वे दिन गए जब कोई चैनल एक ही पायदान पर लंबे समय तक टिक पाता था।

हां यह जरूर है कि स्टार प्लस के रिकॉर्ड को तोड़ पाना कुछ मुश्किल होगा क्योंकि वह लंबे समय तक नंबर एक की कुर्सी पर कब्जा जमाने में कामयाब रहा था। एक समय (2006 के अंत में) जी ने काफी कोशिश की थी कि वह स्टार की कुर्सी के करीब पहुंच सके पर वह उससे महज 20 जीआरपी से पीछे रह गया और नंबर 1 के स्थान को हासिल नहीं कर सका।

तब से नंबर एक और दो के बीच की दूरी लगातार बढ़ती ही गई है और अब तो यह दूरी बढ़कर 120 जीआरपी तक पहुंच गई है। लोगों में जी चैनल को लेकर पहले जितना उत्साह था अब नहीं रह गया है और यही वजह है कि प्राइम टाइम स्लॉट में दर्शक अब इस चैनल को देखना पसंद नहीं कर रहे हैं।

पिछले सात महीनों में प्राइम टाइम के दौरान जी की रेटिंग 30 फीसदी गिर गई है और वह समय दूर नहीं जब कोई दूसरा चैनल जी को नंबर दो की कुर्सी से उखाड़ फेंके। सालों तक क्षेत्रीय इलाकों में सबसे ऊपर रहने के बाद अब जी यहां भी अपनी पकड़ खोता जा रहा है। उदाहरण के लिए ईटीवी बांग्ला ने जी बांग्ला को पीछे छोड़ दिया है।

इन दिनों सामान्य मनोरंजन चैनलों में जितनी हलचल है शायद उतनी हलचल किसी और चैनल की दुनिया में नहीं है। एक तिहाई दर्शक और विज्ञापन का राजस्व भी इन्हीं चैनलों की ओर आकर्षित होता है तो ऐसे में अगर उम्मीद की जाए कि बाजार के विशेषज्ञों की ओर से भी इस ओर कुछ विशेष ध्यान दिया जाए तो यह गलत नहीं होगा। पर ऐसी उम्मीद ही की जा रही है और इस दिशा में खास कुछ कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

पिछले साल नवंबर 2007 में 9एक्स लॉन्च किया गया था और तब से लेकर अब तक मनोरंजन चैनल देखने वाले दर्शकों की संख्या लगभग 26 फीसदी बढ़ी है, पर फिर भी मीडिया खरीदार माइन्डशेयर का कहना है कि साल 2008 के पहले छह महीनों में मनोरंजन चैनलों पर विज्ञापन राजस्व धीमी गति से बढ़ा है। साल 2007 की इसी अवधि में विज्ञापनों के जरिए कमाई इससे कहीं अधिक थी।

माइन्डशेयर का कहना है कि हैवेल्स या फिर क्रिकेट का प्रायोजन करने वाला सिटीबैंक कुछ ऐसे विज्ञापनदाताओं में शुमार है जो पहली बार इन चैनलों पर विज्ञापन दे रहा है तो ऐसे में विज्ञापनों के जरिए होने वाली कमाई तो 14 से 15 फीसदी की दर से बढ़नी चाहिए। पर पिछले कुछ सालों में महज 12 फीसदी की दर से विकास होने से अंदाजा लगाया जाता है कि शायद ये चैनल अब भी विज्ञापनदाताओं को अपनी ओर खींच पाने में सफल नहीं हो पाए हैं।

पर जिस हिसाब से विज्ञापन कंपनियों ने आईपीएल के 20-20 मैचों के दौरान जम कर पैसा बहाया है तो समझा जा सकता है कि दूसरे चैनलों पर दिए जाने वाले विज्ञापनों पर इसका असर पड़ना तय था। मनोरंजन चैनल भी इससे अछूते नहीं रह सकते हैं। माइन्डशेयर के अनुसार जुलाई महीने में भी मनोरंजन चैनलों ने विज्ञापन के जरिए कुछ खास कमाई नहीं की होगी।

आईपीएल की अपार सफलता को देखते हुए तय है कि ज्यादा से ज्यादा कंपनियां अब अपने विज्ञापन के खर्चे का एक बड़ा हिस्सा अगले साल क्रिकेट पर लगाएंगी। पर ऐसा नहीं है कि मनोरंजन चैनलों के लिए जितनी समस्याएं हैं वह आईपीएल ने ही खड़ी की हैं।

