facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

पास हो चुका है कानून, पर अब भी कायम है भ्रम

Last Updated- December 07, 2022 | 7:48 PM IST

यूं तो संसद कई कानून पारित करता है पर उन्हें लागू करने के लिए कई बार अधिसूचना जारी नहीं की जाती है और इसके पीछे कई वजहें होती हैं जैसे कुछ समूहों की ओर से दबाव, परिस्थितियों में बदलाव, कोई राजनीतिक कारण या महज लापरवाही।


पर कानून को लागू करने के लिए अधिसूचना जारी नहीं किए जाने से जितनी समस्याएं होती हैं, उतनी ही समस्याएं तब होती हैं जब कानून में शामिल प्रावधानों को एक साथ अधिसूचित नहीं किया जाता है बल्कि उनको टुकड़ों टुकड़ों में अधिसूचित किया जाता है।

सभी प्रावधान अधिसूचित नहीं किए जाने की स्थिति में लोगों में भ्रम उत्पन्न होता है जो कानून लागू नहीं होने से प्रभावित होते हैं। इसी तरह अदालतों के साथ भी इसी तरह की समस्या आती है क्योंकि उन्हें कानून की व्याख्या करनी होती है। हाल के वर्षों में पेटेंट कानून में जो संशोधन किए गए हैं, वे इसी के उदाहरण हैं।

जे मित्रा ऐंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाम असिस्टेंट कंट्रोलर ऑफ पेटेंट्स ऐंड डिजाइंस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को कुछ ऐसी ही समस्या से रू-ब-रू होना पड़ा। सुनवाई में कहा गया, ‘पेटेंट (संशोधन) कानून 2005 को टुकड़ों में लागू करने में हुई देरी से जो भ्रम की स्थिति पैदा हुई यह उसका अनोखा उदाहरण है।’

वर्ष 1999 और 2002 में संशोधन के जरिए पेटेंट कानून में बदलाव किया गया था। पर कुछ धाराओं को अधिसूचित नहीं किया गया और कुछ को आगे के संशोधनों के लिए छोड़ दिया गया था जिससे कि भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी।

अगर किसी एक कानून के अलग अलग हिस्सों को लागू करने के लिए अलग अलग तारीखें तय की जाती हैं तो कुछ ऐसा ही होता है और तब सरकार भी कानून के कुछ हिस्सों को लागू करवाने के लिए दबाव नहीं डाल पाती है। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में फैसला सुनाने के पहले बताया कि ऐसे मामलों में अदालत के सामने दुविधा की स्थिति होती है।

इसमें कहा गया, ‘कई बार किसी कानून को लागू करने की तारीख किसी तय समय के लिए टाल दी जाती है और कई बार ऐसा होता है कि खुद सरकार अधिसूचना जारी कर कानून को लागू करने के लिए आगे की कोई तारीख तय कर देती है।

कई बार ऐसा प्रावधान भी किया जाता है कि किसी एक ही कानून को हिस्सों में बांटकर उन्हें अलग अलग तारीखों पर लागू किया जाता है। इस मामले में कुछ ऐसा ही देखने को मिला है और इस वजह से उलझन पैदा हो गई है।’

यह विवाद चिकित्सा उपकरण बनाने वाली दो कंपनियां, स्पैन डायगनॉस्टिक्स लिमिटेड और जे मित्रा ऐंड कंपनी के बीच था। जे मित्रा ने 2000 में एक पेटेंट को मंजूरी दिलाने के लिए याचिका दायर की थी। वर्ष 2004 में इसकी अधिसूचना जारी की गई थी। अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनी को पेंटेंट की मंजूरी दिए जाने पर स्पैन डायगनॉस्टिक्स ने आपत्ति जताई।

इस मामले में गतिरोध अब भी जारी है पर अब तक इसे सुलझाया नहीं जा सका है। और इसकी वजह है कि कानून में संशोधन किये जाने के बाद उसे टुकड़ों में लागू किया गया जिस वजह से पेटेंट अधिकारियों, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय को भी उलझन हो गई थी और उनके सामने स्थिति स्पष्ट नहीं थी।

