भारतीय नियोक्ताओं को इन दिनों एक अजीबो गरीब समस्या से रू-ब-रू होना पड़ रहा है। गांव में रहने वाले लोग शहरों में आकर नौकरी करने को तैयार नहीं हो रहे हैं।
उन्हें इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें शहरों में बेहतर रोजगार के अवसर मिलेंगे। अगर कभी वे नौकरियों के लिए शहरों की ओर रुख करते भी हैं तो ये उनकी जरूरत और मजबूरी होगी। वे अपने करियर को नई दिशा देने के लिए ऐसा नहीं कर रहे हैं।
अस्थायी कर्मचारी उपलब्ध कराने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी टीमलीज को कुछ ऐसी ही समस्याओं से जूझना पड़ा है। कंपनी के अध्यक्ष मनीष सब्बरवाल बताते हैं कि लोगों की ऐसी मानसिकता आकांक्षा में कमी दर्शाती है। कुछ हफ्ते पहले की बात है जब इसी कंपनी ने राजस्थान के दौसा जिले के एक व्यक्ति को जयपुर में नौकरी का प्रस्ताव दिया। नौकरी के लिए उस व्यक्ति को हर महीने 4,500 रुपये वेतन का प्रस्ताव दिया गया था।
ऐसा नहीं है कि दौसा जयपुर से काफी दूर है। इन दोनों के बीच की दूरी महज 60 किलोमीटर है। इसके बावजूद उस व्यक्ति ने कहा कि वह जयपुर में काम नहीं कर सकता। अगर इससे आधी तनख्वाह पर भी उसे दौसा में ही काम दिया जाए तो जरूर उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। अगर आंकड़ों की जुबानी सुनें तो पता चलता है कि टीमलीज जितने उम्मीदवारों को नौकरी का प्रस्ताव देती है, उनमें से 40 फीसदी प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। कंपनी हर महीने करीब 10,000 लोगों को नियुक्त करती है।
अब एक दूसरे उदाहरण की चर्चा करते हैं। करीब दो महीने पहले टीमलीज को कैटरिंग क्षेत्र की एक कंपनी ने अपने लिए 30 कर्मचारियों की नियुक्ति का जिम्मा सौंपा था। टीमलीज ने एक प्रमुख सरकारी रोजगार कार्यक्रम से 30 कर्मचारियों का चयन किया, जहां बेरोजगार ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार के लिए तैयार किया जाता था। इन लोगों को नियुक्त करने के तीन हफ्तों के अंदर ही 30 में से 21 लोगों ने काम छोड़ दिया।
जब नौकरी छोड़ने के समय उनका साक्षात्कार लिया गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें सरकारी नौकरी की चाहत थी और यहां आने के बाद उन्हें पता चला कि जिस कंपनी में वे काम कर रहे हैं वह निजी क्षेत्र की है। उन्हें नौकरी छोड़ते वक्त इस बात का मलाल भी नहीं था कि निजी क्षेत्र में उन्हें ऊंची तनख्वाह और दूसरी सुविधाएं दी जाती थीं। एक बार तो टीमलीज के सामने एक मजेदार वाकया घटा, जब दूसरे राज्य के एक व्यक्ति ने कहा, ‘हम लड़की, वोट और नौकरी अपनी ही जात में देते और लेते हैं।’
सब्बरवाल कहते हैं कि लोगों की ऐसी मानसिकता को बदलना नियोक्ताओं या सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। लोगों को अब भी चपरासी, सुरक्षा गार्ड या फिर सफाईकर्मी की नौकरी से कोई परेशानी नहीं है, अगर वे राज्य सरकार के पे रोल पर हों। वहीं दूसरे शहरों में निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं के प्रस्तावों को ठुकरा कर भी उन्हें अपने ही गांव में न्यूनतम दैनिक भत्ते पर काम करना अधिक रास आता है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि देश में मजदूर एक जगह से दूसरी जगह काम करने के लिए नहीं जा रहे हैं।
