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कल को महफूज बनाने में वामपंथियों का रोड़ा

Last Updated- December 07, 2022 | 8:04 AM IST

मुल्क के 40 करोड़ कामगारों के लिए यह शनिवार काफी अहम होगा। ये लोग दिन-रात एक करके काम करने में जुटे रहते हैं, ताकि अपने आने वाले कल को वे महफूज बना सकें।


इनमें से भी केवल 1.5 से 2 करोड़ लोग ही ऐसे हैं, जो अपनी कमाई का एक हिस्सा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी इम्प्लॉयी प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (ईपीएफओ) में जमा कर पाते हैं। असल में यही लोग ऐसे हैं, जिनके पास रिटायरमेंट फंड नाम की कोई चीज है। कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) के पास इस वक्त 1,03,837 करोड़ रुपये की पूंजी है।

इसका मतलब यह हुआ कि एक व्यक्ति के लिए उसके पास 51,918 रुपये हैं। सामान्य ब्याज दरों पर वह उस कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद भी हर साल 3,634 रुपये रकम दे सकता है। आम तौर पर ये सभी लोग कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) के भी हकदार होते हैं, जिसके मुताबिक उन्हें हर साल 3,250 रुपये तक की पेंशन मिल सकती है। हालांकि, इस पेंशन को हासिल करने के लिए उन्हें कम से कम 10 साल तक ईपीएस में पैसे जमा करने होते हैं। दूसरे शब्दों में मुल्क के इन 5 फीसदी कामगारों के लिए भी  सामाजिक सुरक्षा का कवर न के बराबर ही है।

इसलिए तो इन्वेस्ट इंडिया मार्केट सोल्यूशंस के एक सर्वे के मुताबिक पूरे वतन के करीब 8 करोड़ लोग-बाग रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर पैसे निवेश करने में जुटे हुए हैं। हालांकि, वे म्युचुअल फंड में निवेश कर सकते हैं, लेकिन उसमें लागत काफी ज्यादा आती है। कोल माइनर्स प्रोविडेंट फंड ने अभी हाल ही में अपने फंड को हैंडल करने का काम आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के हवाले कर दिया था। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज इस काम के लिए केवल एक बेसिस प्वाइंट (0.01 फीसदी) की फीस वसूलेगी।

वहीं म्युचुअल फंड कंपनियां, मैनेजमेंट फीस के नाम पर तकरीबन 100 बेसिस प्वाइंट्स (एक फीसदी) का शुल्क वसूलती है। खुलकर कहें तो जैसे-जैसे यह रवैया बढ़ता जाएगा, 30-35 सालों के बाद पेंशन फंड में पैसे जमा करने वालों को पांचवां हिस्सा ही मिलेगा। अभी जो शख्स रिटायरमेंट प्लान में निवेश करना चाहते हैं, उनके लिए इस वक्त तो ईपीएफओ ही इकलौता विकल्प है। लेकिन आप सभी इस बात से काफी अच्छी तरह से वाकिफ होंगे कि ईपीएफओ अपनी ही दिक्कतों के मकड़जाल में फंसा हुआ है। ईपीएस दस या बारह नहीं, पूरे 25 हजार रुपये की भारी-भरकम कमी से जूझ रही है।

साथ ही, इसके सिंगल एंट्री अकाउंटिंग सिस्टम से इसमें गबन की घटनाओं की भी भरमार है। ऊपर से, अकाउंट ट्रांसफर करवाने में तो नानी याद आ जाती है। यह तो एक बानगी भर है, यहां तो दिक्कतों का पुलिंदा है। इन दिक्कतों से छुटकारा पाने का सबसे अच्छा जरिया यही है कि यहां प्राइवेट सेक्टर के साथ-साथ दूसरे खिलाड़ियों को भी अपना जौहर दिखाने का मौका मिले। इससे इस सेक्टर में होड़ का आगाज होगा, जिससे ईपीएफओ की भी अपनी क्षमता बढ़ाने का मौका मिलेगा। इससे इसके 1.5-दो करोड़ खाताधारकों का ही फायदा होगा।

इस सेक्टर पर नजर रखने के लिए पेंशन फंड रेग्युलेटरी ऐंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीएफआरडीए) नाम की संस्था को भी बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। यह संस्था इस बात का खास ध्यान रखेगी कि इस सेक्टर में उतरने वाली कंपनियां ठीक से काम करें, उनके खातों में किसी तरह की हेराफेरी न हो, वे सारे सरकारी दिशानिर्देशों का ठीक से पालन करें और इतना पैसा अपने पास रखें ताकि वे लोगों को सुरक्षा मुहैया करवा सकें।   इस मकसद के साथ 2005 के शुरुआत में पीएफआरडीए विधेयक को संसद में भेजा गया था।

