इस हकीकत से सभी लोग वाकिफ हैं कि देश के न्यायालयों में फैसले आने में वर्षों लग जाते हैं। कभी-कभी तो इतनी देर हो जाती है कि फैसले का मतलब ही नहीं रह जाता।
यही कारण है कि 2002 में नागरिक प्रक्रिया संहिता में एक संशोधन किया गया, जिसमें प्रावधान है कि किसी भी मामले की सुनवाई 1 साल में पूरी कर ली जानी चाहिए। दुखद पहलू यह है कि इस मामले में न्यायाधीशों को फैसला देने की समयसीमा का निर्धारण नहीं किया गया है।
उपभोक्ता न्यायालय के मामले में फैसला दिए जाने की अवधि 6 महीने निर्धारित की गई है और टेलीकॉम विभाग के टीडीसैट जैसे विशेष न्यायालयों में धारा 14ए (6) के मुताबिक समयसीमा 90 दिन है। कितना दुखद है कि ऐसा नियम होने के बावजूद टीडीसैट, सुनवाई के लिए मामलों की पहचान में ही देरी कर रहा है। हम यहां एक विशेष मामले की बात कर रहे हैं।
यह रिलायंस कम्युनिकेशंस का मामला है जिसमें इसके सीडीएमए मोबाइल लाइसेंस के लिए नए स्पेक्ट्रम दिए जाने की बात है, जिससे जीएसएम मोबाइल सेवाएं शुरू की जा सकें। सरकारी फैसले के विरुध्द टीडीसैट में याचिका दायर किए हुए 9 महीने बीत चुके हैं। इस मामले की सुनवाई पूरी नहीं हुई है, जबकि रिलायंस किसी दिन सेवाएं शुरू करने को तैयार है।
इसलिए अब अगर न्यायाधिकरण यह कहता है कि सरकार की नीतियां गलत हैं, तो भी उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। पिछली बार भी जब रिलायंस ने सीडीएमए मोबाइल सेवाएं शुरू करने का प्रस्ताव किया था, जिसके विरुध्द चुनौती दी गई थी, रिलायंस के खिलाफ टीडीसैट का फैसला बहुत देर में आया। कंपनी ने यह सेवा बहुत पहले शुरू कर दी थी।
सरकार ने तर्क दिया कि रिलायंस के अब इतने उपभोक्ता हो चुके हैं कि उसे सेवाएं बंद करने को नहीं कहा जा सकता। इसका परिणाम यह हुआ कि 2002 में इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए नया लाइसेंस जारी किया गया। पिछले अक्टूबर महीने में सरकार ने फैसला किया कि आवेदकों की एक नई कोटि बनाई जाए, जिसमें स्पेक्ट्रम के लिए क्रॉसओवर तकनीक हो।
इससे रिलायंस को जीएसएम सेवा शुरू करने के लिए स्पेक्ट्रम के लिए कतार लगाने की जगह पर प्राथमिकता मिल जाती, लेकिन सरकार ने नीति की घोषणा तब की जब रिलायंस ने पैसे जमा कर दिए थे। इस तरह के पक्षपातपूर्ण रवैये के खिलाफ सेल्युलर आपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने टीडीसैट में यह कहते हुए याचिका दायर की कि नई नीति गैर कानूनी है।
इस पर टीडीसैट ने स्थगनादेश दे दिया, लेकिन कुछ महीने बाद इसे हटा लिया गया। इससे दुखी टीडीसैट ने स्थगनादेश के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय की राह पकड़ी। मामले की सुनवाई हुई लेकिन अभी भी यह लंबित है। बहरहाल टीडीसैट ने मामले की सुनवाई शुरू की और 29 जुलाई को कहा कि सरकारी वकील इस मामले में शपथपत्र दाखिल करें। मामले को अगली सुनवाई के लिए 19 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया गया।
