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मूल्यांकन नहीं, मूल्य से देखिए कंपनी का दम

Last Updated- December 07, 2022 | 8:45 PM IST

अब यह काफी हद तक साफ हो चला है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था दूसरे विश्व युद्ध के बाद अब तक के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है।


इसमें सुधार की बहुत उम्मीद अभी दिखती नहीं है और लगता है कि इसमें सुधार आने से पहले हालात अभी और बिगड़ेंगे। भारत में कुछ आर्थिक पंडितों का मानना था कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर फिलहाल तो इस मुश्किल दौर की मार नहीं पड़ेगी। विकास की आंतरिक संभावनाओं के बूते अगले कुछ वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था 9 फीसदी और उससे भी अधिक की दर से रफ्तार पकड़ने में कामयाब रहेगी।

आज भी कई लोग हैं जो संकट से कतई सहमत नहीं हैं और ऐसे  लोगों को पूरा भरोसा है कि  देश का सकल घरेलू उत्पाद अभी भी 8 फीसदी या उससे भी अधिक की दर से आगे बढ़ता रहेगा। पर शेयर बाजार, जिसे कुछ लोग अर्थव्यवस्था का पैमाना मानते हैं, ऐसा नहीं सोचता और वह कुछ अलग ही बयां करता है। शेयर बाजार उम्मीद में सरकार द्वारा उठाए गए की कदमों में सकारात्मक बातें ढूंढता है।

जैसे, हाल में वियना में परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह यानी एनएसजी ने वैश्विक परमाणु कारोबार के लिए भारत को मंजूरी क्या दी, इस फैसले से शेयर बाजार में तेजी आ गई जबकि अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातें ऐसी नहीं थीं कि बाजार भागे। आप अनुमान ही लगा सकते हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था (भारतीय भी) कब फिर से तेजी की सड़क पर दौड़ेगी।

वैसे, लगता नहीं कि 2009 की दूसरी छमाही से पहले यह पटरी पर लौटेगी और उसे संभलने में 2010 तक का वक्त भी लग सकता है। पर जरूरी नहीं कि यह दौर भारत के लिए इतना बुरा निकले। लेकिन इससे हमारे उद्योगपतियों, भावी उद्यमियों, विश्लेषकों, नीति निर्माताओं और बड़ी राजनीतिक पार्टियों को अपने कदमों को जबरन विराम देना पड़ेगा।

इस वक्त में ये विकास के अगले दौर के लिए आवश्यक योजनाओं और उनके क्रियान्वयन के बारे में सोच सकते हैं। पिछले एक दशक और उससे कुछ पहले से देश के  व्यापार (सार्वजनिक )जीवन में काफी विकृति आई है। और शायद जिस चीज से  भारतीय उद्योग जगत के सभी क्षेत्रों की सबसे अहम बुनियाद को सर्वाधिक चोट पहुंचने की संभावना है, वह है,  ‘मूल्य सृजन’ और ‘मूल्यांकन सृजन’ में जरी भी भेद नहीं होना।

ऐसा लगता है कि बहुत पुराने नहीं पड़े ‘डॉट कॉम’ के  दौर से कोई सबक नहीं सीखा गया। यह वह दौर था जिसमें कई चीजों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया। किसी कारोबार की वास्तविक संभावनाओं की बजाय इस दौर में उसका महिमामंडन अधिक किया गया। परिणामस्वरूप, कुछ बेवजह की चीजें जरूरत से ज्यादा चर्चा के केंद्र में आ गईं।

पिछले कुछ वर्षों में विश्लेषकों, निवेशकों, उद्यामियों और स्थापित काराबोरियों के दिमाग में एक बार फिर इस तरह की हास्यास्पद बातें घर कर गई हैं। इन ‘संशोधनों’ को गति देने के लिहाज से शायद रियल एस्टेट क्षेत्र का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। इस क्षेत्र ने कई परंपरागत चीजों को छोड़कर ‘लैंड बैंक’ जैसे मूल्यांकन मानकों को अपनाया। लैंड बैंक यानी किसके पास कितनी जमीन है।