वहां से इसे संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के पास भेज दिया गया। मौके की नजाकत को देखते हुए समिति ने भी कुछ ही महीने में इस मुद्दे पर अपने सुझाव भी दे दिए। इसके बाद से ही यह विधेयक ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। वजह वही है, जो संप्रग सरकार के ज्यादातर विधेयकों के साथ है। वामपंथी दल इस विधेयक का कड़ा विरोध कर रहे हैं। पहले उन्होंने कहा कि पेंशन फंड मैनेजर कामकाजी लोगों की खून-पसीने की कमाई को शेयर बाजार में लगाएंगे, जो उन्हें कतई बर्दाश्त  नहीं सकता।

इस पर जवाब आया कि हरेक फंड मैनेजर लोगों को एक ‘सेफ’ विकल्प के बारे में भी बताएगा, जहां पैसे केवल सरकारी बॉन्डों में ही लगाए जाएंगे। इस पर वामपंथियों ने सीधे-सीधे यह कह दिया कि प्राइवेट फंड मैनेजरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसीलिए 17 अप्रैल को जब ईपीएफओ ने हर इसे मिलने वाले ताजा रकम के प्रबंधन के लिए अलग-अलग फंड मैनेजरों से टेंडर मंगवाए तो कई लोगों को काफी हैरत हुई। अब तक यह काम केवल स्टेट बैंक ही किया करता था।

ईपीएफओ के पास ईपीएफ और ईपीएस को मिलकर इस वक्त करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये की पूंजी है, जबकि इसे हर साल 9000 करोड़ रुपये की मोटी-ताजी रकम मिलती है। इस कदम से प्रतिस्पध्र्दा बढ़ेगी, जिससे ईपीएफओ के मौजूदा खाताधारकों को ही फायदा होगा। इसके अलावा, इसकी गूंज दूर तलक जाएगी। आखिरकार, वामपंथियों के कब्जे वाले ईपीएफओ ने भी प्राइवेट फंड मैनेजरों की तरफ अपनी बांहें खोल ही दी। फिर एनपीएस के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों के फंड मैनेजरों के साथ-साथ प्राइवेट फंड मैनेजरों को क्यों इजाजत नहीं दी जा रही?

यहीं से तो दिक्कत शुरू होती है। हिंदुस्तान टाइम्स में एक छपे एक रिपोर्ट के मुताबिक सीटू के सचिव और ईपीएफओ के केंद्रीय ट्रस्टी बोर्ड में शामिल डब्ल्यू. आर. वर्ध्दराजन प्राइवेट फंड मैनेजरों के पक्ष में नहीं हैं। फिर क्यों ईपीएफओ ने टेंडर के लिए विज्ञापन दिए? क्यों उसने 20 में से 17 फंड मैनेजरों को चुना और उन्हें ही बोली लगाने की इजाजत दी? वर्ध्दराजन ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि, ‘यह फंड मैनेजमेंट में प्रतिस्पर्धा डालने के लिए किया गया है।’ हालांकि, एक अखबार की खबर ज्यादा मायने नहीं रखती, लेकिन हकीकत शनिवार को सबके सामने आ जाएगी जब ईपीएफओ के ट्रस्टी प्रस्तावों के बारे में फैसला करेंगे।

अगर बैठक में प्राइवेट फंड मैनेजरों को इसमें शामिल नहीं करने का फैसला लिया जाता है, तो पीएफआरडीए विधेयक (जिससे 40 करोड़ कामगार अपने पेंशन फंड मैनेजर का चुनाव कर सकेंगे) के पास होने की संभावना भी काफी कम हो जाएगी। माकपा नेता प्रकाश कारत अक्सर यह कह कर प्रधानमंत्री की आलोचना किया करते हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह महंगाई को काबू करने ज्यादा अहमियत परमाणु करार को दे रहे हैं। लेकिन कामगारों की जिंदगी की शाम को सुनहरा बनाने वाले एक कदम को रोकने के वामदलों के रवैये के बारे में वह क्या कहेंगे?

First Published - June 29, 2008 | 11:57 PM IST

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