पहले जिस किसी का भी मन करता था वह किसी एक पक्ष को पेटेंट की मंजूरी दिए जाने से नाखुश होकर विरोध करते हुए पेटेंट नियंत्रक के पास आवेदन दर्ज कर सकता था। पर यह पेटेंट को मंजूरी दिए जाने के पहले किया जाता था। अगर किसी पक्ष को नियंत्रक के फैसले पर ऐतराज होता था तो वह आगे उच्च न्यायालय में अपील कर सकता था।

वर्ष 2002 में कानून निर्माता चाहते थे कि वे एक ऐसा पुनर्विचार मंच होना चाहिए जहां नियंत्रक के फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई की जा सके। इसे ध्यान में रखकर एक संशोधन पारित किया गया पर उसे आगे लागू नहीं किया गया।

कानून निर्माताओं को तब यह एहसास हुआ कि पेटेंट को मंजूरी दिए जाने के पहले तो उच्च न्यायालय में अपील करने का प्रावधान था पर एक बार अगर पेटेंट को मंजूरी दे दी गई है तो उसके बाद आगे अपील करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस वजह से 2005 में पेटेंट कानून में एक बार फिर से संशोधन किया गया। धारा 116 और 117 ए में कई बदलाव किए गए।

ट्रेड मार्क्स कानून 1999 के तहत गठित अपील बोर्ड को यह अधिकार भी दिया गया कि वह पेटेंट मामलों में सुनवाई भी कर सके। हालांकि इन बदलावों को लेकर तत्काल अधिसूचना जारी नहीं की गई। कानून में कुछ और संशोधन भी किए गए पर उनको लागू करने के लिए अलग अलग तारीखें तय की गईं। जिस मामले का जिक्र किया जा रहा है, वह इनमें से ही एक है।

यहां सबसे बड़ी उलझन यह थी कि मंजूरी मिलने के बाद सुनवाई कहां की जाएगी। चूंकि कानून के कुछ हिस्से को लागू किया गया था, इस वजह से कुछ को लगा कि ट्रेड मार्क कानून के तहत आने वाली याचिका बोर्ड में मामले की सुनवाई की जानी चाहिए। कुछ को लगा कि सुनवाई उच्च न्यायालय में की जानी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने समझाते हुए कहा, ‘भले ही विधायिका का इरादा याचिका बोर्ड के सामने एक ही सांविधिक अपील की अनुमति देने का था जो पेटेंट (संशोधन) कानून 2005 की धारा 61 के तहत की जानी थी, पर कानून 2 अप्रैल, 2007 तक लागू नहीं किया जाना था। इस वजह से एक अजीब सी स्थिति पैदा हो गई।

कानून को लागू नहीं किए जाने के बीच की अवधि में जो मामले दर्ज किए गए, वे कमजोर पड़ गए और उनके खारिज होने की आशंका बढ़ गई। इस मामले से जुड़ी याचिका भी इस अवधि के दौरान ही जारी की गई थी।’ पेटेंट को लेकर जो अजीब सी स्थिति पैदा हो गई है उन्हें कानून निर्माता ही सुलझा सकते हैं।

अब तकरीबन हर विधेयक में यह शर्त जोड़ दी जाती है कि इसे तब ही लागू किया जाएगा जब सरकार इसकी अधिसूचना जारी कर देती है। इससे अधिकारियों के पास इतने अधिकार आ जाते हैं कि वे अपनी मर्जी से अधिसूचना को टाल सकें। अगर इस दुविधापूर्ण मसले का समाधान कर लिया जाए तो जनरल क्लाउजेस ऐक्ट की धारा 5 काम करने लगेगी।

इसके अनुसार, ‘अगर किसी खास दिन केंद्रीय कानून को लागू नहीं किया जा सका हो तो इसे उस दिन से लागू किया जाएगा जिस दिन इसे राष्ट्रपति की ओर से मंजूरी दी जाएगी।’ पर देखने में यही आता है कि राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने में तो आमतौर पर ज्यादा वक्त नहीं लगता पर उसके बाद की प्रक्रिया काफी लंबी खिंच जाती है।

First Published - September 4, 2008 | 10:06 PM IST

संबंधित पोस्ट