महंगाई दर एक दशक बाद (सही कहें तो 1995 के बाद) पहली बार दहाई के आंकड़े पर पहुंची है।
यह नवंबर 2006 में 5 प्रतिशत के नीचे थी, जो बढ़ते-बढ़ते इस साल जून में 11 प्रतिशत को पार कर गई। इसका असर हम अपने चारों ओर देख रहे हैं। एक साल पहले जो चावल 20 रुपये प्रति किलो बिकता था, आज वह बढ़कर 27 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया है।
एक सप्ताह में सब्जियों का खर्च एक परिवार पर पिछले साल 100 रुपये हुआ करता था, जो आज 160 रुपये हो गया है। इसे रोकने के लिए भारत सरकार और रिजर्व बैंक हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इस अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए सीआरआर का प्रबंधन, उधारी पर नियंत्रण, ब्याज दरों में बढ़ोतरी जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
बहरहाल बढ़ती हुई कीमतों से निजात पाने के लिए भारतीय गृहिणियां अपने हिसाब से अपने घरेलू बजट का प्रबंधन कर रही हैं। उन्होंने अपनी बचत योजनाओं को कुछ समय के लिए त्याग दिया है, उन्हें इस बात की उम्मीद है कि बाद में इसे पूरा कर लिया जाएगा। महिलाएं इस समय महंगाई से बचने के लिए 3 तरीके अपना रही हैं-
1- वे उन उत्पादों को खरीदने में संयम बरत रही हैं, जिनके बिना भी काम चल सकता है, जैसे- भोग विलास की वस्तुएं।
2- उन उत्पादों को खरीदने का विचार त्यागा जा रहा है, जिन्हें तत्काल खरीदना जरूरी नहीं है। इसके लिए अच्छे दिनों का इंतजार किया जा रहा है। इनमें उपभोक्ता वस्तुएं और ऑटोमोबाइल जैसी चीजें शामिल हैं। आटोमोबाइल क्षेत्र में पहले से ही मंदी देखी जा रही है।
3- वे रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों को खरीदने में महंगाई की मार से बचने के लिए गुणवत्ता से समझौता कर सकती हैं। वे उसी सामान को कम कीमतों वाले ब्रांड को खरीदने या जो उत्पाद जाने पहचाने नहीं हैं उनकी खरीदारी करने की ओर उन्मुख हो रही हैं, या उनका कम उपभोग करने का तरीका अपना रही हैं।
उपभोक्ता वस्तुओं का बाजार इस तपिश को महसूस कर रहा है। ऐसे वातावरण में विक्रेता किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे? मार्च में जारी आईपीए के शोधपत्र में आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जो विकसित बाजारों के बारे में है। इसमें निम्नलिखित तथ्य उभरकर सामने आए हैं:
1- बजट में कटौती का असर लाभ पर बहुत कम समय के लिए पड़ेगा।
2- आखिर में ब्रांड ही उभरकर सामने आएंगे और वे कमजोर होंगे तथा बहुत कम लाभ पर काम करेंगे।
3-गिरावट के समय में बेहतर यही होगा कि एसओवी (शेयर आफ वॉयस) को एसओएम (शेयर आफ मार्केट) की अपेक्षा ज्यादा तवज्जो दी जाए। इससे लंबी अवधि के लिए लाभ बरकरार रहेगा।
4- अगर अन्य ब्रांड बजट में कटौती कर रहे हैं तो दीर्घावधि में एसओवी को बरकरार रखने से होने वाला लाभ एसओएम की अपेक्षा अधिक होगा।
वास्तव में उस श्रेणी में जाने पर जहां बिक्री को कीमतें संचालित करती हैं, ब्रांड कम महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं (जैसे मोटर ईंधन, मिनरल वाटर, विभिन्न प्रकार के परिधान और उससे संबंधित वस्तुएं-अपैरल आदि) वे ब्रांडेड वस्तुओं की श्रृंखला में शामिल (जैसे लग्जरी कारें, वित्तीय सेवाएं और इत्र) वस्तुओं से ज्यादा ग्रहणीय हैं।
अंतिम में उछाल (और भारत में देखें तो शायद रिटेल पुश) विज्ञापन पर निर्भर है। इस तरह से उछाल पर निर्भर ब्रांडों के लिए कीमतें कम करने का तरीका संभव नहीं है। क्या ये सिध्दांत भारत में स्वीकार्य हैं, जो विकासशील बाजार है, जहां श्रेणियां और ब्रांड्स अभी विकसित हो रहे हैं और जहां बाजार के आकार में कम समानता है? यह एक दिलचस्प सवाल है।