टीडीसैट एक्ट के तहत निर्धारित समय सीमा से अधिक मामले को 9 महीने पूरे हो गए तो ट्राई ने अपीली न्यायाधिकरण के रूप में काम करते हुए रोज सुनवाई करते मामले को 30 दिन में निपटाने का फैसला किया। टीडीसैट की बनावट भी उतनी ही दिलचस्प है। पिछले साल नए जीएसएम मोबाइल लाइसेंस के ग्राहकों से संपर्क करने की प्रक्रिया में एक सवाल पूछा गया था।
इसमें ट्राई ने क्रॉस ओवर तकनीक के बारे में जानना चाहा था कि क्या सीडीएमए मोबाइल का संचालन करने वालों को उसी लाइसेंस पर जीएसएम मोबाइल के लिए स्पेक्ट्रम दिया जा सकता है- और यही वह मुद्दा है जिसे बाद में टीडीसैट में चुनौती दी गई। इस मामले पर राय देने वालों में से एक थे जीडी गैहा, जो सरकारी कंपनी टेलीकम्युनिकेशंस कंसल्टेंट इंडिया लिमिटेड के पूर्व सीएमडी हैं।
गैहा ने कहा कि इसको अनुमति मिलनी चाहिए, यह भी कहा कि इसके लिए कानूनी अनुमति भी है। इसके बाद एक अन्य सवाल (सवाल नं 17) के जवाब में उन्होंने कहा क्रॉस ओवर तकनीक के तहत जब स्पेक्ट्रम का आवंटन होगा तो पहले से काम कर रहे लोगों को नए खिलाड़ियों की तुलना में प्राथमिकता मिल जाएगी।
सीडीएमए मोबाइल कंपनियों को जीएसएम मोबाइल सेवा के लिए स्पेक्ट्रम प्राप्त करने के बारे में सीओएआई की अपील पर टीडीसैट को ही फैसला करना है कि गैहा कितने सही हैं। लेकिन जब टीडीसैट के एक सदस्य गैहा ने पहले ही सीओएआई के खिलाफ अपनी राय सार्वजनिक रूप से जाहिर कर दी है तो इस मामले में कितनी संभावना बनती है?
बहरहाल इसके पहले टीडीसैट के सामने आए इस तरह के मामलों में जब सरकार के साथ राजस्व के बारे में नियम बनाए गए थे, उसमें वैश अपना बचाव करते हुए कहते हैं कि उन्होंने इसके बारे में अपनी राय तभी दे दी थी जब वे टेलीकॉम सचिव थे। टीडीसैट इस जद्दोजहद में जुटा है कि इस मसले से कैसे निपटा जाए जो हाल ही में उठाया गया है वहीं ट्राई और सरकार के गुत्थमगुत्था की कुछ और ही वजह है।
कोटक इंस्टीटयूशनल इक्विटीज रिसर्च के पिछले महीने की रिपोर्ट में कहा गया है कि रिलायंस कम्युनिकेशंस के राजस्व में मार्च 2008 की तिमाही में 26 प्रतिशत की कमी आई है, जैसा कि कंपनी ने अपने शेयरधारकों को दिए गए फाइनैंशियल स्टेटमेंट में कहा है। दिसंबर 2006 को यह अंतर 4 प्रतिशत था। अन्य प्रतिस्पर्धियों के लाइसेंस शुल्क में बढ़ोतरी हुई वहीं रिलायंस को भारी घाटा उठाना पड़ा।
रिलायंस कम्युनिकेशंस के प्रवक्ता ने तर्क दिया कि ऐसा इसलिए हुआ कि ट्राई विभिन्न राजस्वों जैसे मोबाइल इंटरनेट बिजनेस या ग्रामीण फोनों के मामले को अलग अलग नहीं करता, वहीं कोटक की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के भारी अंतर को बताने के लिए कोई महत्त्वपूर्ण तर्क नहीं है। बहरहाल कोटक का पक्ष या रिलायंस का पक्ष अलग है। सरकार और ट्राई को चाहिए कि मामले की जांच करे और आम लोगों के हित को देखते हुए स्थिति को स्पष्ट करे।