रियल एस्टेट क्षेत्र ने मांग, खरीद हैसियत, आपूर्ति, लोकेशन के अलावा दाम जैसी कुछ और खास चीजों पर उतना ध्यान ही नहीं दिया। इस मामले में रिटेल क्षेत्र भी पीछे नहीं रहा। कीमतों, लोकेशन और मुनाफे की संभावनाओं की बजाय इन बातों को ज्यादा तरजीह दी गई कि अमुक कंपनी ने कितना रिटेल स्पेस बुक कर रखा है। कंपनियों ने नये-नये कारोबारी तरीकों को पेश करने में अधिक आक्रामकता दिखाई।

इसके बजाय लगातार मुनाफा कमाने वाले आजमाए हुए तौर-तरीकों को आजमाया जाता तो कहीं बेहतर रहता। इसके लिए शुद्ध लाभ में स्थायी या अस्थायी परिवर्तन, भंडारण, हर इकाई की वित्तीय उत्पादकता के अलावा प्रति ग्राहक से कितनी कमाई या प्रति ग्राहक लेन-देन जैसे सूचकों को एकदम नजरअंदाज कर दिया गया। विमानन सेवाओं का कुछ ऐसा ही हाल है।

अभी तक विमानन कंपनियों का मूल्यांकन क्षमता के आधार पर हो रहा है। (इसमें सीटों की संख्या, विमानों के लिए ऑर्डर की संख्या और नेटवर्क का विस्तार जैसे मानक शामिल हैं। ) बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं का मूल्यांकन उनकी पहुंच और रिटेल श्रेणी के आधार पर किया जा रहा है।

अभी हाल तक अस्पतालों का मूल्यांकन आधारभूत परिचालन मानकों के बजाय मुख्य रूप से बेडों की मौजूदा और प्रस्तावित संख्या के आधार पर हो रहा है। ‘डॉट कॉम युग’ के बाद भी अधिकतर उद्यमी चालू मूल्यांकन सूचकों के आधार पर ही काम करने में अपनी रुचि दिखा रहे हैं। ये उद्यमी अपनी ऊर्जा और पैसा इस तरह की प्रक्रिया पर खर्च करने को तैयार नहीं हैं जिससे आदर्श मूल्यांकन हो सके।

इस तरह नजर आता है कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने में वे ही सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। यदि इस तरह की प्रक्रिया सफल हो पाती, तब किसी कारोबार से अपेक्षित अधिक मूल्यांकन के चलते खुद निवेशक भी इसकी हैसियत अधिक ही आंकेंगे।

 वॉल मार्ट, टेस्को, टोयोटा मोटर्स, जनरल इलेक्ट्रिक, कोका कोला, एटीएंडटी और आईबीएम ऐसी कंपनियां हैं जिनकी दशकों से इस मामले में कारगर रणनीति रही है। इस पृष्ठभूमि में शेयर बाजार (और निजी इक्विटी बाजार भी) की अगुआई में मूल्यांकन से अपेक्षाओं को अधिक बढ़ावा मिलेगा। इसकी वजह से छोटी अवधि में वेंचर और परंपरागत पूंजी को इकट्ठा करने में खासी मुश्किल आ सकती है।

यह कारोबार और कारोबारियों को अपने मौजूदा उद्यमों को और अधिक सक्षम बनाने के लिए प्रेरित करने का काम करेगा। इससे प्रेरित होकर वे अपने प्रस्तावित उद्यमों को और बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे। नतीजतन, ग्राहकों या उपभोक्ताओं की लागत बढ़िया तरीके से वसूल हो सकेगी।

युवा और आर्थिक तरक्की की राह पर चल रहे भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में किए जा रहे ‘संशोधनों’ से बचा जा सकता है। देश में कारोबारियों और प्रबंधकों की क्षमता संदेह से परे है। वैसे, आने वाले कुछ दशकों में देश में मूल्यांकन के कुछ नये तरीके आजमाए जा सकते ड्डं। तब तक कारोबारी अपने हिसाब से चीजों को बढ़ा चढ़ा कर पेश करते रहेंगे।

First Published - September 11, 2008 | 10:25 PM IST

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