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फिर से मचाई कोसी ने तबाही

Last Updated- December 07, 2022 | 6:49 PM IST

बाढ़ को अक्सर प्राकृतिक आपदा के तौर पर देखा जाता है, पर हकीकत में इंसान प्राकृतिक संसाधनों के साथ जो खिलवाड़ करता है यह उसका ही नतीजा होता है।


उत्तरी बिहार में कोसी नदी ने जो तबाही मचाई है यह मनुष्य के प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही एक उदाहरण है। पूर्वी बांध में जो दरार आई है उसका ही परिणाम है कि नदी ने पूर्व की ओर रुख कर लिया है और इस तरह करीब 20 लाख लोगों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

बाढ़ की वजह दरअसल यह है कि 1985 से ही नदी के बांधों पर मिट्टी जमा होने से भारी दबाव पड़ रहा था। जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी के जमाव को रोकने के बजाय अधिकारी हर साल बांध को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं। अब जब कि यह विकट स्थिति सामने आ चुकी है तो इंजीनियर तमाम कोशिशें कर के भी दरारों को बंद नहीं कर पा रहे हैं।

यह दरार पहले ही 3 किमी की हो चुकी है और रोजाना 200 मीटर बढ़ती जा रही है। अगर यह इसी तेजी के साथ बढ़ती गई और महज 12 किमी की दूरी पर भीमनगर बैराज के पास पहुंच गई तो सुपौल, सहरसा, अररिया, मधेपुरा, कटिहार और पूर्णिया जैसी घनी आबादी वाले इलाके पूरी तरह से डूब जाएंगे।

इस हादसे की आशंका इसलिए भी है क्योंकि भीमनगर बैराज को 1956 में भारत ने बनाया था और उस समय यह अनुमान लगाया गया था कि यह बैराज 30 साल तक टिकेगा। इस अवधि को 22 साल बीत चुके हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बैराज अब किस हालत में होगा।

कोसी ने इस दफे कितनी तबाही मचाई है इसे लेकर उतनी चिंता नहीं है, जितनी चिंता इस बात की है कि कोसी ने अपना रास्ता बदल लिया है। पहले भी यह नदी अपनी दिशा को बदल कर पश्चिम की ओर रुख कर चुकी है, पर इस दफा पूर्व की ओर रास्ता बदलने से उन इलाकों पर खतरा मंडरा रहा है जो बाढ़ के खतरे से मुक्त माने जाते हैं।

और इस बार कोसी तीव्र प्रवाह के साथ गंगा की ओर बह रही है जो केवल 100 किमी की दूरी पर है। बड़े दुख की बात है कि नेपाल-बिहार की सीमा क्षेत्र में अगर  मरम्मत का काम किया जाता है तो इन दोनों देशों के बीच की अस्पष्ट भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी आड़े आती हैं। 18 अगस्त को जब बांध में दरार आई तो केंद्र सरकार को नेपाली अधिकारियों के साथ स्थानीय लोगों की सुरक्षा और बचाव के बारे में चर्चा करने में इतनी देर हुई, यह भी अफसोस की बात है।

कोसी आपदा को बेहतर होगा कि एक चेतावनी के तौर पर समझा जाए। यह सिर्फ कोसी के साथ ही नहीं है बल्कि तमाम भारतीय नदियों के तट पर मिट्टी का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में बांधों की जल को बांधे रखने की क्षमता घटती जा रही है।

ऐसे में अगर जलस्तर थोड़ा सा भी ऊपर जाता है तो बाढ़ का खतरा बढ़ने लगता है। इसके साथ ही यह समझना भी जरूरी होगा कि जिस रफ्तार के साथ जनसंख्या बढ़ रही है उसने लोगों को मजबूर कर दिया है कि वह उन क्षेत्रों में भी घर बसाएं जहां बाढ़ का खतरा सबसे अधिक है।

ऐसे में अगर बाढ़ आती है तो सबसे ज्यादा नुकसान होने का खतरा रहता है। हर साल मॉनसून के दौरान जलस्तर बढ़ने से देश में भारी तबाही मचती है। इससे बचने के लिए जरूरी है एक दूरगामी नीति तैयार की जाए। अगर ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में भी कोसी जैसी आपदा से बचा नहीं जा सकेगा।

First Published - August 27, 2008 | 10:29 PM IST

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