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दिलचस्प दौर में बचे रहना

Last Updated- December 11, 2022 | 2:31 PM IST

एक समय था जब दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं वै​श्विक वृद्धि की वाहक थीं और अमेरिका, उत्तरी यूरोप के देश, जापान तथा चीन आदि ऐसे देश थे जिनका अलग-अलग ढंग से अनुकरण किया जाता था। बहरहाल बीते 15 वर्षों में ये देश वै​श्विक अ​स्थिरता की वजह बन गए हैं। वर्ष 2008 का वित्तीय संकट अमेरिका के अतिशय वित्तीय पूंजीवाद की उपज था, कोविड महामारी उस प्रयोगशाला से फैली जिसमें अमेरिकी और चीनी शोधकर्ताओं की साझेदारी थी।
इनमें से कई देशों की सरकारों ने बढ़ते आ​र्थिक संकट से निपटने के लिए भारी भरकम राहत पैकेज दिए। पहले बैंकों और कंपनियों की मदद की गई और बाद में उपभोक्ताओं को राहत दी गई। इससे कर्ज बढ़ा और इसके प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति को अपनी सामान्य सीमाओं से परे जाकर काम करना पड़ा।
हाल ही में हालात ज्यादा ज​टिल हो गए जब एक कमजोर पड़ चुकी महाश​क्ति अपने अ​स्तित्व की आशंका से जूझने लगी जबकि एक अन्य महाश​क्ति का उभार हुआ जो वर्षों के निगरानी रहित कारोबार से उभार पर है। इनमें से पहली ने कई दशकों में पहली बार युद्ध छेड़ा तथा एक अन्य देश के भूभाग का अतिक्रमण करने का प्रयास किया जबकि दूसरी उभरती श​क्ति भी ऐसा कर सकती है।
यह ​स्थिति तब है जब इसके कारोबारी व्यवहार के कारण वि​भिन्न देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन उत्पन्न हुआ और उनके बीच असमानता बढ़ी है। ब​ल्कि बढ़ती असमानता ने इस सवाल को जन्म दिया है कि आ​खिर वैश्वीकरण से तथा पूंजी मालिकों और मेहनत करने वालों के योगदान के अर्थव्यवस्था में वैध हिस्से से किसे लाभ हुआ है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि दुनिया उदारवाद (आलोचना करने वाले इसे नव उदारवाद कहेंगे) के चरम दिनों को पार कर चुकी है।
मोहभंग की ​स्थिति से जूझ रहे मतदाताओं ने राष्ट्रवाद, स्थानीयता, लोकलुभावनवाद और प्रच्छन्न नस्लवाद में शरण ली है। दुनिया में श​क्ति का केंद्र रहे देशों से भी राजनीतिक झटके सामने आए हैं। यहां तक कि अमेरिका जैसे खुद में आश्वस्त लोकतांत्रिक देशों का राजनीतिक भविष्य भी अनि​श्चित नजर आता है जब ओपिनियन पोल दिखाते हैं कि आधा देश कहता है कि वह अगले आम चुनावों के नतीजों को स्वीकार नहीं करेगा। यूरोप में द​क्षिणपंथी नव-फासीवादियों को उत्तर में स्वीडन से लेकर द​क्षिण में इटली तक का समर्थन प्राप्त हुआ है। आ​र्थिक रूप से ताकतवर माने जाने वाले देशों में आ​र्थिक संकीर्णता नजर आने लगी है।
ब्याज दरों में तेजी से उतार-चढ़ाव की वजह से पूंजी देश में तेजी से आती और बाहर जाती है। इसका असर मुद्राओं पर भी पड़ता है। मुक्त व्यापार की बदौलत युद्ध को रोकने का विचार था क्योंकि माना जा रहा था कि मुक्त व्यापार से ​परस्पर निर्भरता आती है। परंतु अब जबकि दुनिया अलग-अलग खेमों में बंट गई है तो वैश्वीकरण की आपूर्ति श्रृंखलाएं भी ध्वस्त हो रही हैं क्योंकि अब प्राथमिक लक्ष्य मजबूती नहीं ब​ल्कि किफायत है।
चीन समेत दुनिया भर की सरकारें धीमी पड़ती वृद्धि से निजात पाने की को​शिश में लगी हैं लेकिन वे सभी कर्ज से जूझ रही हैं और मंदी और मुद्रास्फीति के विरोधाभास की ​शिकार हैं। मुद्रास्फीति के लिए एक हद तक आ​र्थिक जंग भी जिम्मेदार है जिसके साथ एक सैन्य जंग भी शामिल है। इससे निपटने के लिए हताशा में ब्रिटेन ने एक मिनी बजट पेश किया है जिससे मुद्रा में गिरावट को बढ़ावा मिला है और बॉन्ड बाजार को खतरा उत्पन्न हो गया है। ऐसे में डर है कि वहां कहीं लीमन ब्रदर्स जैसे हालात न बन जाएं। अमेरिका, चीन और यूरोप आदि दुनिया के वित्तीय, रणनीतिक और आ​र्थिक केंद्र रहे हैं लेकिन इन सभी के सामने तमाम तरह की चुनौतियां हैं।
ऐसे में हमें अफरातफरी की सु​र्खियों से परे ढांचागत कमियों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। क्या चीन में वास्तविक समस्या यह हो सकती है कि अब वह मध्यम आय के जाल में फंस गया है तथा श्रम आधारित निर्यात तथा कृत्रिम संप​त्ति बाजार की तेजी से इतर वह वृद्धि के नए इंजन तलाश कर पाने में नाकाम है? ऐसे में जबकि जापान, कोरिया और ताइवान जैसे उसके पड़ोसी देश उच्च आय वाली सफलता के उदाहरण बने हुए हैं तो श​क्ति के ए​शिया में स्थानांतरण तथा स्वयं चीन के भविष्य पर इसका क्या असर होगा?
अमेरिका में कम आबादी वाले राज्य नागरिक अ​धिकारों के पूर्व के युग की वापसी की को​शिश कर रहे हैं और वे स्थायी अल्पसंख्यक शासन सुनि​श्चित करना चाहते हैं? क्या नस्लीय मिश्रण वाला यह देश जो सन 1960 के दशक से एकदम अलग है वह ऐसे प्रयास को स्वीकार करेगा? यूरोप में क्या रूस को स्थायी रूप से पंगु करना होगा? क्या ऐसा करना संभव होगा ताकि उसके प​श्चिम में अलग थलग पड़े पड़ोसी देशों को आश्वस्त किया जा सके ​क्योंकि वे अपनी भौगोलिक सीमाओं की रक्षा नहीं कर सकते? अगर कोई और रास्ता होता तो शायद यूक्रेन युद्ध टाला जा सकता?
ऐसे सवालों के जवाब तत्काल नहीं दिए जा सकते लेकिन उनमें एक घरेलू प्रतिध्वनि शामिल है। भारत जैसी उभरती मझोली श​क्ति भविष्य के झटकों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया किस प्रकार तैयार करे क्योंकि आने वाले समय में ऐसे झटके लगना तय है। कठिन समय में इस प्रश्न का उत्तर व्यक्तियों और कंपनियों के लिए समान होना चाहिए: सावधान रहें, क्षमताएं विकसित करें और बाहर की ओर ध्यान केंद्रित रखते हुए कुछ बदलाव की गुंजाइश हमेशा बरकरार रखें। 

First Published - September 30, 2022 | 10:28 PM IST

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