भले ही 9एक्स और एनडीटीवी इमैजिन और अब कलर्स ने नए नए कार्यक्रमों को शामिल कर विभिन्नता लाने की कोशिश की है और कुछ दर्शक इन चैनलों की ओर खिंचे भी होंगे, पर युवा वर्ग, शिक्षित वर्ग और पश्चिमी लिबास ओढ़े कोई भी दर्शक अब इन मनोरंजन चैनलों के कार्यक्रम से अलग हटकर कुछ पाने की इच्छा रखता है। अब उन्हें कुछ नए प्रयोग और नए विषयों की जरूरत है।

आपको याद होगा कि कितनी तेजी से आईनेक्स का महाभारत प्रमुख 100 कार्यक्रमों की सूची से बाहर हो गया था और शाहरुख खान की मेजबानी वाला कार्यक्रम पांचवी पास भी टीवी चैनल पर फेल हो गया था। आज की युवा पीढ़ी को बाजार ने लक्ष्य बनाकर रखा है और उसे कार्यक्रमों में विभिन्नता की चाहत है। अगर कार्यक्रम उसकी पसंद का नहीं हो तो वह रिमोट से उस चैनल को बदलने में भी देरी नहीं करता है।

आज भले ही कलर्स ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है और दर्शकों ने उस पर ध्यान देना भी शुरू कर दिया है पर यह भूलना नहीं चाहिए कि कलर्स को जो जगह मिली है उसका खामियाजा सोनी, जी या फिर 9एक्स में से किसी एक को तो जरूर उठाना पड़ेगा क्योंकि इस दुनिया में एक साथ 9 या 10 खिलाड़ियों के लिए तो जगह नहीं है। क्रिसिल के एक अनुमान के मुताबिक एक औसत दर्शक एक दिन में बस 112 मिनट ही टीवी पर कार्यक्रम देखता है, यानी उसने टीवी के सामने बैठना कम कर दिया है।

और वह दिन भी दूर नहीं है जब किसी युवा का सारा खाली समय इंटरनेट या मोबाइल फोन के आगे ही बीता करेगा और उसके पास टीवी के लिए कोई समय नहीं बचेगा। जिस तरह से टीवी चैनलों के लिए जीआरपी घट रही है ठीक उसी तरीके से टीवी कार्यक्रमों की रेटिंग भी कम होती जा रही है। साल 2005 में जहां स्टार के सबसे पसंदीदा कार्यक्रम को 14 से 16 टीआरपी मिलती थी वहीं अब ऐसे कार्यक्रम को महज 4 से 5 टीआरपी ही मिल पा रही है।

इधर, स्टार टीवी की विज्ञापन की दरें भी 30 फीसदी तक कम हो गई हैं। 2003 से 2007 के बीच चैनलों ने जितने दर्शक खोए हैं उनसे कहीं अधिक विज्ञापनों के जरिए उनकी कमाई कम हुई है। इन चैनलों की विज्ञापनों में हिस्सेदारी इस दौरान 53 फीसदी से घटकर 35 फीसदी हो गई है।

ऐसा अनुमान है कि 2010 तक प्रसारकों की झोली में राजस्व के जरिए 10,000 करोड़ रुपये आएंगे और अगर भाग्य उनका साथ देता है तो सब्सक्रिप्शन के जरिए उन्हें अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपये की कमाई होगी। पर इतनी कमाई ही पर्याप्त नहीं हो सकती क्योंकि इन चैनलों का 80 फीसदी खर्च कंटेंट और कर्मचारियों पर होता है और इस वजह से चाहें भी तो इसे जल्दी कम नहीं किया जा सकता।

वहीं दूसरी ओर इस उद्योग के लिए कैरेज फीस तेज गति से बढ़ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक फिलहाल यह 1,000 करोड़ रुपये का होगा। आने वाले कुछ सालों में काफी पैसा टेलीविजन क्षेत्र में लगाए जाने का अनुमान है।

माना जा रहा है कि कुछ सालों में टीवी की दुनिया में 8 से 10 अरब डॉलर का निवेश किया जाएगा जिसमें से 2 अरब डॉलर का निवेश तो अकेले प्रसारण के क्षेत्र में किया जाएगा। पर उसके बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि इस क्षेत्र का कारोबारी गणित सुधरा है या इसके सुधरने की गारंटी है।

First Published - August 21, 2008 | 10:38 PM IST

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