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कहीं बुनियाद न हिल जाए महंगाई की मार से

Last Updated- December 07, 2022 | 8:04 AM IST

इस समय एक धारणा चल रही है कि वृहद अर्थव्यवस्था के वर्तमान संकट, भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए लंबे समय के लिए खतरा नहीं हैं।


यह अनुभव किया जा रहा है कि एक बार अगर हम महंगाई पर काबू पा लेंगे, तो चीजें अपने आप ही पटरी पर आ जाएंगी। इस सोच के लिए यह तथ्य लिया जा रहा है कि विकास दर का वर्तमान रुझान सही है और यह 8-9 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। अगर अधिक नहीं है तो यह चक्रीय प्रकृति की है, जो अगले कुछ महीनों तक पीड़ा पहुंचा सकती है, लेकिन बाद में विकास दर फिर से सामान्य हो जाएगी।

ये विचार अकारण नहीं आ रहे हैं। व्यापारिक चक्र, लंबे समय तक अर्थव्यवस्था को प्रभावित नहीं करते। नीतियों की प्रतिक्रिया में कम समय का अस्थायित्व आता है, जिसे अच्छी तरह से समझा जा सकता है। यह चल रही धारणा पर कोई महत्त्वपूर्ण असर डाले हुए अपना प्रभाव दिखाता है। बहरहाल इसके खिलाफ दिए जा रहे विचार भी महत्त्वपूर्ण हैं। कुछ नीतियों का असर चक्रीय प्रक्रिया में भी लंबे समय के लिए हो सकता है और इसका प्रभाव लंबे समय तक के लिए हो सकता है।

अगर भविष्य के बारे में लगाए जा रहे यह अनुमान  सही साबित होते हैं तो खासकर निवेश के निर्णय प्रभावित होंगे, जिसके चलते विकास दर की वर्तमान धारणा में बदलाव आ सकता है। तमाम खतरों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था उच्च विकास दर के पथ पर अग्रसर है। हालांकि यहां आधारभूत ढांचे की हालत बेहतर नहीं है। कई साल से चल रही उच्च विकास दर ने खतरों और समस्याओं से भी रूबरू कराया है। आधारभूत ढांचे में सुधार आया है, लेकिन मांग को देखें तो यह बहुत कम ठहरता है।

नीतियों से निजी निवेशकों को प्रोत्साहन मिला है, लेकिन तमाम क्षेत्रों में निवेशकों का आकर्षण कम रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह प्राथमिक अवस्था में है। इस तरह से इस प्रक्रिया के बाद भी अर्थव्यवस्था के दीर्घकालीन लाभ अभी कोसों दूर है। इसके साथ ही हम देखते हैं कि निजी निवेश में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन यह सार्वजनिक निवेश के विकल्प के रूप में नहीं तैयार हुआ है। वित्तीय सुधारों में सार्वजनिक निवेश का अभी भी विशेष स्थान है।

वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) 2003 के मुताबिक केंद्र सरकार को इसकी अनुमति है कि वह पूंजी प्रबंधन के लिए जीडीपी का 3 प्रतिशत तक उधारी ले सकती है। राज्य स्तर पर हो रहे वित्तीय सुधारों में भी यह बाध्यता है कि सरकारें केवल संसाधन जुटाने के लिए उधारी ले सकती हैं। वहीं संप्रग सरकार जो एफआरबीएम के उद्देश्यों के प्रति बचनवध्द है, ने पिछले कुछ साल में इसके प्रति अपनी प्रतिबध्दताएं तोड़ी हैं। उसने तेल की बढ़ती वैश्विक कीमतों और उर्वरक के मामले में एफआरबीएम के लक्ष्यों की अवहेलना की है।

पिछले साल की दूसरी छमाही में खुले दिल से तेल और उर्वरक बॉन्ड जारी किया। वित्तमंत्री ने पिछले मार्च के बजट में इसे बजट घोषणा में भी शामिल किया। बहरहाल यह बॉन्ड सरकार द्वारा ली गई उधारी के अंतर्गत ही आते हैं, जिसे बजटीय घाटे में शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन बजट अनुमानों से इन्हें बाहर रखा गया। एक ही हालत में इसे उचित ठहराया जा सकता था कि यह उधारी कम समय के लिए ली गई होती और एक वित्तीय वर्ष के भीतर इसके पुनर्भुगतान का प्रावधान होता।