90 के दशक से भारतीय बाजार की संरचना में नाटकीय परिवर्तन आया है और अंतिम में हम उच्च महंगाई दर देख रहे हैं। यहां पर हर श्रृंखला में कीमतों के विभिन्न वर्ग हैं और आज यहां राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय का संयोजन है। भारतीय बाजार में स्थानीय कारोबारी, ग्राहकों को चयन का विकल्प दे रहे हैं और वे कारोबार के लिए अलग माहौल दे रहे हैं। 2007 में आई आशावादिता और खुशी का माहौल 2008 की पहली छमाही में बना रहा, लेकिन हो सकता है कि अगली छमाही में यह बरकरार न रहे। इस समय यह आशा जगी है कि बेहतर मानसून के चलते महंगाई पर लगाम लग सकती है।
दिलचस्प है कि यह समय सामान्यत: बाजार के लिए कम गतिविधियों वाला होता है। बहरहाल बहुराष्ट्रीय कंपनियां अभी इंतजार करने और देखने के मूड में हैं कि अगली छमाही में क्या होता है। अगर गतिविधियां तेज नहीं हुईं तो वे खर्चे कम कर देंगे। विक्रेता, जो विभिन्न वर्गों में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश में हैं, वे अपनी गतिविधियां उच्च वर्ग तक सीमित कर देंगे और अपने खर्चों में कमी करेंगे। इसका कारण यह है कि उच्च वर्ग पर महंगाई का प्रभाव कम ही पड़ता है। मध्य वर्ग के बाजार में कमी आएगी।
विक्रेता अपने ब्रांड को स्थापित करने के लिए भारी-भरकम निवेश करते हैं, वे तात्कालिक फायदे को ध्यान में रखते हुए निवेश करेंगे। वे ऐसे विज्ञापनों पर ज्यादा जोर देंगे जो लंबी अवधि और कम अवधि दोनों के लिए फायदेमंद साबित हों। 90 के दशक में वह स्थितियां मौजूद नहीं थीं जो आज हैं। उनका प्रभाव भी सीमित था। आज विज्ञापन का बाजार विभिन्न विज्ञापनदाताओं द्वारा चलाया जा रहा है, जिनके खर्चे अलग हैं। भारतीय उद्यमियों का संचालन विज्ञापन बाजार द्वारा हो रहा है। यह रिटेल, टेलीकॉम और रियल एस्टेट जैसे उभरते कारोबार में ज्यादा ही असरकारी है।
उच्च स्तर पर संचालित होने वाले कुछ ब्रांड, बाजार की हिस्सेदारी पर कब्जा जमाने के लिए अपने उत्पाद और ब्रांड को आक्रामक तरीके से पेश करते हैं। कुछ बड़े भारतीय घरानों ने इसके लिए अलग विभाग बनाए हैं, जिससे उपभोक्ता बाजार में मंदी आने की स्थिति में सीधे तौर पर उनकी जवाबदेही तय हो सके। कुछ ऐसे भी हैं जो कम समय या लंबे समय के लिए उपभोक्ता बाजार पर प्रभाव बनाने के लिए नहीं बल्कि बाजार पूंजीकरण का निर्माण करने के लिए प्रचार कर रहे हैं। अगर ये कारोबारी आक्रामक तरीके से बाजार पर नजर रखेंगे तो किसी भी परिवर्तन का असर इन पर कम ही पड़ेगा।
विज्ञापन एजेंसियों के सामने इस समय किस तरह की चुनौतियां हैं? एक बार फिर हम पाते हैं कि 90 के दशक के मध्य से इसमें परिवर्तन हो रहा है। कमीशन के बाद अब मामला शुल्क तक पहुंच गया है। यह विभिन्न ग्राहकों के मुताबिक बदल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि यह उद्यमियों को सहयोग प्रदान करेगा। बहरहाल अगर यह स्थिति बरकरार रहती है तो इस बात की जरूरत होगी कि परिणाम पर आधारित विज्ञापन विकसित हों और जिन पर कम खर्च आए। इसमें डिजिटल और रिटेल जैसी प्रभावी मीडिया का इस्तेमाल हो सकता है जिससे विक्रेताओं को तत्काल लाभ मिल सके।
यह एजेंसियों के लिए एक अवसर हो सकता है, जिससे वे ऐसे तरीके विकसित करें, जिससे हो रहे बदलावों को देखते हुए विक्रेताओं को लाभ मिल सके। महंगाई और आर्थिक मंदी के बीच सबसे बड़ा मुद्दा है कि भारतीय आशावादिता और उत्साह का परीक्षण हो रहा है। वास्तविक चुनौती यह है कि बाजार नीचे जा रहा है और उपभोक्ता का रुख सकारात्मक नहीं है। क्या विक्रेता आशावादिता को वापस पा लेंगे और उसके मुताबिक संचालन करेंगे या वे भी उपभोक्ताओं की भावना में आ जाएंगे और मंदी की ओर बढ़ेंगे? यह आगे चलकर समय ही बताएगा।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)