वही लोग जो अपनी मर्जी से शहरों में काम का प्रस्ताव ठुकरा चुके होते हैं, दूसरे शहरों में जाकर काम करते हैं, पर तब जबकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता है। तब ये टैक्सी ड्राइवर या फिर निर्माण परियोजनाओं में मजदूर का काम करने को तैयार हो जाते हैं। सब्बरवाल कहते हैं कि रोजगार के बाजार में यह एक बड़ी समस्या है कि लोगों में अपने करियर विकल्प को लेकर कोई जोश और उत्साह नहीं है। शुक्र है कि सभी राज्यों में ऐसे हालात नहीं है।
उदाहरण के लिए हम उत्तर पूर्वी राज्यों का ही जिक्र करें। इसे मिशनरी स्कूलों की ही देन कहें कि यहां के लोगों में औसत भारतीयों की तुलना में अंग्रेजी की बेहतर समझ है। और प्रवास के मामले में भी उनका नजरिया दूसरे लोगों से अधिक उदार है। यही वजह है कि टीमलीज फ्रंट ऑफिस के काम के लिए जितने उम्मीदवारों को नियुक्त करती है, उनमें से सबसे अधिक उत्तर पूर्वी राज्यों के ही होते हैं जिन्हें औसतन 8,000 रुपये प्रतिमाह के वेतन का प्रस्ताव दिया जाता है। कंपनी हर महीने इन राज्यों से 1,000 लोगों को नियुक्त करती है।
उदाहरण के लिए पर्यटन के मौसम में इन राज्यों से हर महीने 400 कर्मचारियों को नियुक्त किया जाता है। पर बाकी सब राज्य इसमें काफी पिछड़े हुए हैं। तो आखिर क्या किया जाए कि कृषि से गैर कृषि, असंगठित से संगठित, ग्रामीण से शहरी, रोजगार से बेहतर वेतन वाले रोजगार और स्कूल से नौकरी की ओर लोगों का झुकाव बढ़ने लगे। इस समस्या का अल्पकालिक समाधान यह हो सकता है कि अगर हम नौकरियों को लोगों तक नहीं ले जा सकते हैं तो कम से कम लोगों को तो नौकरियों की ओर ले ही जा सकते हैं।
मजदूरों के प्रवास के लिए ऐसे में हमें संस्थान और ढांचा तैयार करना होगा। ग्रामीण रोजगार एक्सचेंज का निर्माण एक बेहतर तरीका हो सकता है। हमें यह समझने की जरूरत है कि बहुत से कामगार जो दूसरे शहरों में नौकरी पर जाने से कतराते हैं उसकी एक बड़ी वजह आवास की समस्या होती है। तो क्यों न कम खर्च पर आवास की सुविधा उपलब्ध कराने पर ही पहले कुछ काम किया जाए। कुछ निजी क्षेत्र की कंपनियां इस दिशा में पहले ही कदम उठा चुकी हैं।
उदाहरण के लिए आईसीआईसीआई फाउंडेशन अपने यहां काम करने वाले कामगारों को पहले छह महीने के लिए 900 रुपये प्रतिमाह की दर पर डॉरिमेटरी की सुविधा उपलब्ध कराती है। इससे कंपनी को काफी फायदा भी हुआ है, मसलन पहले जहां बड़ी तादाद में कुछ ही दिनों में लोग नौकरियां छोड़ कर चले जाते थे अब वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। इससे कंपनी को भी फायदा हुआ है कि क्योंकि उनकी नियुक्ति का खर्च कम हुआ है। पर अकेले जिनी क्षेत्र के प्रयास से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकेगा और सरकार को भी स्किल डेवलपमेंट फोरम पर ध्यान देना होगा।
गुजरात, राजस्थान और उड़ीसा सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। इन तीनों ही ने बेरोजगारों को प्रशिक्षित करने के लिए अलग अलग कार्यक्रमों की शुरुआत कर दी है। इन कार्यक्रमों में उम्मीदवारों को सिखाया जाता है कि उन्हें भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर अपने रोजगार के बारे में सोचना चाहिए। उन्हें सिखाया जाता है कि जो गुण उनमें हैं और जिन कामों को पाने के वे हकदार हैं, उन्हें उसे पाने की कोशिश करनी चाहिए।