वैश्विक स्तर पर उर्वरक और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, तो यह स्वाभाविक है कि उधारी को चुकाने में न केवल देरी होगी, बल्कि  भविष्य में इस तरह के और भी कर्ज लेने होंगे। इससे सब्सिडी की सीमाओं का पता चलता है, यही कारण है कि वित्त के लिए बॉन्डों का प्रयोग किया गया। इसके परिणाम स्वरूप वास्तविक वित्तीय घाटा, जो 2008-09 के बजट में लगाए गए अनुमान में पहले से ही 2.5 प्रतिशत से अधिक है, इसमें भविष्य में भी बढ़ोतरी होगी।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वित्तीय घाटे के पुराने बुरे दिन फिर लौट रहे हैं, जब केंद्र और राज्य सरकारों का संपूर्ण वित्तीय घाटा, जीडीपी के 10 प्रतिशत हिस्से से भी अधिक हो गया था। पिछले सप्ताह जारी स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स और क्रिसिल की एक प्रेस विज्ञप्ति मंआ अनुमान लगाया गया कि वर्ष 2008-09 में केंद्र सरकार का वित्तीय घाटा जीडीपी का 6.2 प्रतिशत और केंद्र और राज्यों का संयुक्त वित्तीय घाटा जीडीपी का 8.7 प्रतिशत रहेगा। यह कु छ अन्य अनुमानों की तरह निराशावादी नहीं हैं, लेकिन यह स्पष्ट रूप से संकेत दे रहे हैं कि एफआरबीएम के उद्देश्यों से दूरियां बढ़ रही हैं।

यह ऐसा वक्त है जब कम अवधि के लिए बन रही नीतियों के प्रभाव और लंबे समय के विकास के प्रदर्शन के बीच संबंधों पर सवाल उठ रहे हैं। इन चिंताओं के पीछे वजह यह है कि केंद्र सरकार वित्तीय दबाव को कम करने के लिए विभिन्न कदम उठा रही है। अभी तक के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि 1991 के बाद से केंद्र सरकार का वित्तीय घाटा, तुलनात्मक दृष्टि से कम हुआ है। हालांकि ऐसा हमेशा नहीं हुआ है।  यह देखा जा रहा है कि हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति बदली है। अगर पिछले दो साल में जारी किए गए तेल और उर्वरक बॉन्डों को इसमें शामिल किया जाए तो इसमें परिवर्तन साफ हो जाता है।

आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि वित्तीय घाटा कम हुआ है। स्पष्ट रूप से यह बहुत आसान है कि पूंजीगत खर्चों को कम कर दिया जाए और राजस्व खर्च को भी कम कर दिया जाए। अगर राजस्व खर्च स्थिर रहेगा, तो पूंजीगत खर्चों में कमी आएगी। हालांकि पिछले 10 साल में एक अपवाद भी आया, जब नेशनल हाईवे परियोजना अपने चरम पर थी। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों को मिलाकर कुल  पूंजीगत खर्चों में कमी आई है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बुनियादी क्षेत्र में मांग और आपूर्ति के बीच अंतर की यह एक बड़ी वजह है।

सवाल यह है कि क्या इतिहास एक बार फिर अपने आप को दोहराएगा।  सरकार पर वित्तीय घाटे के पहाड़ को कम करने का दबाव है, तो क्या ऐसे में सबसे आसान कदम यही उठाया जाने वाला है कि पूंजीगत खर्चे कम कर दिए जाएं?  राजस्व खर्च में स्थायित्व होता है, जिसमें ब्याज का भुगतान, वेतन का भुगतान करना ही होता है। ऐसे में यही अनुमान लगाया जा सकता है कि पूंजीगत खर्चों पर ही गाज गिरेगी। यह सही है कि कुछ लोग यह तर्क कर सकते हैं कि निजी क्षेत्रों के निवेश से यह कमी पूरी की जा सकती है। लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि हम इतनी अच्छी स्थिति में हैं कि इन निवेशों से खाईं को पाटा जा सकेगा।

यहां पर चिंता करने के लिए अन्य कड़ियां भी मौजूद हैं। मेरे विचार से तेजी से हो रहे विकास पर इसका असर पड़ेगा। बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए जनता के प्रति जवाबदेही पूरी नहीं किए जाने की स्थिति में निवेश का माहौल बिगड़ेगा। महंगाई को रोकने के लिए सब्सिडी दिए जाने, और इसे बरकरार रखने, इसमें बढ़ोतरी किए जाने, सार्वजनिक पूंजीगत खर्चे आदि ऐसे मामले हैं जो उच्च विकास दर को बरकरार रखने के लिए बहुत ही जटिल साबित होंगे। स्पष्ट रूप से लंबे समय के प्रदर्शन को, कम समय लिए बनी नीतियों से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

First Published - June 29, 2008 | 11:53 PM IST

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